• डॉ. सुधीर सक्सेना
कल का तुर्की और आज का तुर्किये एक प्राचीन राष्ट्र है, जिसकी जड़ें ईसा पूर्व की शताब्दियों में फैली हुई हैं। भारतवर्ष से भी इसका नाता पुराना है और मध्ययुगीन भारत के इतिहास में इसका खासा दखल रहा है। तुर्किये का इस्तांबूल नगर विलक्षण है; इतिहास, भूगोल और वास्तु-वैभव तीनों दृष्टियों से इतना अद्भुत कि नैपोलियन बोनापार्ट जैसी महान शख्सियत भी इस पर निसार थी और उसने कहा था कि यदि दुनिया एक राष्ट्र होता तो इस्तांबुल उसकी राजधानी होता। तुर्किये की एक और खूबी यह है कि आधा तीतर, आधा बटेर की तर्ज पर यह एशियाई और योरोपीय भागों या आसक्तियों में बंटा हुआ है। दरअस्ल, यह एक यूरेशियाई राष्ट्र है। यूं तो इसकी जड़ें एशिया में हैं, अलबत्ता इसकी फुनगियां योरोप में दीखती हैं। इसकी रवायतें एशियाई हैं, मगर ख्वाब योरोपीय। सन 1952 से यह अमेरिकी प्रभुत्व के नाटो का मेंबर है और बरसों योरोपीय यूनियन की सदस्यता के लिये लालायित रहा। बीसवीं सदी के शुरू में इसे रूस जैसी महाशक्ति को हराने का श्रेय मिला। पहले विश्वयुद्ध में यह जर्मनी के साथ रहा, तो दूसरे महासमर में तटस्थ। इसी तुर्किये की रगों में फिलवक्त नया खून खलभला रहा है और वह नये सिरे से तूमार बाँध रहा है। इसकी झलक तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयप एर्दोगान के फैसलों और बयानों में देखी जा सकती है।
लगभग 8.8 करोड़ की आबादी के तुर्किये में 98 फीसद आबादी इस्लाम की अनुयायी है और सुन्नियों के बाद कुर्द सबसे बड़ा जातीय समुदाय है। तुर्की में अतीत पर गौरव की भावना प्रबल है और सेना को अवाम में प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त है। चौक-चौराहों और अन्यत्र सेना के प्रति आदर की भावना परिलक्षित होती है। मुस्तफा कमाल पाशा, जिन्हें अपार आदर से अतातुर्क कहा जाता है, को तुकी का कायाकल्प किये बमुश्किल एक सदी बीती है। सन 1923 में अतातुर्क (राष्ट्रपिता) ने तुर्की को गणराज्य घोषित किया और सन 1924 में संविधान लागू किया, जिसके फलस्वरूप तुर्की आज प्रजातांत्रिक सेक्यूलर गणतंत्र है। कमाल पाशा ने सियासत में सेना के दखल पर पाबंदी आयद की थी, किंतु सन 60 में कानूनी तब्दीली आईं। सन 1960, सन 1971 और सन 1980 में कू दे ता के प्रयास हुये, जो विफल रहे। ऐसा ही प्रयास जुलाई, सन 2016 में भी हुआ, जिसे संविधान के प्रति वफादार सेना ने विफल कर दिया। सन 2014 से एर्दोगान के राष्ट्रपति बने रहने से सेना के इस उपक्रम का महत्व आँका जा सकता है। वस्तुत: तुर्किये की सेना कमाल पाशा के संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और सेक्युलर ढांचे के प्रति प्रतिबद्ध है और संवधिान-संरक्षक की भूमिका निभाती दीखती है। तुर्क-समाज का एक और उल्लेखनीय पहलू है कि वहां साक्षरता 95 प्रतिशत है और सन 1453 में स्थापित इस्तांबुल विश्वविद्यालय समेत 166 यूनीवर्सिटियां कार्यरत हैं। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि तुर्की के पास नाटो सदस्य देशों में दूसरी सबसे बड़ी सेना है। करीब 4.80 लाख सैनिकों के अलावा उसके पास 3.80 लाख रिजर्व सैनिक हैं। तुर्क सेना के अधुनीकरण और उसे सुसज्ज करना राष्ट्रपति एर्दोगान की वरीयता है। तुर्क-आर्म्ड फोर्सेज (टीएएफ) अनुभव और मारक क्षमता में अद्वितीय है। उसे कोरियन युद्ध में पंद्रह हजार सैनिकों के जरिये शिरकत का तजुर्बा है और उसके करीब 50 से 60 हजार फौजी (यानि हर छह में एक) कतर, सीरिया, सोमालिया और दूरस्थ अंटार्कटिका में तैनात है। तुर्क फौजी अल्बानिया, अजर बैजान, इराक, बोस्निया, कोसोवो, लीबिया, उत्तरी साइप्रस, कतर, सोमालिया और सीरिया में 174 अड्डों पर मौजूद हैं। बतौर शांति रक्षक वे मध्य अफ्रीका, कांगो लेबनान और माली में तैनात रहे। बेल्जियम, जर्मनी, इटली और नीदरलैंड के साथ तुर्की नाटो की न्यूक्लिअर पॉलिसी शेयरिंग का सदस्य है।
