Know your world in 60 words - Read News in just 1 minute
हॉट टोपिक
Select the content to hear the Audio

Added on : 2026-08-11 16:34:22

 

अश्वनी कुमार
पूर्व ब्यूरो चीफ,
आज तक टीवी
जम्मू

पाकिस्तान आजादी के बाद से अपने प्रशासनिक और राजनीतिक भविष्य को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बहसों में से एक की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि क्या देश की पारंपरिक चार-प्रांत व्यवस्था को बदलकर 33 प्रांतों अथवा प्रशासनिक इकाइयों की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।

पहली नजर में यह पहल प्रशासनिक सुधार की कवायद नजर आती है, लेकिन इसके राजनीतिक परिणाम कहीं अधिक गहरे हो सकते हैं।

इस बहस को हाल में उस समय नई गति मिली जब पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने असामान्य रूप से स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि देश की मौजूदा शासन व्यवस्था “ढह चुकी है” और बुनियादी प्रशासनिक सुधार आवश्यक हैं। पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर के करीबी रिश्तेदार माने जाने वाले नकवी ने राजनीतिक दलों से नए प्रांतों और प्रशासनिक इकाइयों के गठन पर आम सहमति बनाने का आह्वान किया है।

उन्होंने चेतावनी दी, “अगर यही व्यवस्था जारी रही तो दस साल बाद भी हम यहीं बैठकर इन्हीं मुद्दों पर चर्चा कर रहे होंगे।”

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पाकिस्तान एक साथ आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी दबावों का सामना कर रहा है।

पाकिस्तान में फिलहाल चार प्रमुख प्रांत हैं—पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान, इसके अलावा संघीय प्रशासन के अधीन क्षेत्र भी हैं।

इस व्यवस्था के आलोचकों का कहना है कि राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति कुछ गिने-चुने प्रांतीय राजधानी शहरों तथा पारंपरिक राजनीतिक परिवारों के हाथों में अत्यधिक केंद्रित हो गई है।

प्रशासनिक पुनर्गठन के सबसे प्रमुख समर्थकों में दुनिया मीडिया ग्रुप के चेयरमैन मियां आमिर महमूद का नाम लिया जाता है। अपनी “इमेजिन पाकिस्तान 2030” पहल के माध्यम से महमूद पाकिस्तान को 33 प्रांतों वाला देश बनाने की वकालत करते रहे हैं। उनका प्रस्ताव मोटे तौर पर देश की मौजूदा प्रशासनिक डिवीजनों को छोटे प्रांतों में बदलने पर आधारित है।

महमूद, जो पाकिस्तानी सेना प्रमुख के करीबी भी माने जाते हैं, का तर्क सीधा है—छोटी प्रशासनिक इकाइयों से सरकार नागरिकों के अधिक करीब पहुंचेगी, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय व्यवस्था की डिलीवरी बेहतर होगी तथा पारंपरिक वंशवादी राजनीतिक दलों से बाहर नए राजनीतिक नेतृत्व के लिए अवसर पैदा होंगे।

पंजाब के मामले में यह प्रस्ताव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पंजाब की आबादी बहुत बड़ी है और ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के राजनीतिक तथा आर्थिक परिदृश्य पर उसका वर्चस्व रहा है। पंजाब को कई छोटे प्रांतों में बांटने से दक्षिणी पंजाब, पोटोहार और अन्य क्षेत्रों में नए राजनीतिक शक्ति केंद्र उभर सकते हैं। इससे आलोचकों के अनुसार लाहौर-केंद्रित राजनीति का प्रभाव भी कम हो सकता है।

इसके पीछे एक और राजनीतिक पहलू है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था लंबे समय से शक्तिशाली राजनीतिक परिवारों के प्रभुत्व में रही है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) का सबसे मजबूत संगठनात्मक और चुनावी आधार पंजाब में है, जबकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) का ऐतिहासिक रूप से सिंध में दबदबा रहा है।

