राजेश बादल
पच्चीस बरस पहले की वह खुशनुमा शाम थी। बशीर बद्र अमेरिका से लौटे थे। उनका फ़ोन आया। कहने लगे कि चलो बड़ी झील में बोटिंग करते हुए चाय पीते हैं और हम एक नाव में बैठे चप्पू चलाते हुए गपशप कर रहे थे। उस शाम कुछ कुछ वे उदास थे। चाय पीते पीते वे बोलते भी जा रहे थे - बारिशें यहाँ भी वैसी ही हैं ,बर्फ़ भी वैसी ही गिरती है ,रेगिस्तान भी यहाँ वैसा ही है और पहाड़ ,झीलें नदियाँ सब कुछ तमाम देशों जैसी ही हैं। मैं इंसानियत की बात करता हूँ ,उसूलों की बात करता हूँ ,सचाई की बात करता हूँ। लेकिन ,बिरादरी ऐसा क्यों नहीं करती ?ये जंगें ,रंजिशें, खून खराबा दंगे -फसाद किसलिए ? क्या हासिल करना चाहते हैं लोग ? वे अपनी रौ में बोले जा रहे थे। मैं केवल उनका चेहरा देख रहा था। हमारा परिचय क़रीब चार दशक पुराना था। मगर , मैंने कभी उनको इस तरह नहीं देखा था। वे उमर में लगभग मेरे पिता के बराबर थे ,इसलिए मैं कह भी क्या सकता था। उन्होंने किशोरावस्था में आज़ादी देखी थी। अयोध्या उनकी जन्मभूमि थी। गंगा -जमुनी तहजीब उनके खून में थी। उनका खानदान बंटवारे के समय पाकिस्तान नहीं गया था। उसके बाद मुल्क के सफरनामें में उन्होंने देखा कि कंधे से कन्धा मिलकर हर हिन्दुस्तानी काम कर रहा था। कोई भेद नहीं था। फिर भी उनका घर जला दिया गया। उनका दिल चीत्कार कर उठा। कलम से निकला - लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में ,तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।वे भोपाल आ गए।भोपाल की गोद में शायरी खेलती थी।भोपाल ने उर्दू अदब के इस लाड़ले को पलकों पर बिठाया। वे यहाँ की मिटटी में रच बस गए।
लेकिन जैसे-जैसे मुल्क तरक्की करता गया , अपने संस्कारों और सरोकारों को भूलता गया। भोपाल में उनके चाहने वाले बहुत थे। पर , इन गिने लोग ही थे ,जिनसे वे दिल की बात करते थे। उम्र में बेटे के बराबर था ,लेकिन शायद मुझे लगता है कि हम लोग पहली नज़र में ही दोस्त बन गए थे। कभी कभी घर जाता तो दरवाज़े पर खड़े मिलते। उनका चेहरा फूल की मानिंद खिल जाता था। उनकी मासूमियत भाती थी। वे अपनी किताबें दिखाते ,नया क्या लिखा है ,वह दिखाते और तरन्नुम में पढ़कर भी सुनाते थे।कभी कभी कोई किताब भेंट कर देते। मैं दबी ज़बान से कहता ," बशीर साब ! मैं तो उर्दू नहीं जानता।पढूंगा कैसे ? वे कहते भाषा तो एक माध्यम है। संस्कृत माँ है तो उर्दू और हिंदी बेटियां हैं। हमें उनकी क़द्र करना आना चाहिए। आप क़द्रदान हैं। आपकी किताबों की अलमारी में भी शोभा बढाएंगीं तो मुझे अच्छा लगेगा।आज भी वे किताबें मेरे पुस्तकालय में हैं और आज भी मैं उर्दू नहीं लिख - पढ़ पाता। पर उर्दू अदब को ख़ूब पढ़ लिया है। भाषा को नहीं जानने की कसक एक फांस की तरह दिल में चुभती है।
