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Added on : 2026-03-28 07:41:34

    डॉ. सुधीर सक्सेना 
इस्रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के उकसावे पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी खब्त में आकर मध्यपूर्व में जंग के शिकंजे में अपने पाँव बुरी तरह फँसा लिये हैं। संप्रति अमेरिका की हालत 'निगलत-उगलत पीर घनेरी' मार्का हो गयी है। 28 मार्च को युद्ध छिड़े पूरा एक माह बीत गया, लेकिन उसका एक भी इरादा पूरा होना तो दूर रहा, उलटे उसकी भद्द पिटने का दौर जारी है। साँप-छछूंदर गति के वशीभूत लगातार रंग बदलते ट्रंप ने ईरान के दो शीर्ष नेताओं-विदेश मंत्री अराघाची और स्पीकर गालिबफ को अभयदान देने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि ये दोनों नेता अब इस्रायल की 'हिटलिस्ट' में नहीं है और इस्रायल खामेनेई और लारीजानी की भांति उन्हें मारने के लिये एयर स्ट्राइक नहीं करेगा। मजेदार बात यह है कि उन्होंने यह कदम अमेरिका और ईरान के मध्य मध्यस्थता कर रहे आतंकवादी राष्ट्र पाकिस्तान के फौजी शासक असीम मुनीर की गुजारिश पर उठाया है। मुनीर का तर्क है कि यदि उक्त दोनों शीर्ष ईरानी नेता जीवित नहीं रहे, तो अमेरिका वार्ता किससे करेगा? गौरलतब अयातुल्लाह खामेनेई के उत्तराधिकारी मोज्तबा खामेनेई को आहत अवस्था में तेहरान से निकालने में रूस सफल रहा है और उनका इन दिनों मस्क्वा में उपचार हो रहा है। अमेरिका के लिए परेशानी का एक और सबब यह भी है कि वह ईरान में इस्लामी हुकूमत को अपदस्थ कर अपनी कठपुतली सरकार बिठाने में विफल रहा है। उलटे इस्लामी हुकूमत के पीछे अवाम के एकजुट होने से उसके पाये और मजबूत हुये हैं। यह भी साफ हो गया है कि आर्यमेहर रजा शाह पहलवी के बेटे को निर्वासन से वापसी और राज्याभिषेक में ईरानी अवाम की कोई रूचि नहीं है। 
अराघाची और गालिबफ को अभयदान को राष्ट्रपति ट्रंप के नये पैंतरे के तौर पर देखा जा रहा है। इसके जरिये वह अपनी जंगजू इमेज को 'सदाशयी मोड' में लाना चाहते हैं तथा बरसों से पाबंदियों और जंग-दर-जंग झेल रहे ईरान में अपेक्षाकृत लिबरल लॉबी खड़ी करना चाहते हैं। पिछले एक माह में उनके नुकसानों की फेहरिश्त लंबी है। उन्हें उम्मीद थी कि ईरान-प्रसंग एक हफ्ते में निपट जायेगा। लेकिन यह उनकी खामख्याली साबित हुई। ईरान ने खूब मोर्चा लड़ाया। उसने प्रत्यक्रमण कर कतर, दुबई, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, ओमान में तो कहर बरपाया ही, सुदूर डियागोगार्सिया तक मिसाइलें दाग कर इस्रायल-अमेरिका धुरीको चौंका दिया। ईरान की कार्रवाई से एक तो उक्त देशों का अमेरिका के सुरक्षा कवच पर भरोसा टूटा। दूसरे, इस्रायल के 'आयरन डोम' का मिथ भी खंडित हो गया। एक और बड़ी बात यह हुई कि अमेरिका-पोषित नाटो में दरारें पड़ गयीं और इटली-स्पेन जैसे राष्ट्रों ने सहयोग के नाम पर हाथ खड़े कर दिये। नतीजतन खीझ में आकर ट्रंप ने नाटो-राष्ट्रों को 'कायर' की संज्ञा दे डाली। ट्रंप को एक और निजी मलाल यह है क गालिबफ ने उनके दामाद किश्नर और विटकोफ से वार्ता से इंकार कर दिया और जेडी वांस से बातचीत की इच्छा व्यक्त की। 
घड़ी की सुइयां तेजी से घूम रही हैं। दुनिया अभूतपूर्व ऊर्जा और ईंधन संकट की ओर बढ़ रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान के कब्जे और निगरानी में है। ईरान वहां फौरी कार्रवाई कर वैश्विक संचार प्रणाली को तहस-नहस कर सकता है। खर्ग द्वीप पर अमेरिकी कार्रवाई यकीनन जबर्दस्त जवाबी कार्रवाई को न्यौता देगी। अगर्चे अमेरिका ने वहां मैरीनार और जमीनी टुकड़ियां भेजीं तो जंग बेमियादी दौर में पहुंच जायेगी और अमेरिका को वियेतनाम और अफगानिस्तान जैसी विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ेगा। सुलह के लिये अनाक्रमण संधि और हर्जाने पर अड़े ईरान ने यदि छंकाने के लिये हमस हिजबुल्लाह और हूती जैसे संगठनों को छू कर दिया तो इस्रायल के लिये मोर्चा संभालना मुश्किल होगा। इस्रायल के रक्षा मंत्री यूं भी सेना में मानव संसाधनों की कमी का रोना रोते देखे गये हैं। 

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