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Added on : 2026-02-28 09:43:06

अजय बोकिल 

कभी नफासत का पर्याय रहे लखनऊ में एक बेटे ने अपने कारोबारी बाप की जिस निर्ममता और निर्लज्जता कर टुकड़े टुकड़े कर ड्रम में भरा, उससे तो यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या अब मां-बाप को अपने ही बच्चों से सतर्क रहने का वक्त आ गया है? लखनऊ की इस दहला देने वाली घटना के पीछे बाप-बेटे के रिश्तों में तनाव और संदिग्ध चरि‍त्र की बातें भी सामने आ रही है, बावजूद इसके ऐसा लगता है कि इस पीढ़ी के लिए किसी की भी और किसी भी कारण से हत्या सोशल मीडिया पर भावविहीन चैट से ज्यादा मायने नहीं रखती। यहां माता-पिता का मूल्य एक जैविक जन्मदाता से अधिक नहीं है। कोई भी प्रतिक्रिया अतिवाद की पराकाष्ठा तक जा पहुंचती है। ‘बुढ़ापे की लाठी’ और ‘वृद्धावस्था का सहारा’ जैसे जुमले बेमानी होने लगे हैं। और यह बात केवल लखनऊ की एक घटना भर से सिद्ध नहीं होती। विगत एक वर्ष में ऐसी कई वीभत्स मामले सामने आए हैं, जब बेटे या बेटियों ने बहुत तुच्छ कारणों से अपने मां अथवा बाप या फिर दोनो को ही मौत की नींद सुलाने में कोताही नही की। इस भयंकर कृत्य को अंजाम देने के बाद उनकी बाकी जिंदगी कैसे गुजरेगी, इस बारे में क्षण भर भी नहीं सोचा। जो मन में आया सो कर दिया। न कोई अफसोस, न मलाल। इन सभी घटनाअों में एक बात काॅमन दिखती है, वह है पारिवारिक रिश्तों में तनाव और संवादहीनता।

हाल की ऐसी कुछ गंभीर घटनाएं देखें-

1. लखनऊ में बेटे ने बाप की गोली मार कर हत्या कर दी। फिर उसके शरीर के टुकड़े टुकड़े किए। कुछ हिस्सा नदी में फेंका और बाकी ड्रम में भर दिया। बाप की गलती यह थी कि उसने बेटे को पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करने को कहा था। बाप की निर्मम हत्या की उसकी बहन को भी थी। लेकिन वो किसी कारण से चार दिन तक चुप रही। यानी यहां अधीरता और धीरता दोनो की पराकाष्ठा है। 

2. यूपी के मुजफ्फरनगर जिले के मोरना 

गांव में दो सगी बहनों ने तड़के तीन बजे अपने पिता राम प्रसाद की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी। दोनों पिता की कड़ी पाबंदियों, सतत टोका-टाकी, बेटे और बेटी में फर्क करने और शादी नहीं करने की वजह से नाराज थीं। ध्यान भटकाने के लिए उन्होंने विधवा हो चुकी मां के आसूं पोछें। मामला थाने पहुंचते ही पर्दा हटा तो दोनों के आंसू सूख गए। पता चला कि पिता ने पूर्व में किसी बात पर बड़ी बेटी को चांटा मार दिया था। उसका बदला उसने पिता को ही ठिकाने लगाकर लिया। दोनों बहनें पिता से छिपकर एक मोबाइल चलाती थीं। उन्हें रील में ही सुनहरे ख्वाब और बेटियों की आजादी दिखती थी।

3.जयपुर में इकलौते बेटे ने अपनी मां की बेरहमी से हत्या इसलिए कर दी, क्योंकि मां ने वाई-फाई कनेक्शन कटवा दिया था। यह हत्या भी उसने तब की, जब आरोपी की बहन की पांच माह बाद शादी होनी थी। बेटा किसी प्रायवेट कंपनी में काम करता था, साथ में नशे का भी आदी था। उसकी पत्नी भी साथ छोड़ गई थी। हत्यारे बेटे के अभागे पिता ने बेटे को फांसी देने की गुहार की है।  

