भोपाल के राज्य संग्रहालय में एक गरिमामय वातावरण में सम्पन्न कवयित्री चित्रा सिंह के तीसरे काव्य संग्रह “ नदी की गीली आँखें ” का लोकार्पण हुआ।इस अवसर पर कवि राजेश जोशी ने कहा कि चित्रा रसायन की प्राध्यापक हैं तो उनकी कविताओं में भी वह असर दिखाई देता है।रसायन के सूत्र और समीकरण की तरह कम शब्दों को बरतते हुए ये कविताएं गहरी और बड़ी बात कह जाती हैं।
पिता और आलोचक डॉ विजय बहादुर सिंह ने कहा कि चित्रा की कविताओं के बिम्ब बहुत सुंदर होते हैं लेकिन उन्हें अपने अनुभव को और अधिक विस्तार देना होगा क्योंकि इसे जनता की कविता बनाना है।काव्य संग्रह “ नदी की गीली आँखे “के लोकार्पण अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री मुकेश नायक ने कहा कि बेटी चित्रा की कविताओं के बिम्ब देशज हैं. वे उस दुनिया के हैं जिस दुनिया से मैं भी आता हूं और संभवत हम सब उन्ही ढिक लगी मुंडेरो, तालाबों, पोखरों और अलसाती दोपहरों में गेंहू के भंडारे देखते सुनते जीते आए हैं।उन्होने कहा कि चित्रा जज़्बात से लिखती हैं इसलिए “ नदी की गीली आंखे”देख पाती हैं।
कवि निरंजन श्रोत्रिय ने एक कविता का उल्लेख करते हुए कहा कि ये कविताएं उम्मीद और जिजीविषा की बात करती हैं।महत्वपूर्ण यह कि चित्रा की कविता कहीं कोई नया सच गढ़ती है तो कहीं पुराने सच को फिर जोड़ने की कोशिश करती है।
कवि प्रेमशंकर शुक्ल जी ने कविताओं को उस माला की उपमा दी जो टूटे मनकों को जोड़कर बनाई गई है।उन्होने कहा कि ये शुद्ध कविताएं हैं जिनमें भावनात्मक अभिव्यक्ति है।बुध्दि और शब्द के जो अतिरिक्त भार होते हैं,उससे ये कविताएं पूरी तरह मुक्त हैं।





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