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हॉट टोपिक
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Added on : 2026-06-02 11:13:23

राजेश बादल 
कुछ समय पहले तक ऐसा नहीं था। कमोबेश सारे प्रायद्वीपों के मुल्क़ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर मित्र देशों का चुनाव करते थे।उनमें भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों का बड़ा हाथ रहता था। कुछ राष्ट्र मित्र देशों का चुनाव मज़हबी आधार पर भी करते थे ,लेकिन उनकी संख्या अधिक  नहीं थी।मसलन,पाकिस्तान सुन्नी बाहुल्य मुल्क है तो उसका स्वाभाविक झुकाव सऊदी अरब की ओर रहा।लेकिन ईरान में शिया मुस्लिम आबादी अधिक है।इसलिए पाकिस्तान की उससे कभी नहीं बनी।बांग्लादेश में भाषा ही प्रधान रही, इसलिए पाकिस्तान उस पर अत्याचार करता रहा।अन्य ऐतिहासिक कारणों के अलावा इराक़ अरबी और ईरान फ़ारसी संस्कृतियों के कारण दो अलग अलग छोरों पर खड़े रहे।उत्तरी यूरोप के देश प्रोटेस्टेंट और दक्षिणी यूरोपीय राष्ट्र कैथोलिक ईसाईयों के बीच बँटे अपने स्वार्थों की फसल काटते रहे।अफ्रीकी देश श्वेत और अश्वेतों में विभाजित संघर्ष करते रहे।दक्षिण कोरिया अपने बौद्ध और ईसाई असर को ओढ़े रहा और उत्तर कोरिया में नास्तिकता का बोलबाला रहा।तत्कालीन सोवियत संघ में रहे देश आज ऑर्थोडॉक्स ईसाई और सुन्नी बाहुल्य मुस्लिम आबादी के साथ रहते आए हैं।अमेरिका की बड़ी आबादी ईसाई और नास्तिक है।आप कह सकते हैं कि आध्यात्मिक और मज़हबी आधार पर संसार के तमाम देशों की शासन प्रणाली और राष्ट्रीय नीतियां तय नहीं होती थीं। ( पाकिस्तान जैसे नक़ली मुल्क को छोड़कर )      
लेकिन,वैश्विक रंगमंच पर इन दिनों एक भीतर ही भीतर एक आशंका भरी खदबदाहट महसूस की जा रही है।बीते दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक सियासी तीर चलकर अमेरिका के अस्तित्व पर ही जैसे आक्रमण कर दिया । उन्होंने कहा कि अमेरिका एक ऐसा देश है ,जो ईसाई धर्म की बुनियाद पर बना और टिका है। पिछले साल भी उन्होंने ऐसा ही कहा था। आज तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस तरह की बात नहीं कही थी। बल्कि अमेरिकी पहचान हमेशा एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की रही है ।संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का संविधान भी यही कहता है कि वहां का कोई राष्ट्रीय धर्म नहीं है। अमेरिकी संविधान के पहला संशोधन में साफ़ लिखा गया है कि कोई भी अमेरिकी सरकार किसी भी धर्म को अपना नहीं सकती और न ही किसी धर्म के प्रति विशेष लगाव के ऐलान की घोषणा कर सकती है।इसका क्या अर्थ लगाया जाए ? डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने ही देश के संविधान का अध्ययन नहीं किया है या फिर वे जानबूझकर ऐसी मज़हबी अफीम इस धर्म के अनुयाइयों  को चटा रहे हैं ,जिससे मुल्क के करीब 67 फ़ीसदी ईसाईयों को लुभाया जा सके। उन्हें यह जानकारी है कि इन दिनों उनकी लोकप्रियता का ग्राफ सबसे निचले स्तर पर है और नवंबर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने हैं। यह चुनाव सुनिश्चित करेंगे कि डोनाल्ड ट्रम्प अपने शेष कार्यकाल में महाबली होकर उभरेंगे अथवा एकदम दुर्बल और महीन हो जाएँगे। इसलिए वे जो धार्मिक चाल चल रहे हैं ,वह समूचे विश्व के सोच और संबंधों पर असर डालेगी।   
