राजेश बादल
बड़ी संख्या में पार्टी नेताओं के साथ छोड़ने के बाद ममता बनर्जी ने नए सिरे से पार्टी को गढ़ने का काम शुरू कर दिया है।आठ जुलाई को कोलकाता की रैली कम से कम यही संकेत देती है।रैली पार्टी के दस हज़ार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के विरोध में हुई।तृणमूल कांग्रेस को रैली निकालने के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ी।अदालत ने कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दे दी।प्रेक्षकों का मानना है कि ममता एक बार फिर पुराने विपक्षी तेवर और अंदाज़ में दिखाई देंगी।मगर,यह भी सच है कि अपने ख़िलाफ़ इतनी बड़ी बग़ावत के लिए ममता तैयार नहीं थीं।उन्होंने नहीं सोचा होगा कि पार्टी चुनाव में पराजय के बाद ताश के महल की तरह बिखरने लगेगी।ममता के लिए यक़ीनन यह बड़ा झटका है ।जिस जुझारू अंदाज़ में लड़ते हुए तृणमूल कार्यकर्ताओं ने वाम मोर्चा सरकार को अपदस्थ किया था,वह संघर्ष -भावना अब पार्टी में नहीं दिखाई दे रही थी ।
हालाँकि पिछले विधानसभा चुनाव में ममता की जीत चक्रवर्ती विजय से कम नहीं थी। उन्होंने बीजेपी से जिस तरह आक्रामक अंदाज़ में लोहा लिया और जीता,वह काबिले तारीफ था।वाममोर्चा और कांग्रेस को भी उन्होंने हाशिए पर ला दिया था।लेकिन पांच साल में क्या हो गया ? उनकी पार्टी का जुझारूपन कहाँ खो गया ? क्या एक दशक सत्ता में रहने के कारण राजरोग लग गया या फिर उनके कार्यकर्ता सुविधाभोगी हो गए थे ? शायद यह दोनों बातें ही सच हैं। लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं का यह चरित्र सिर्फ तृणमूल कांग्रेस की समस्या नहीं है। किसी भी दल के सदस्य अब सड़कों पर नहीं उतरना चाहते। जहाँ उनकी मेहनत की बोली अच्छी लगती है,वहाँ चले जाते हैं। वैचारिक आधार का अब कोई अर्थ नहीं रहा है।स्थानीय स्तर पर भी अब वैचारिक प्रतिबद्धता नज़र नहीं आती।सभी दलों में अवसरवादी नेताओं का बोलबाला है।प्रतिबद्धता से लोग कन्नी काटने लगे हैं।
दरअसल विधानसभा चुनाव में हार केवल ममता बनर्जी के लिए ही सबक नहीं है।अन्य विपक्षी पार्टियों के लिए भी इसमें सख्त संदेश छिपा है कि लोकतंत्र से भटकने का क्या अंजाम उन्हें भुगतना ही पड़ेगा।वैयक्तिक विरोध की सियासत का अब कोई अर्थ नहीं रहा है।ममता बनर्जी से बेहतर कौन समझेगा कि जब वे सत्ता में थीं तो उन्होंने हमेशा उस राजनीतिक दल से दूरी बनाए रखी,जिसकी कोख में उनका वैचारिक सोच परिपक्व हुआ था।वे विश्व की सबसे पुरानी पार्टी के नए नेतृत्व से चिढ़ती रहीं लेकिन अपने ही भतीजे को दल में उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तुत करती रहीं।अनेक मौकों पर उन्होंने कांग्रेस और उसके नए खून को यूपीए का मुखिया मानने से इनकार किया।यह अजीब रवैया था कि जिस दल के लगभग 100 सांसद हों,उसके अस्तित्व को ही वे नकारने पर तुली थीं।एक बार तो एनसीपी के सुप्रीमो शरद पवार के साथ उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कांग्रेस के प्रति अपमानजनक भाषा का उपयोग किया था।