इन प्रांतों को कई छोटे राजनीतिक क्षेत्रों में बांटने से दोनों दलों का चुनावी गणित बुनियादी रूप से बदल सकता है। 33 प्रांतों के समर्थकों का तर्क है कि यही इसका लोकतांत्रिक लाभ होगा। उनके अनुसार नए प्रांत नए राजनीतिक नेताओं को जन्म दे सकते हैं और स्थापित राजनीतिक परिवारों की पकड़ कमजोर कर सकते हैं।

लेकिन इसके विपरीत एक स्पष्ट सवाल भी उठता है—मौजूदा राजनीतिक शक्ति के विखंडन का लाभ आखिर किसे होगा?

यहीं से यह बहस कहीं अधिक विवादास्पद हो जाती है।

पाकिस्तान के राजनीतिक और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े हलकों में ऐसी चर्चाएं और दावे भी सामने आए हैं कि फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर के नेतृत्व में सैन्य प्रतिष्ठान देश को लगभग 33 प्रशासनिक इकाइयों में पुनर्गठित करने की संभावना पर विचार कर रहा है।

दावों के कुछ संस्करणों में पंजाब को लगभग 10 इकाइयों, सिंध को सात या उससे अधिक इकाइयों—जिसमें एक अलग कराची इकाई भी शामिल हो सकती है—बलूचिस्तान को आठ और खैबर पख्तूनख्वा को सात इकाइयों में बांटने की बात कही गई है।

हालांकि, इन विशिष्ट दावों को सावधानी से देखा जाना चाहिए। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐसा कोई आधिकारिक पाकिस्तानी सेना दस्तावेज नहीं है, जो 33 प्रशासनिक इकाइयों वाले किसी औपचारिक सैन्य खाके की पुष्टि करता हो। जब तक ऐसा दस्तावेज या किसी विश्वसनीय आधिकारिक स्रोत से स्पष्ट पुष्टि सामने नहीं आती, तब तक कथित सेना की योजना को स्थापित तथ्य के बजाय एक आरोप या दावा ही माना जाना चाहिए।

फिर भी पाकिस्तान के राजनीतिक विमर्श में इस दावे को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि देश का नागरिक-सैन्य संबंधों का इतिहास लंबा और जटिल रहा है।

इसलिए वास्तविक सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पाकिस्तान को छोटे प्रांतों की जरूरत है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक विकेंद्रीकरण अनजाने में राजनीतिक केंद्रीकरण का एक नया रूप पैदा कर सकता है?

पाकिस्तान की संवैधानिक सरकार का केंद्र इस्लामाबाद में है, जबकि सेना का जनरल हेडक्वार्टर रावलपिंडी में स्थित है।

अनेक छोटे प्रांतों वाला राजनीतिक नक्शा शक्तिशाली प्रांतीय सरकारों और पारंपरिक राजनीतिक संगठनों के प्रभाव को कमजोर कर सकता है।

यदि नए प्रांतों को अधिक प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार दिए जाते हैं तो सिंध में पीपीपी और पंजाब में पीएमएल-एन की स्थापित राजनीतिक मशीनरी को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

सैद्धांतिक रूप से सैन्य प्रतिष्ठान के लिए एक ऐसा बिखरा हुआ राजनीतिक परिदृश्य कुछ शक्तिशाली प्रांतीय राजनीतिक केंद्रों वाले मौजूदा ढांचे की तुलना में अधिक आसानी से प्रबंधित किया जा सकता है।

लेकिन यह एक राजनीतिक व्याख्या है, सेना द्वारा तैयार पुनर्गठन योजना का प्रमाण नहीं।

इस पूरी बहस में धन और संसाधनों का सवाल राजनीतिक शक्ति जितना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।

छोटे प्रांतों के समर्थकों का कहना है कि अधिक विकेंद्रीकृत व्यवस्था यह सुनिश्चित कर सकती है कि विकास का पैसा उपेक्षित क्षेत्रों तक पहुंचे और केवल प्रांतीय राजधानियों में केंद्रित न रहे।

लेकिन पाकिस्तान का राष्ट्रीय वित्त आयोग (एनएफसी) ढांचा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और वित्तीय सवाल खड़ा करता है—33 प्रांत संसाधनों के वितरण में कैसे भाग लेंगे?

