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Added on : 2026-07-21 16:18:39

डॉ. सुधीर सक्सेना
'दतिया में मतदान सन्निकट है। कहने को यह चुनाव दोनों प्रमुख दलों - कांग्रेस और भाजपा के बीच हो रहा है, लेकिन आजाद समाज पार्टी ने आमने-सामने की सीधी लड़ाई को पेचीदा त्रिकोणीय संघर्ष में बदलकर हार-जीत के समीकरणों को गड़बड़ा दिया है। आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी दामोदर सिंह यादव के पेशगी तैयारी से मैदान में उतरने से संशय गहरा गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सजातीय होने से अनेक लंतरानियां हवा में तैर रही हैं। चुनावी ऊंट की करवट को दादा (नरोत्तम मिश्र) की मौन 'मनौती' से जोड़कर भी देखा जा रहा है। इसे हरेक अपने-अपने तरीके से बूझ रहा है। वस्तुत: डॉ. नरोत्तम मिश्र की स्थिति तलवार की धार पे धावनों सरीखी हो गयी है। बीजेपी की जय और पराजय दोनों ही स्थितियों में उनके लिये नफा, कम, नुकसान ज्यादा का खतरा सन्निहित है। 
डॉ. नरोत्तम मिश्र इस सामंती इलाके में 'दादा" के संबोधन से नवाजे जाते हैं। यह संबोधन उनकी हैसियत और छवि दोनों की चुगली करता है। इसमें आदर और दबंगई का ऐसा घोल है, जिसमें दोनों को पृथक्कृत नहीं किया जा सकता। इलाके में उनकी लोकप्रियता भी है और दबदबा भी। वह पारिवारिक प्रसंगों से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक समारोहों में शिरकत करते रहे हैं। उन्होंने 'अपनों' को कृतार्थ किया तो बैरियों को 'सबक' सिखाया। हाजिरजवाबी और शेरोशायरी से वह जलसों और महफिलों की शान रहे। पार्टी के लिये वह 'संकटमोचन' रहे। उनकी साधन संपन्नता कइयों की ईर्ष्या का विषय बनी। दिल्ली के सत्ता सौध में वह एक अत्यंत प्रभावशाली नेता की 'नाक का बाल' रहे और दिलचस्प तौर पर उन्होंने अपनी नाक के बालों का भी भरपूर खयाल रखा। कमलनाथ-सरकार को गिराने में भी उनकी नेपथ्य में महत्वपूर्ण भूमिका रही। अपने बयानों से वह सुर्खियों में रहे और आचरण से विवादास्पद। सूबे का सीएम बनने की उनकी महत्वाकांक्षा भी किसी से छिपी नहीं रह सकी। 
यही वे सन्दर्भ हैं, जो डॉ. नरोत्तम मिश्र को सत्तारूढ़ बीजेपी में अद्वितीय या विशिष्ट बनाते हैं। यही विशिष्ट नरोत्तम इस बार दतिया के उपचुनाव में टिकट से वंचित रहे। दादा का बेटिकट होना दादा के समर्थकों को कितना नागवार गुजरा, यह बीजेपी के नये नवेले उम्मीदवार के नाम का ऐलान होते ही जगजाहिर हो गया। दादा नहीं तो कोई नहीं की रौ में दादा के उग्र समर्थकों ने खूब बवाल काटा। और दादा ...? बेबसी में दादा की आंखों में आंसू तिर आये। अब दादा कुछ बोलें या मौन रहें, मगर ये अबोले आँसू मुखर होकर गुल खिला रखे हैं। उनकी यह बबसी और मायूसी उनके समर्थकों को इस कदर साल रही है कि उन्होंने बीजेपी को सबक सिखाने का मन बना लिया है। दतिया में सामान्य वर्ग में ब्राह्मण सबसे बड़ा वोट बैंक हैं। यह बैंक पहले विभाजित था, किंतु नये परिप्रेक्ष्य में तकरीबन पूरा समुदाय बीजेपी के हाथों से छिटक गया है।  
दादा नरोत्तम इस चुनाव में प्रत्याशी नहीं हैं। न तो वह दलीय प्रत्याशी हैं और न ही निर्दल, लेकिन चुनावी-दंगल में उनकी मौजूदगी महसूस की जा रही है। पार्टी ने उनकी गति सांप-छछूंदर सी कर दी है। सुविचारित रणनीति के तहत उन्हें चुनाव प्रचार की कमान सौंपा दी गयी है। कमेटी में इस्तीफा दे चुके उनके समर्थक पदाधिकारी भी हैं। पार्टी के लिये दादा को तन-मन-धन झोंकना होगा। हालाँकि, संभावना नगण्य है, किंतु फर्ज कीजिये कि बीजेपी के आशुतोष जीत जाते हैं, तो सेहरा किसके सिर बँधेगा? पार्टी नेतृत्व की जय-जयकार होगी और स्थानीय राजनीति में दादा हाशिये में सरक जायेंगे। अगले चुनाव में उनका दावा भी कमजोर होगा। यदि उन्हें कोई निगम-मंडल सौंपा भी गया तो उससे उनके रूतबे की भरपाई न होगी। और अगर्चे बीजेपी दतिया का दंगल हारती है, तो ठीकरा दादा के सिर फूटेगा। ऐसे में दादा तिरस्कृत और दंडित होंगे। अवधेश नायक की सक्रियता से कांग्रेस को बल मिला है और विभिन्न नेताओं के बयानों से दादा की निष्ठा संदिग्ध हो रही है। ऐसा नहीं है कि दादा इसे समझ नहीं रहे हैं, मगर वे निरूपाय हैं। उनके ग्रहयोग बुरे चल रहे हैं। दिल्ली के उनके आका भी उनकी टिकट बचा नहीं सके। एक नामालूम सा स्वयं सेवक बाजी मार ले गया। अब दतिया है, दादा हैं और चुनाव हैं। गत चुनाव में दादा करीब सात हजार मतों से हारे थे और करीब इतने ही वोटर एसआईआर में लिस्ट से हटाये गये थे। जब वक्त बुरा हो तो धार्मिक टोटके काम नहीं आते। यह अकारण नहीं है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दतिया में जिताने का जिम्मा लेने से इंकार कर दिया। अब दंगल में उतरे तेईस मल्लों में से जीते कोई एक, मगर दंगल नहीं लड़कर भी हारेंगे दादा नरोत्तम। 

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