राजेश बादल
भारत की सुरक्षा के लिए यह गंभीर चुनौती भरा समय है।आधुनिक चीन के 1949 में अस्तित्व में आने के बाद चीन ने भारत की कभी इतनी आक्रामक घेराबंदी नहीं की थी।चौंसठ बरस पहले की जंग के बाद भी वह अरसे तक अपनी मांद में दुबका रहा।लेकिन कुछ वर्षों से उसने चारों दिशाओं उत्तर, दक्षिण,पूरब और पश्चिम में भारत की चिंता बढ़ा दी है।हाल ही में बांग्लादेश के मंगला बंदरगाह ( बंगला में मोंगला ) को उसने भारत से छीनकर अपनी झोली में डाल लिया है।यह बेहद ख़तरनाक़ साज़िश का हिस्सा है,जिसमें भारत के कमोबेश सभी पड़ोसी देश शामिल हैं।उत्तर में चीन ख़ुद सीमा पर भारतीय चिंता बढ़ाता रहा है।अब नेपाल भी उसके साथ है।पूरब में बांग्लादेश अभी तक भारत का भरोसेमंद साथी रहा है।इन दिनों वह भी अमेरिका और चीन के इशारों पर नाच रहा है।म्यांमार पहले ही भारत से छिटका हुआ है।दक्षिण में श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह उसके क़ब्ज़े में है। हंबनटोटा पहले भारत को सौंपने की पेशकश की गई थी। लेकिन भारत से रणनीतिक चूक हुई और यह चीन के हाथों चला गया। पश्चिम में पाकिस्तान ने ग्वादर बंदरगाह पूरी तरह चीन को दे दिया है।भारत ने ग्वादर बंदरगाह से बढे ख़तरे के मद्देनज़र ईरान में चाबहार बंदरगाह बनाया था,लेकिन अमेरिकी दबाव में उसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।जानकारों की परेशानी का सबब चीन और अमेरिका की बंदरबांट भी है।भले ही बाहर से यह दोनों बड़े देश एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी दिखाई देते हों,मगर परदे के पीछे उनकी मिलीभगत भारत और रूस जैसे विशाल राष्ट्रों के लिए मुसीबत बनती नज़र आ रही है।
पहले मंगला बंदरगाह की बात।बांग्लादेश का यह दूसरा बड़ा महत्वपूर्ण बंदरगाह है।शेख हसीना वाजेद की हुकूमत ने 2015 में इस बंदरगाह को एक बड़े व्यापारिक और सामरिक केंद्र के रूप में विकसित करने का काम सौंपा था।मंगला से सटे बागेरहाट की करीब 110 एकड़ ज़मीन पर यह बनाया जाना था।भारत को ऐसा ही एक केंद्र मीर सराय में बनाना था।तीन साल बाद 2018 में भारत सरकार ने इसे विकसित करने का अनुबंध हीरानंदानी समूह से किया।इसके दो बरस बाद बांग्लादेश ने ज़मीन भारत को सौंप दी। इसी बीच दो बड़े घटनाक्रमों के चलते सारा खेल ही उलट गया।पहला तो यह कि शेख हसीना सरकार का तख़्तापलट हो गया।शेख हसीना का आरोप है कि अमेरिका ने उनकी सरकार गिराई थी क्योंकि उन्होंने सेंट मार्टिन द्वीप अमेरिका को देने से मना कर दिया था।अमेरिका वहां अपना सैनिक अड्डा बनाना चाहता था।बांग्लादेश की नई सरकार कट्टर भारत विरोधी है और अमेरिका पाकिस्तान के माध्यम से उसे संचालित कर रहा है।दूसरा कारण वैश्विक स्तर पर कोविड प्रकोप था,जिसके चलते दो साल तक कुछ काम नहीं हो सका।इसके बाद 2022 में हीरानंदानी समूह की सहायक कंपनी इविटा कंस्ट्रक्शंस ने बांग्लादेश के साथ अंतिम समझौता किया और 2025 में मोहम्मद यूनुस सरकार ने लंबे समय तक काम शुरू नहीं करने के कारण भारत से हुआ यह अनुबंध रद्द कर दिया। चंद रोज़ पहले बांग्लादेश की सरकारी संस्था बेज़ा ( बांग्लादेश इकोनॉमिक ज़ोन अथॉरिटी ) ने चीन की सरकारी कंपनी चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन के साथ नया समझौता कर लिया। इसके लिए प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान खुद चीन गए थे।