राजेश बादल
अमेरिका - इज़रायल और ईरान के बीच देर रात हुए दो सप्ताह के युद्ध विराम पर आख़िर विश्व बिरादरी को क्यों यक़ीन करना चाहिए था ? यह ऐसा सवाल था,जो जंगबंदी के ऐलान के साथ ही यक्ष प्रश्न की तरह जानकारों के सामने उपस्थित था और जिसका उत्तर खुद जंग में शामिल देश भी नहीं जानते थे ।क्योंकि अमेरिका-इजरायल और पाकिस्तान अपनी घोषणाओं से कब पलट जाएँ ,कोई नहीं कह सकता। पाकिस्तान एक नक़ली राष्ट्र है। एक नक़ली देश असली युद्ध विराम कैसे करा सकता था। वह तो अमेरिका की कठपुतली है। अन्यथा वह बलोच विद्रोहियों से समझौता कर सकता था ,अफ़ग़ानिस्तान से समझौता कर सकता था और ईरान से तो उसके अनेक मसलों पर गंभीर मतभेद हैं। आज तक बातचीत की किसी मेज़ पर पाकिस्तान नहीं आया क्योंकि दरअसल पाकिस्तान में ऐसी कोई मेज़ है ही नहीं। वह तो घबराए ट्रंप का हुकुम था। पाकिस्तान ने वही किया। यही उसका चरित्र है।
दुनिया के तमाम मुल्कों की तो बात इसलिए अलग है क्योंकि ट्रंप उनकी सुनते नहीं हैं। डोनाल्ड ट्रंप चंद रोज़ पहले जिस अभद्र भाषा और अश्लीलता पर उतर आए थे,उस स्तर पर तो किसी भी देश का प्रमुख नहीं जा सकता था ।ट्रंप की द पुस्तक आर्ट ऑफ़ द डील को अमेरिकी लोग अब निश्चित रूप से रद्दी की टोकरी में फेंक देना चाहेंगे।चार दशक पहले कारोबारी नज़रिए से लिखी गई किताब का आज कोई सियासी अर्थ नहीं रहा है। क्योंकि युद्ध का उन्माद ट्रंप के ऊपर इस क़दर हावी था कि वे समूचे विश्व के मान्य सिद्धांत और मार्गदर्शक निर्देशों को भुला बैठे थे।अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर अमल नहीं करने की तो उन्होंने जैसे शपथ ले रखी है। राष्ट्रपति एक प्राचीन विरासत और सभ्यता वाले देश को पाषाण युग में पहुँचाने की बात करने लगे थे।वे भूल गए कि सभ्यता कोई दो-चार साल में विकसित होने वाली प्रक्रिया नहीं है।सभ्यताओं का विकास लंबी,जटिल और बारीक़ रेशे वाली सामाजिक परिवर्तनों की हज़ारों साल चलने वाली श्रृंखला से होता है। उसे कोई ख़तरनाक परमाणु बम गिराकर नष्ट नहीं कर सकता। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने से वहाँ की सभ्यता तो नष्ट नहीं हुई।आज का जापान इसका प्रमाण है। दरअसल अमेरिका के अतीत - गर्भ में ही भयावह विनाशकारी बीज आज भी मरे नहीं हैं,जो गाहे - बगाहे अपने होने का सुबूत देने के लिए फड़फड़ाते रहते हैं।
तो फिर अब क्या हुआ ? अमेरिका कभी अपने ज़िद्दी स्वभाव और आक्रामकता को नहीं छोड़ता। बीते तीन दशक इसका गवाह हैं। लेकिन इस बार ईरान जैसे एक परंपरागत राष्ट्र ने उसे बातचीत की मेज पर लाने को मजबूर कर दिया था । ट्रंप को उसी शैली में उत्तर देने वाला नहीं मिला था ।अभी तक की सारी बंदरघुड़कियों ने ईरान पर कोई असर नहीं किया था ।ईरान के शिया मुसलमान आमतौर पर सुन्नियों जैसे कट्टर और लड़ाकू नहीं हैं।फिर भी अगर वे मरने मारने पर आ जाएँ तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता है। यहीं उनकी अपनी सभ्यता के बीज भी छिपे हुए हैं,जिन्हें ट्रंप नष्ट करने पर उतारू थे ।यह उनकी खौफनाक भूल थी।अस्सी के दशक में ईरान और इराक कई साल तक युद्ध लड़ते रहे ।यह युद्ध बीसवीं सदी के सबसे लंबे और विनाशकारी युद्धों में से एक है। इराक़ ने ईरान पर आक्रमण किया था।