4. तमिलनाडु के कडप्पा जिले के प्रोद्दातुर कस्बे में एक बेटे ने अपनी मां की गला काट कर हत्या कर दी और बाद में आराम से टीवी देखता रहा। मां शिक्षिका थी और हत्यारा बेटा बेरोजगार इंजीनियर। मां बेटे को नियमित पैसे भेजती थी, लेकिन मांग ज्यादा बढ़ जाने पर उसने पैसे भेजने से इंकार कर दिया। नतीजा उसे अपने ही बेटे के हाथों जान गंवानी पड़ी।

 

5.महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के डोंगरगांव में एक नशेड़ी बेटे ने अपनी वृद्ध मां को सिर्फ इसलिए बेरहमी से मार डाला, क्योंकि खाने में उसने बेटे की मनपसंद सब्जी नहीं बनाई थी। हत्या के बाद बेटे ने अचार के साथ शराब पीकर मां की ‘मौत का जश्न’ भी मनाया। 6:महाराष्ट्र के ही कोल्हापुर के माकडवाला इलाके में हुई एक वीभत्स घटना में बेटे ने मां की न केवल हत्या की बल्कि बाद में उसके अंगों को पकाकर नमक मिर्च लगाकर खाया। इस राक्षसी कृत्य के लिए अदालत ने उसे मृत्युदंड ‍िदया। बेटे ने मां की हत्या सिर्फ इसलिए की थी, क्योंकि उसने शराब पीने के लिए पैसे नहीं दिए थे।  

5. यूपी के हरदोई जिले के ग्राम बेहटागोकुल में एक नशेड़ी बेटे ने अपनी मां का कत्ल इसलिए कर दिया, क्योंकि उसने 300 रू. देने से इंकार कर दिया था। 

6. छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के हरदीबाजार थाना क्षेत्र में एक बेटी ने अपने बाप की हंसिए से गला काटकर हत्या कर दी, क्योंकि बाप को बेटी की उन्मुक्त जीवनशैली पसंद नहीं थी। 

 

इन तमाम घटनाअों में चाहे वह बेटे हों या बेटियां, उस उम्र के हैं, जिन्हे जेन जी कहा जाता है। ये वो पीढ़ी है, जो सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई है। जिसने संचार क्रांति के कारण घटती भौगोलिक दूरियों और आपसी रिश्ते में बढ़ती दूरियों को एकसाथ भोगा है। चौबीसों घंटे सोशल मीडिया के जरिए संपर्क की अति को जीया है। उनकी असल और वर्चुअल दुनिया में बहुत धुंधली सी लक्ष्मण रेखा बची है। तर्क दिया जा सकता है कि कतिपय युवाअों के जघन्य अपराधों की वजह से पूरी पीढ़ी को एक तराजू में तौलना गलत है। मान लिया, लेकिन अभी तो यह शुरूआत है। पहले भी ऐसी घटनाएं अपवादस्वरूप होती थीं। अब चिंता की बात यह है कि ऐसी घटनाएं न केवल बढ़ रही है, बल्कि वह अब नया आकार लेते समाज का चरित्र भी बनती जा रही है। 