जाहिर है कि मध्यपूर्व की जियोपालीटिक्स में तुर्किये की अवहेलना नहीं की जा सकती। वह चुनिंदा अमीर राष्ट्रों की पांत में शरीक और सामरिक दृष्टि से मजबूत स्थिति में है। अनुमान है कि अमेरिका उसे जल्द ही आधुनिक फाल्कन विमान देगा। यही वे सन्दर्भ हैं, जो मध्यपूर्व के परिदृश्य में उसके धूमकेतु की तरह अथवा केन्द्रीय ताकत के तौर पर उभरने की जहां संभावना जताते हैं, वहीं इस्रायल को सशंकित करते हैं। तुर्किये संख्या बल और ऊर्जा के मामले में पर्याप्त समृद्ध है। सन 2010 के बाद से इस्रायल से उसके रिश्ते बिगाड़ पर हैं। सन 2016 में वे किंचित सुधरे थे, लेकिन सन 2024 में गाजा में इस्रायली करतूतों के बाद से वे बद से बदतर होते गये हैं। आज स्थिति यह है कि तेल अवीव तुर्किये को एक बड़े खतरे के तौर पर देखता है।
तुर्किये भविष्य को लेकर अमेरिकी सैन्य विश्लेषक और सेवानिवृत्त कर्नल डगलस मैकग्रेगर का कथन इन दिनों चर्चा का विषय है। मैकग्रेगर का कहना है कि इस्रायल के अस्तित्व के लिये ईरान को खतरा माना जाता रहा है। फलत: ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों और युद्धों का सामना करना पड़ा और उसने मुसीबतें भी उठायीं। लेकिन सच तो यह है कि इस्रायल के लिये वास्तविक खतरा ईरान नहीं, वरन तुर्की है। तुर्की के पास मजबूत अर्थव्यवस्था, शक्तिशाली सेना, स्थिर संस्थागत ढांचा, महत्वपूर्ण सामरिक और भौगोलिक स्थिति तथा दूरगामी रणनीतिक लक्ष्य मौजूद हैं। आज अंकारा छह माह नहीं, बल्कि पचास सालों के दूरगामी ब्लूप्रिंट पर काम कर रहा है। हालत यह है कि व्हाइट हाउस अंकारा की उपेक्षा नहीं कर सकता। इसी के चलते ट्रंप उसे एफ 35 की खेप देने की दिशा में आगे बढ रहे हैं। विश्लेषकों को करोड़ों डॉलरों के जेट इंजन संबंधी समझौते पर भी गौर करना चाहिये और ट्रंप की एर्दोगान की तारीफ पर भी। एर्दोगान महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय नायक हैं और उन्हें ऑटोमन साम्राज्य की ऐतिहासिक विरासत का पता है।
तो क्या मध्यपूर्व समीकरणों के सर्वथा नये युग में प्रवेश कर रहा है? क्या तुर्किये मध्यपूर्व में नाभिकीय इयत्ता हासिल कर लेगा? क्या तुर्किये इस्रायल के लिये भावी संकट बनेगा? इस्रायल इस खतरे को भाँप रहा है। वहां भी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री गिला गमलियल का कहना है कि यदि ईरानी हुकूमत से निपट भी लिया जाता है तो उस्मानी साम्राज्य जैसी महत्वकांक्षाएं सामने आ सकती हैं। यदि तुर्की अपनी सीमाओं से बाहर निकलता है, तो वह इस्रायलियों के लिए खतरा बन सकता है।
तुर्की के अपने पड़ोसियों, खासकर शिया बहुल अजर बैजान से अच्छे संबंध हैं। अंकारा ने इस्लामाबाद से भी तार जोड़ रखे हैं। इधर तुर्की, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब और ईरान के संयुक्त बल (ज्वायंट फोर्स) के गठन की भी सुगबुग है। एर्दोगान कई योजनाओं पर काम कर रहे हैं। इधर उन्होंने लंबित इस्तांबुल कैनाल प्रोजेक्ट पर भी ध्यान दिया है। किस्सा कोताह यह कि अंकारा की अहमियत दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और इसमें शक नहीं कि तुर्किये संकटग्रसत मध्यपूर्व में 'डार्क-हॉर्स' के तौर पर उभर रहा है।








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