राजेश बादल
मध्यप्रदेश में इन दिनों तबादलों की बहार है।आए दिन सूचियाँ जारी हो रही हैं।इन तबादलों में भारतीय प्रशासनिक,पुलिस और वन सेवा के आला अफसर शामिल हैं।देर रात या कभी-कभी तो आधी रात को स्थानांतरण हुक्मनामे जारी हो रहे हैं।एक ज़िला कलेक्टर रात को सोता है तो वह एक ज़िले का शिखर अधिकारी होता है।सुबह जागते ही पता लगता है कि वह ज़िले का कलेक्टर नहीं रहा।मध्य प्रदेश ही नहीं,भारत के अनेक प्रदेशों में भी यही शैली कुछ बरस से देखी जा रही है।संसार का सबसे बड़ा प्रशासनिक नेटवर्क मुख्यमंत्रियों की सनक का शिकार हो रहा है।यह बुनियादी तौर पर प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की औपचारिक आचरण संहिता संबंधी अधिनियम और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन है।विडंबना यह कि इस विसंगत व्यवस्था का कोई विरोध नहीं करता।न कार्यपालिका,न विधायिका,और न ही न्यायपालिका से अपील होती है।विधायक से लेकर सांसद और मंत्रियों को अपने निर्वाचन क्षेत्र में पसंद के अधिकारी चाहिए।यह साफ़ तौर पर अन्य अफसरों की प्रतिभा का अपमान है कि निर्वाचित प्रतिनिधि उन पर भरोसा नहीं करता।अप्रत्यक्ष रूप से संदेह भी होता है कि कहीं जन प्रतिनिधि और अफसर के बीच अनैतिक रिश्ता तो नहीं है,जिसमें कमीशन की मलाई भी है। कोई भ्रष्टाचारी संबंध नहीं भी हो तो जिले में मिलने वाली सुविधाएं और बिना मांगे मिलने वाला कमीशन इतना होता है कि अफसर विरोध नहीं करता।
दरअसल 1964 में सबसे पहले इस क़ानून की ज़रूरत महसूस की गई कि आईएएस और आईपीएस जैसी सेवाओं के लिए सख़्त क़ानून होना चाहिए। उसी साल अधिनियम संसद में लाया गया।इसमें कहा गया कि नियम होते हुए भी अधिकारियों की भूमिका को लेकर संदेह हैं।इनमें कहा गया है कि सरकारी अधिकारी- कर्मचारी राजनीतिक आंदोलन में भाग नहीं लेंगेऔर न उसका समर्थन करेंगे।वह किसी भी रूप में सियासी पार्टी की मदद नहीं करेगा।नियम में स्पष्ट है कि यह किसी भी अर्थ में राजनीतिक आंदोलन की संपूर्ण परिभाषा नहीं है।किसी संगठन के उद्देश्य और गतिविधियाँ राजनीतिक हैं या नहीं,यह तथ्यात्मक है।इसका निर्णय मामले की योग्यता के आधार पर होगा।हालाँकि अफसरों और कर्मचारियों को चेतावनी ज़रूरी है कि वह ख़ुद को संतुष्ट करे कि उसका उद्देश्य और गतिविधियाँ ऐसी नहीं हैं जो आचरण नियमों के नियम 23 (अब नियम 5) के तहत दंडनीय हों।यह भी साफ़ किया गया था कि कार्रवाई के नतीजों के लिए पूरी तरह से वह दोषी होगा।अज्ञानता या गलतफहमी का बहाना नहीं चलेगा।वह न तो किसी राजनीतिक दल को चंदा देगा और न अपने प्रभाव से व्यक्ति या संस्था को चंदा देने के लिए मजबूर करेगा।क़ानून यह भी कहता है कि सभी अधिकारी कर्मचारी चुनाव के दिनों में सौ फ़ीसदी निष्पक्ष होंगे।उल्लंघन होने पर 3 महीने की क़ैद,निलंबन या बर्ख़ास्तगी हो सकती है।इसके अलावा राजनीतिक रैलियों में भाग लेना,भीड़ को लाने के लिए परिवहन व्यवस्था करना आचरण नियमों के ख़िलाफ़ है।इसके बाद 1968 में क़ानून में संशोधन किया गया।कहा गया कि अधिकारियों को उच्च नैतिकता,सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का प्रदर्शन करना चाहिए।वे तटस्थ रहें और काम तथा फैसलों में पारदर्शिता रखें।संवैधानिक मूल्यों की सर्वोच्चता उनका कर्तव्य है।नियम तय करता है कि अधिकारी हर समय उच्च स्तर की शालीनता और व्यावसायिकता बनाए रखें।