क्या प्रत्येक नए प्रांत को राष्ट्रीय राजस्व में अधिक प्रत्यक्ष हिस्सा मिलेगा? क्या मौजूदा एनएफसी फार्मूले को पूरी तरह नए सिरे से तैयार करना होगा? और क्या पाकिस्तान, जो पहले से ही गंभीर वित्तीय दबावों से जूझ रहा है, अतिरिक्त राजनीतिक और नौकरशाही ढांचे का खर्च उठा पाएगा?

33 सरकारें, विधानसभाएं, मुख्यमंत्री और विस्तारित प्रशासनिक ढांचा बेहद महंगा साबित हो सकता है, जब तक कि इसके साथ वास्तविक प्रशासनिक दक्षता सुनिश्चित न की जाए।

इसलिए यह सुधार या तो सरकार को जनता के करीब ला सकता है—या केवल सरकारों की संख्या बढ़ा सकता है।

पाकिस्तान के राजनीतिक पुनर्गठन पर होने वाली कोई भी चर्चा पंजाब को नजरअंदाज नहीं कर सकती।

इस प्रांत में देश की आबादी का असमान रूप से बड़ा हिस्सा रहता है और पाकिस्तान के अनेक प्रमुख राजनीतिक नेता तथा प्रधानमंत्री इसी क्षेत्र से आए हैं।

इसलिए पंजाब को कई प्रांतों में बांटना केवल प्रशासनिक सीमाओं को फिर से खींचना नहीं होगा। यह पाकिस्तान के राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरण को स्थायी रूप से बदल सकता है।

इससे लाहौर के बाहर नए राजनीतिक केंद्र उभर सकते हैं और उन नेताओं के लिए जगह बन सकती है जो पारंपरिक रूप से राष्ट्रीय सत्ता संरचना से बाहर रहे हैं।

समर्थकों के लिए यही इस प्रस्ताव के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क है।

वहीं स्थापित राजनीतिक दलों के लिए यही उनका सबसे बड़ा डर हो सकता है।

इस प्रस्ताव का समय भी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान एक साथ बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसके साथ ही आर्थिक पिछड़ेपन, राजनीतिक हाशिए पर डाले जाने और कमजोर शासन की लगातार शिकायतें भी सामने आती रही हैं।

विकेंद्रीकरण के समर्थकों का तर्क है कि सरकार को जनता के करीब लाने और विकास संसाधनों को उपेक्षित क्षेत्रों तक पहुंचाने से अलगाव की भावना को कम किया जा सकता है।

हालांकि आलोचकों को आशंका है कि यदि नए प्रशासनिक क्षेत्रों का गठन सैन्य प्रतिष्ठान के अत्यधिक प्रभाव में हुआ तो विकेंद्रीकरण, मजबूत केंद्रीय निगरानी के तहत प्रशासनिक विखंडन में बदल सकता है।

यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है।

पाकिस्तान का हालिया राजनीतिक इतिहास भी एक चेतावनी देता है। सैन्य प्रतिष्ठान पर उसके आलोचक बार-बार राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करने और विशेष राजनीतिक विकल्पों को समर्थन देने के आरोप लगाते रहे हैं।

इमरान खान और उनकी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) स्थापित राजनीतिक परिवारों के सामने एक शक्तिशाली विकल्प के रूप में उभरे थे, लेकिन बाद में खान और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच संबंध पूरी तरह बिगड़ गए।

आज भी खान पाकिस्तान की राजनीति में प्रभावशाली हैं, जबकि पारंपरिक राजनीतिक परिवार औपचारिक राजनीतिक व्यवस्था पर अपना प्रभुत्व बनाए हुए हैं।

इस पृष्ठभूमि में नए प्रांतों का गठन सैद्धांतिक रूप से स्थापित राजनीतिक वंशों से बाहर नए राजनीतिक नेतृत्व को जन्म दे सकता है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसा नेतृत्व लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से स्वाभाविक रूप से उभरेगा या शक्तिशाली राज्य संस्थानों के प्रभाव से पैदा होगा?