मंगला के अलावा चट्टोग्राम और केरानीगंज में भी ऐसे ही औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के नाम पर चीन - बांग्लादेश में समझौता हुआ।बता दूँ कि मंगला बंदरगाह भारतीय सीमा से सिर्फ़ 80 किलोमीटर और भारतीय जलसीमा से 130 किलोमीटर दूर स्थित है।संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर के एकदम निकट होने के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी भारत की चिंता बढ़ाने वाली है।आपको याद होगा कि भूटान का डोकलाम क्षेत्र भी सिलीगुड़ी कॉरिडोर के एकदम पास है।जून 2017 में चीनी सैनिकों के साथ भारतीय सेना की हिंसक झड़पें हुई थीं।चीन वहां अपनी ओर से पक्की सड़क बनाना चाहता था।
यही कालखंड चीनी रवैए को आक्रामक बनाता है।इसके बाद चीन ने भारतीय सीमाओं पर नाकेबंदी शुरू कर दी और डोकलाम झड़पों के अगले महीने ही यानी जुलाई 2017 में श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह 99 साल के लिए हथिया लिया।श्रीलंका की मजबूरी यह थी कि वह भारी क़र्ज़ की भरपाई नहीं कर पा रहा था।भारत के लिए दक्षिण सीमा पर यह बड़ा झटका था।यह बंदरगाह भारत की जलसीमा से केवल 451 किलोमीटर है।इससे पहले पश्चिम सीमा पर वह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को पहले ही अपने अधिकार में ले चुका था।डोकलाम में टकराव से कुछ महीने पहले ही ग्वादर को चीन और पाकिस्तान ने व्यापारिक जहाज़ों के लिए खोल दिया था।यह भी ध्यान देने की बात है कि 2013 में ग्वादर बंदरगाह को चीन पाकिस्तान से 40 साल की लीज़ पर ले चुका था।ग्वादर के ज़रिए भारत का पूरा पश्चिमी इलाका उसके मारक रेंज में आ चुका है।
लब्बोलुआब यह कि भारत इस समय अपने पड़ोसियों की सख़्त घेराबंदी में है और चीन उन पड़ोसियों का मुखिया है। यानी भारत चाहकर भी सभी पड़ोसियों से अलग अलग बात करके संबंध नहीं सुधार सकता। चीन ने उन सभी पड़ोसियों को भारी क़र्ज़ देकर अपनी मुट्ठी में कर रखा है। चीन का विदेश विभाग इस मायने में चतुर और धूर्त साबित हुआ है। उसके लिए कोई नैतिक मानदंड या सिद्धांत लागू नहीं होते। यह हिन्दुस्तान के लिए अत्यंत संवेदनशील और सुरक्षा के नज़रिए से बेहद गंभीर चुनौती है। एशिया के मामलों में अमेरिका और चीन एक ही पलड़े में बैठे दिहाई देते हैं। दोनों मुल्क़ रूस और भारत को दबाव में रखना चाहते हैं।रूस को अमेरिका ने वैसे भी यूक्रेन के मोर्चे पर फंसा कर रखा है और भारत को भी चक्रव्यूह में घेरकर उसे वैश्विक मंच पर नहीं उभरने देने की चाल भी कामयाब होती लग रही है। भारतीय सियासत अतीत के गड़े मुर्दों को उखाड़ने और चुनावों में ही व्यस्त रहती है। वैदेशिक नीति पर इसका उल्टा असर पड़ रहा है। भारत के कूटनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय नीति नियंताओं के लिए यह नींद से जागने का वक़्त है।





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