ममता बनर्जी का व्यक्तित्व और स्वभाव धीरे धीरे विरोधाभासी होता गया है।वे अपने भाषणों में बार-बार लोकतंत्र की दुहाई देती थीं,मगर ख़ुद एक अधिनायक से कम नहीं थीं।लोकतंत्र कभी भी किसी तानाशाह को पसंद नहीं करता। प्रादेशिक पार्टियों का यही दोहरा चरित्र है।वे पार्टी अध्यक्ष का चुनाव या तो कराते नहीं या फिर औपचारिकता ही निभाते हैं।उनका अध्यक्ष राजा की तरह बरताव करता है।एनसीपी को भी अपने इसी चरित्र के कारण नुकसान उठाना पड़ा।लोकतंत्र सामूहिक नेतृत्व की बात करता है।उसमें पार्टी की दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं को भी उभरने का भरपूर अवसर मिलता है। एनसीपी के टुकड़े हुए तो उसका बड़ा कारण भी यही रहा ।कोई सत्ताधारी दल अपने सामने प्रतिपक्ष को मज़बूत क्यों होने देना चाहेगा ? वह तो विपक्षी पार्टियों को निरंतर कमज़ोर करने के प्रयास करता रहेगा। ऐसे में यदि राष्ट्रीय,क्षेत्रीय और प्रादेशिक दल अपने अपने घर मज़बूत रखें तो सत्ता पक्ष को अवसर ही नहीं मिलेगा। पर भारत में बीते तीन-चार दशक से यह नहीं हो रहा है।जब एनसीपी बिखरी तो ममता बनर्जी ने सबक नहीं लिया।जब शिवसेना के टुकड़े हुए तब भी ममता बनर्जी ने अपना घर ठीक नहीं किया।घर ठीक करने की बात तो दूर,प्रतिपक्षी खेमे में टूट-फूट के विरोध में भी चुप्पी साधे रहीं।आरजेडी में भी अब यही प्रयास चल रहा है।समाजवादी पार्टी भी ख़ामोश बैठी है।जब उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव आएँगे तो उसमें विभाजन कराने की कोशिशें शुरू हो जाएंगी।तब अखिलेश यादव बेबस पार्टी में टूटन देखते रहेंगे।
असल में अब स्पष्ट हो गया है कि भारतीय लोकतंत्र वैचारिक आधार पर दो ध्रुवों में बंट चुका है।एक तरफ दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी है तो दूसरी ओर कांग्रेस और उसके साथ वैचारिक सहानुभूति रखने वाले दल।दोनों तरफ लोकतान्त्रिक स्वरूप को बचाए रखने की चुनौती है।अधिनायक वादी दैत्य कमोबेश सारी पार्टियों को निगल रहा है।सियासी दलों को अब यह सत्य स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।अपने-अपने राजा को बचाने और उसकी सेवा में पार्टी ऊर्जा खर्च करेगी तो सारे वज़ीर और प्यादे छोड़कर भाग जाएंगे।अब परंपरागत समर्थकों और अनुयाइयों का ज़माना चला गया।लोकतंत्र के प्रति समर्पित सिद्धांतवादी नए कार्यकर्ताओं की फसल उगाना हर पार्टी के लिए वक़्त की ज़रुरत है।विडंबना है कि बीते दशकों में भारत की साक्षरता का प्रतिशत तो बढ़ा,लेकिन लोकतंत्र के दीवाने और जुनूनी कार्यकर्ताओं का अकाल पड़ता गया है।आज का भारतीय पढ़ा-लिखा तो है,लेकिन केवल दरी बिछाने और रैलियों का इंतज़ाम करने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है।वह अपने समय और मेहनत का मुआवज़ा भी चाहता है।इसलिए उसे जहाँ भी फायदा दिखता है,वह चला जाता है।वह कमाई के अवसर चाहता है।चाहे वह ट्रांसफर,पोस्टिंग,निलंबन,बहाली और ठेकों के कमीशन से मिले या फिर भ्रष्टाचार के अनेक छोटे छोटे रास्तों से हासिल हो।जब नैतिकता नहीं बची हो तो लोकतांत्रिक धारा पुनर्स्थापित करना आसान नहीं है।प्रदेशों में सक्रिय विपक्षी दलों के लिए यह अत्यंत गंभीर चुनौती है।राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस को भी अब सोचना होगा कि लोकतंत्र की प्रदूषित नदी को साफ़ करने में वह क्या भूमिका निभा सकती है।




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