ईरान के साथ अमेरिका - और इज़रायल की जंग इसका ताज़ा सुबूत है।यह छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि लगभग एक दर्जन राष्ट्रों में अमेरिका ने सैनिक अड्डे बनाए हैं।इनमें क़तर,बहरीन,संयुक्त अरब अमीरात,कुवैत,सऊदी अरब,इराक़,जॉर्डन,तुर्किये,जिबूती नाइज़र,कोसोवो और ओमान ख़ास हैं।इसके अलावा बांग्लादेश,पाकिस्तान और मध्यपूर्व के कुछ मुस्लिम देशों में उसके ख़ुफ़िया सैनिक ठिकाने हैं।अमेरिका का विरोध करने पर बांग्लादेश में शेख़ हसीना वाजेद और पाकिस्तान में इमरान ख़ान की सरकारें गिरा दी गई। दोनों राष्ट्र नेता खुलकर इस बात को कह चुके हैं। अब ओमान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का अजीबोगरीब बयान बुधवार को सामने आया। ओमान अमेरिका का पिट्ठू है। यह सभी जानते हैं। ट्रम्प कह रहे हैं कि यदि ओमान ने होर्मूज़ जलडमरू मध्य पर ईरान के साथ मिलकर कोई फैसला लिया तो वे उस देश को बम से उड़ा देंगे।ख़बरें आ रही थीं कि ईरान और ओमान मिलकर इस समुद्री मार्ग के बारे में नया क़दम उठाने जा रहे हैं। इससे पहले उन्होंने पाकिस्तान समेत सभी मुस्लिम देशों को चेतावनी दी थी कि वे अपना भला चाहते हैं तो इज़रायल को मान्यता दें। पाकिस्तान ने अमेरिका के इस फ़रमान को खारिज कर दिया है। उसने कहा कि जब तक इज़रायल फिलिस्तीन को मान्यता नहीं देता,तब तक वह इज़रायल के अस्तित्व को मंज़ूर नहीं करेगा। सन्दर्भ के तौर पर बता दूँ कि पाकिस्तान के प्रत्येक पासपोर्ट पर लिखा होता है कि यह इज़रायल के लिए मान्य नहीं है। नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान अपने धुर विरोधी ईरान के साथ संधि प्रस्ताव पर मध्यस्थता के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहा है।लेकिन वह इज़रायल के साथ मध्यस्थता में शामिल नहीं होना चाहता। ऐसे में पाकिस्तान अगर  अमेरिका के लिए काम करता है तो पाकिस्तान की अवाम वहां की हुकूमत और फौज के खिलाफ सड़कों पर आ जाएगी। फील्ड मार्शल आसिम  मुनीर की मेहनत पर पानी फिर सकता है। इसका संकेत वहाँ के सियासी घटनाक्रम से लग जाता है कि मुनीर के खिलाफ मज़हबी लोग सड़कों पर आ रहे हैं ।
कुछ और हो या न हो,डोनाल्ड ट्रंप के ने संसार की हांडी में एक धार्मिक उबाल अवश्य पैदा कर दिया है।अभी इस हांडी पर ढक्कन लगा है। पर यह ढक्कन कब तक रहेगा,कोई नहीं जानता। ट्रंप के मज़हबी तार ने इस्लामिक देशों में भी मज़हबी धुन निकालनी शुरू कर दी है। कोई गारंटी नहीं ले सकता कि अमेरिकी टुकड़ों पर पल रहे मुस्लिम देश धार्मिक आधार पर अमेरिकी जाल से बाहर नहीं निकलना चाहेंगे ।ईरान ने जितने भी इस्लामी देशों में अमेरिकी सैनिक अड्डों पर हमला किया,किसी ने उसके विरोध में तीव्रता नहीं दिखाई। एकाध अपवाद छोड़ दें तो हम मान सकते हैं कि सब अमेरिकी चौधराहट या दादागीरी से परेशान हैं।यक़ीनन मौजूदा विश्व में अब इस्लाम और ईसाईयत के आधार पर विभाजन की नींव पड़ चुकी है। ट्रंप का साथ देना इस्लामिक मुल्कों के लिए अब आसान नहीं रहेगा और यह एक खतरनाक चेतावनी है।

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