अब तबादलों पर आते हैं।इन दिनों मुख्यमंत्रियों के चुनाव में आलाकमान का भरोसा ही प्रधान पैमाना है।उनका संसदीय और प्रशासनिक कौशल गौण है।इसलिए पद पर बैठते ही वे अफसरों को ताश के पत्तों की तरह फेंटना शुरू कर देते हैं।मुख्यमंत्री रहे एक राजनेता ने वर्षों पहले मुझे बताया था कि कुछ अफसर पैसा उगाही के हुनर में दक्ष होते हैं।उन्हें पार्टी के लिए चंदा भी देना होता है तो बिना बदनामी मोल लिए ऐसे अधिकारियों को उस जगह तैनात किया जाता है,जहाँ से पैसा अधिक मिले। भले ही ईमानदार अधिकारियों की उपेक्षा हो जाए।उनका तर्क था कि ईमानदार अफसर चुपचाप काम करते रहते हैं।वे ग़लत का विरोध भी नहीं करते।उनकी रीढ़ कमजोर होती है।इसके बाद आते हैं मंत्री।मुख्यमंत्री के कोटे से अधिकारी बच जाते हैं तो फिर वे पसंद के अधिकारियों को अपने इलाके में तैनात कराते हैं।विधायक और सांसद निधि के पैसों पर अक्सर इसीलिए आरोप लगते हैं।इसके बाद विधायकों का दबाव होता है।वे उन अघिकारियों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों में ले जाते हैं,जो उनके लिए पैसे की उगाही कर सकें और चुनाव में मतदाताओं को प्रभावित कर सकें।इन दिनों तबादलों की बाढ़ का यह भी एक कारण है।कुछ प्रदेशों में साल भर में विधानसभा चुनाव होने हैं।डेढ़ महीने पहले आचार संहिता लगनी है।ज़ाहिर है,जहाँ पर जो दल सत्ता में है,उसके विधायक और सांसद पसंदीदा नौकरशाहों को अभी से तैनात करने में लगे हैं।
इन सियासी प्राथमिकताओं में नियम -क़ानून धरे के धरे रह जाते हैं।मसलन अखिल भारतीय सेवा नियमावली कहती है कि आईएएस और आईपीएस के तबादले केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ( डीओपीटी ) तथा संबंधित राज्य के कैडर नियम -1954 से संचालित होंगे।तेरह साल पहले माननीय सुप्रीम कोर्ट ने टीएसआर सुब्रमण्यम बनाम भारत सरकार मामले में स्पष्ट निर्देश दिया था कि अधिकारियों को एक पद पर न्यूनतम निश्चित कार्यकाल दिया जाना ज़रूरी है।राज्यों से कहा गया था कि तबादलों की सिफारिश के लिए मुख्यसचिव की अध्यक्षता में सिविल सर्विसेज बोर्ड का गठन करें।इसमें मुख्य सचिव,मुख्यमंत्री और राज्यपाल सदस्य होंगे।मौखिक निर्देश पर तबादले नहीं होंगे।इन दिनों राजनेता कहीं भी सभा अथवा रैली में भीड़ को प्रसन्न करने के लिए कलेक्टर एसपी के तबादले की घोषणा कर देते हैं।वे उनके सम्मान की चिंता नहीं करते और माइक पर अपमानित करते हुए उनके ट्रांसफर का ऐलान कर देते हैं।यह ग़ैर क़ानूनी है।क्या हमारे राजनेता इस सियासी शुचिता को समझेंगे ?





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