जब मैं दिल्ली चला गया तो तीन या चार मर्तबा वे दिल्ली आए। उनका सन्देश मिल जाता तो हम खूब मौज करते। हमारी महफ़िल में डॉक्टर हरीश भल्ला भी होते थे। उन्हें मैं भारत का सांस्कृतिक राजदूत कहता था। बशीर साब को यह उपाधि बहुत पसंद आई थी। बाद के वर्षों में उनका आना जाना कम हो गया। वे भूलने की बीमारी के शिकार हो गए। एकाध बार मिलने गया तो उनकी हालत देखकर रोना आ गया। इसके बाद वे धीरे धीरे मद्धम पड़ते गए। गुरूवार को नियति ने उनको हमें छीन लिया।
मैं पूरी ज़िम्मेदारी से कह सकता हूँ कि भारतीय उपमहाद्वीप में ग़ज़ल का सफर फैज़ , मजाज़ , फ़िराक और अली सरदार जाफरी ,जोश मलीहाबादी ,साहिर लुधियानवी और निदा फ़ाज़ली की कड़ी में बशीर बद्र ने अदब में बनाकर रखा। उसका मेयार गिरने नहीं दिया। आज इस महाद्वीप की ग़ज़ल उदास है। ग़ज़ल गायिकी में जिस तरह जगजीत सिंह ने ग़ज़ल को महफ़िलों से निकालकर अवाम तक पहुंचाया ,वही अदब में बशीर बद्र ने किया। उनके बिम्ब और प्रतीक अदभुत थे। वे उर्दू , हिंदी और अंग्रेजी तक के शब्दों का इस्तेमाल इतने शानदार ढंग से करते थे कि सुनने वाले दंग रह जाते थे। डॉक्टर हरीश भल्ला ने 1998 में दिल्ली में एक शाम इंटरनेशनल मेलोडी फाउंडेशन के बैनर तले बशीर साब को दावत दी तो उन्होंने खुशी खुशी क़बूल कर लिया। इस महफ़िल में उन्हें सबसे ज़्यादा दाद मिली उस ग़ज़ल से जिसकी फरमाइश उनसे बाद में बार बार हर मुशायरे में की जाने लगी थी। एक थी परखना मत ,परखने में कोई अपना नहीं रहता।बड़े लोगों से मिलने में फासला रखना ,जहाँ दरिया समंदर में मिला ,समंदर नहीं रहता। वैसे तो उनकी सारी ग़ज़लें एक से बढ़कर एक हैं लेकिन मैं कुछ आम आदमी से जुड़े ऐसे शेर याद करना चाहूंगा ,जो कम सुने अथवा पढ़े गए हैं। जैसे एक क्लर्क शाम को थकाहारा साइकल पर अपने घर लौटता है - थके थके पैडल के बीच चले सूरज ,घर की तरफ लौटी दफ्तर की शाम।आपसी रिश्तों में गलतफहमियों को कई बार हम बयान नहीं कर पाते ,लेकिन बशीर साब दो लाइन में कह देते हैं -मैं चुप रहा तो और गलतफहमियां बढ़ीं ,वह भी सुना है उसने ,जो मैंने कहा नहीं। सच कड़वा होता है और हर कोई महात्मा गाँधी नहीं होता। यह बात बशीर साब कहते थे और गुनगुनाते थे - जी बहुत चाहता है सच बोलें ,क्या करें हौसला नहीं होता।इसी तरह आधुनिक संचार साधनों ने आपसी रिश्तों पर चोट की है। उस चोट को बशीर साब ने कुछ इस तरह बयान किया -दुनिया भर के शहरों का कल्चर यक सां ,आबादी तन्हाई बनती जाती है। और इसी कड़ी में - खुले से लॉन में सब बैठकर चाय पियें ,दुआ करो कि खुदा हमको आदमी कर दे।
आज हिन्दुस्तानी ग़ज़ल उदास है। भीतर तक कुछ चटक सा गया है। जैसे सब कुछ रहते हुए माता पिता का साया उठ जाए। बशीर बद्र साब ! हम आपसे प्यार करते रहेंगे





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