जरा सोचिए कि इस पीढ़ी और उसके भी बाद आने वाली पीढ़ी का समाज कैसा होगा, जो अब एआई के साथ ही बड़ा होने वाला है। आवेश, क्रोध, निर्दयता, हिंसा, रिश्तों को ठुकराना भी मनुष्य के ही दुर्गुण हैं, लेकिन उसे मानव समाज का सामान्य चरित्र कभी नहीं माना गया। न ही उसे कभी सामाजिक स्वीकृति मिली है। स्वीकृति तो अब भी नहीं है, लेकिन अब सामाजिकता के अर्थ बदल रहे हैं। कम से कम भारतीय समाज में तो मां-बाप को देवतुल्य माना गया है। लेकिन उपरोक्त घटनाअों की गहराई में जाएं तो इस मान्यता का अब कोई सामाजिक और नैतिक मूल्य नहीं रह गया है। मां-बाप की हैसियत अब केवल एक एटीएम, सहवास के परिणामस्वरूप बने जैविक जन्मदाता और खारिज करने योग्य पीढ़ी के तौर पर रह गई है। कहीं कोई कृतज्ञता का भाव नहीं है। पहले संयुक्त परिवारों में मां-बाप असेट थे। एकल परिवारों में उनकी हैसियत ढोने लायक बोझ की रह गई। अब तो मामला उससे भी कहीं आगे जा चुका है। यानी बच्चों को उनकी मनमर्जी से जीने नहीं दिया गया, सन्मार्ग पर चलने की सीख भी दी तो मां-बाप को अपनी गर्दन कटवाने के लिए तैयार रहना चाहिए। यकीनन नई पीढ़ी पर पुराने पारिवारिक मूल्य अथवा जीवन संस्कार लादना न तो सही है और न ही प्रासंगिक, फिर भी परिवार संस्था जिंदा रखने का मां-बाप का आग्रह, दुराग्रह तो नहीं माना जा सकता। क्योंकि व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज तथा समाज से ही राष्ट्र जिंदा रहता है। अगर इस वटवृक्ष की जड़ों में मट्ठा डालने को ही आधुनिक और उन्मुक्त जीवन शैली के रूप पुरस्कृत करने का आग्रह है तो भविष्य का एकाकी और एकांगी समाज कैसा होगा, इसकी कल्पना भी सिहरा सकती है। ऐसा समाज जिसमें सौहार्दपूर्ण रिश्ते, भावना, संवेदना, परस्पर प्रेम, करूणा, नैतिक आग्रह और पारिवारिकता का कोई अर्थ नहीं होगा। हर कोई मन मुताबिक जीएगा या ‍मरेगा अथवा किसी को कभी भी, किसी भी कारण से मार देगा। यह तो घोर अराजक स्थिति होगी। 

मनोविज्ञानी भी इस बदलाव को बहुत गंभीरता से देख और समझने की कोशिश कर रहे हैं। मनोविश्लेषकों के मुताबिक युवा पीढ़ी के इस असामान्य व्यवहार का एक बड़ा कारण सोशल मीडिया का उनकी जिंदगी में अत्यधिक दखल, धृष्ट जीवन शैली, जीवन की जमीनी वास्तविकताअों से लगातार कटते जाना, परिवार और समाज में आंतरिक तनाव और संवादहीनता, जलवायु में तेजी से बदलाव, सतत वर्चुअल संपर्क के बावजूद अधिकांश युवाअों का अवसाद में रहना, भावनात्मक शोषण तथा निरंतर व्यग्रता इसके प्रमुख कारण हैं। तात्कालिक आवेश में आकर कोई संगीन अपराध कर बैठना एक बात है और सुनियोजित तरीके से पश्चातापविहीन गुनाह करना दूसरी बात है। माता-पिता की बात आदर भाव से सुनना तो दूर उसे अब मित्रता के भाव से लेने का चलन भी पुराना पड़ चुका है। 

चाहे लखनऊ की घटना हो या फिर महाराष्ट्र की, सहनशीलता का स्तर शून्य तक जा पहुंचा है। ये वो पीढ़ी है, जो केवल आज और अपने बारे में ही सोचती है। जीवन में जरा-सी भी ऊंच- नीच इन्हें हत्या अथवा आत्महत्या की तरह तरफ धकेलने में देर नहीं करती। सबसे बड़ी चिंता ये है कि मनुष्य का मनुष्य पर से ही विश्वास मिटता चला जा रहा है। लखनऊ की घटना इसकी एक भयानक बानगी भर है।

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