यह जंग आठ साल चली थी। इसमें भारी विनाश हुआ था। उसमें रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ था। क्या ट्रंप की सेना आज इतनी लंबी लड़ाई के लिए तैयार है ? इस बार तो इराक समेत नाटो के अनेक देशों ने ट्रंप से किनारा कर लिया ।यूरोपीय देशों ने अपनी अलग राह पकड़ ली है । आज ट्रंप के पास अंध समर्थक देशों का कौन सा समूह है ? शायद कोई भी नहीं। ख़ुद अमेरिका के करोड़ों मतदाता ट्रंप के इस रवैए पर खफा हैं ।अमेरिका में हुए अनगिनत प्रदर्शन साक्षी हैं।
यह विडंबना है कि अपना कोष हथियारों और गोला बारूद के नाम पर ख़ाली करने वाले डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की आर्थिक बदहाली देखना ही नहीं चाहते।उन्हें पता है कि अमेरिका पर कुल ऋण 3096 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक है।क़र्ज़ राष्ट्र की कुल जीडीपी का 127 फीसदी से भी अधिक है।इस देश को प्रतिदिन दो अरब डॉलर केवल ऋण का ब्याज चुकाने पर खर्च करने पड़ रहे हैं। आँकड़े कहते हैं कि प्रत्येक अमेरिकी नागरिक पर क़रीब एक करोड़ रुपये का ऋण है।यह विश्व में सर्वाधिक है।बताने की ज़रूरत नहीं कि सैनिक साजो-सामान और गोला-बारूद पर अमेरिका का व्यय सर्वाधिक है।तटस्थ समीक्षा करें तो पाते हैं कि अमेरिका ने खुद को इन युद्ध जैसी परिस्थितियों में उलझाया है। चाहे वह अफ़ग़ानिस्तान में किया हो ,यूक्रेन का साथ देने पर किया गया हो या फिर ईरान के ख़िलाफ़।इन दिनों अमेरिका में बहस का मुद्दा है कि राष्ट्रपति को संविधान प्रदत्त असीमित अधिकार कहाँ तक जायज़ हैं और क्या अब समय आ गया है,जब संविधान की समीक्षा की जाए ।
विडंबना है कि इज़रायल पूरे मामले में ठगा सा महसूस कर रहा है। सूत्रों की मानें तो डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध विराम से पहले नेतन्याहू से विचार विमर्श भी आवश्यक नहीं समझा।पाकिस्तान और ईरान ने साफ़ तौर कहा है कि लेबनान भी युद्ध विराम में शामिल है। इसके उलट इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने एक अधिकृत बयान में स्पष्ट किया है कि लेबनान युद्ध विराम का हिस्सा नहीं है। इसलिए इधर जंगबंदी की घोषणा हुई और उधर इज़रायल ने हमले शुरू कर दिए। अब अमेरिका और पाकिस्तान किसी को मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचे हैं।
अब आते हैं पाकिस्तान पर। ईरान और अमेरिका दोनों ने उसका शुक्रिया अदा किया था । ईरान और पाकिस्तान के बीच बलूचिस्तान के मसले पर लंबे समय से तनाव जारी है। लेकिन फिलहाल ईरान ने युद्ध विराम प्रस्ताव स्वीकार तो किया है।लेकिन इसके पीछे इरादे क्या हैं। कोई नहीं कह सकता। अमेरिका किसी भी कीमत पर जंग से बाहर निकलना चाहता था। पर इज़रायल और ईरान अभी ख़ामोश नहीं बैठेंगे।दो सप्ताह का समय ईरान के लिए काफी था । वह अपनी युद्ध की तैयारियों को नया रूप दे सकता है और नए सिरे से अपने नेतृत्व का चुनाव कर सकता है। भारत ने शायद ठीक ही ईरान से तत्काल भारतीयों को स्वदेश लौटने के लिए कहा है। बहुत सारी ख़ुफ़िया सूचनाएं होती हैं ,जो साझा नहीं की जाती हैं। आशंका तो है कि पंद्रह दिन बाद जंग का कोई नया रूप देखने को मिल सकता है। इसलिए भारतीयों का स्वदेश लौटना ही उचित है।




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