इसलिए पाकिस्तान के प्रस्तावित प्रशासनिक परिवर्तन को लेकर दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण सामने आते हैं।

पहला है लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का मॉडल—छोटे प्रांत, मजबूत स्थानीय संस्थाएं, बेहतर संसाधन वितरण, अधिक जवाबदेही और नए राजनीतिक नेतृत्व के लिए अवसर।

दूसरी और अधिक चिंताजनक संभावना यह है कि राजनीतिक परिदृश्य के विखंडन से छोटे प्रांत देश की सबसे शक्तिशाली संस्था के लिए प्रभावित करना आसान हो जाएं।

पाकिस्तान के राजनीतिक दलों के पास इस प्रस्ताव को लेकर सावधानी बरतने के पर्याप्त कारण हैं।

पीपीपी के लिए सिंध का विभाजन उसके पारंपरिक राजनीतिक आधार को चुनौती दे सकता है। पीएमएल-एन के लिए पंजाब का विभाजन उसके चुनावी प्रभुत्व को कमजोर कर सकता है। हालांकि अन्य दलों के लिए नए प्रांत स्थापित राजनीतिक परिवारों की छाया से बाहर निकलने का अवसर बन सकते हैं।

और सैन्य प्रतिष्ठान यदि वास्तव में ऐसे पुनर्गठन का समर्थन करता है तो इसके परिणाम और भी दूरगामी हो सकते हैं।

यही कारण है कि 33 प्रांतों की बहस केवल पाकिस्तान के नक्शे पर नई रेखाएं खींचने का सवाल नहीं है।

यह मूल रूप से इस सवाल से जुड़ा है कि पाकिस्तान के नए राजनीतिक भूगोल को नियंत्रित कौन करेगा?

क्या नया पाकिस्तान इस्लामाबाद से संचालित होगा, प्रांतों से, जमीनी स्तर से—या सत्ता के बंटवारे और राजनीतिक नियंत्रण को तय करने में रावलपिंडी की भूमिका और भी बढ़ जाएगी?

मोहसिन नकवी का यह स्वीकार करना कि मौजूदा व्यवस्था विफल हो रही है, एक वैध राष्ट्रीय बहस का रास्ता खोलता है। वहीं मियां आमिर महमूद की वकालत ने 33 प्रांतों के विचार को एक ठोस बौद्धिक और प्रशासनिक ढांचा दिया है।

लेकिन कथित सैन्य खाके की अभी तक पुष्टि नहीं हुई है।

पाकिस्तान अब एक महत्वपूर्ण विकल्प के सामने खड़ा है। वह प्रशासनिक पुनर्गठन का इस्तेमाल लोकतंत्र को मजबूत करने, शासन व्यवस्था में सुधार लाने और राज्य को अपने नागरिकों के करीब लाने के लिए कर सकता है।

या फिर यदि यह प्रक्रिया संस्थागत सुधार के बजाय राजनीतिक शक्ति के पुनर्वितरण से संचालित होती है, तो नया नक्शा पुराने असंतुलन का ही एक नया रूप पैदा कर सकता है।

सवाल यह नहीं है कि पाकिस्तान को सुधार की जरूरत है या नहीं।

सवाल यह है कि सुधार की रूपरेखा कौन तैयार करेगा—और अंततः उससे बनने वाले नए पाकिस्तान को नियंत्रित कौन करेगा?

आज की बात

हेडलाइंस

अच्छी खबर

शर्मनाक

भारत

दुनिया