राजेश बादल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जैसे भारत के विरुद्ध अघोषित जंग छेड़ दी है। यह जंग हथियारों और फ़ौज - फाटे के दम पर नहीं लड़ी जा रही है। स्पष्ट है कि भारत को वैश्विक स्तर पर एक कारोबारी महाशक्ति बनने से रोकने के लिए यह जंग छेड़ी जा रही है और इस मामले में चीन उसका साथ दे रहा है। रूस और भारत के विरुद्ध चीन अमेरिका को अप्रत्यक्ष समर्थन दे रहा है।अमेरिकी राष्ट्रपति का यह रवैया हिन्दुस्तान के लिए चेतावनी भरा सन्देश है। गुट निरपेक्ष आंदोलन के विसर्जित होने के बाद से अब भारत को निर्णायक नीति पर काम करना आवश्यक है। भारतीय विदेश नीति के शिल्पी अपने लिए इसे संकट की घड़ी मान सकते हैं क्योंकि उनके पास विकल्प सीमित हैं। जब पाकिस्तान,बांग्लादेश,म्यांमार और नेपाल जैसे पड़ोसी शत्रु देशों की तरह व्यवहार करने लगें तो रूस,ईरान,अफ़ग़ानिस्तान और भूटान जैसे मित्र राष्ट्रों के साथ अपने रिश्तों में गहराई और भरोसा बनाए रखना ज़रूरत बन जाता है।
डोनाल्ड ट्रंप की नई घोषणा भारतीय दवाओं पर 200 प्रतिशत आयात कर लगाने के बारे में है। जानकारी के मुताबिक़ हिन्दुस्तान के कुल अमेरिकी निर्यात में लगभग 40 फ़ीसदी दवाएँ होती हैं।औसतन हर तीसरे अमेरिकी घर में जीवन उपयोगी भारतीय दवाएँ उपयोग में ली जाती हैं।दो सौ प्रतिशत आयात शुल्क करने का अर्थ यह है कि आम अमेरिकी अवाम पर दवा का बोझ लगभग दो गुना हो जाएगा,जबकि उनकी आमदनी जस की तस है। इलाज़ भी वहाँ पहले ही बहुत मँहगा है। ऐसे में मंहगी चिकित्सा से उनकी जेब पर कितना असर पड़ेगा ,कहा नहीं जा सकता। कुछ समय बाद अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं और ट्रंप को इनमें करारा झटका लगने वाला है ,यह छिपा हुआ तथ्य नहीं है। लेकिन जब भारत को नुकसान पहुंचाने की मंशा हो तो ट्रंप शायद यह झटका स्वीकार करने के लिए भी तैयार होंगे।ट्रंप प्रशासन यह तर्क दे रहा है कि दवा कम्पनियां अमेरिका में ही जीवनोपयोगी दवाओं का निर्माण करें। पर , यह व्यावहारिक रूप से असंभव दिखता है।अमेरिका के क़ानून को देखते हुए दवा उत्पादन की एक नई इकाई लगाना वहां टेढ़ी खीर है। यहाँ तक कि अमेरिका अपने मुल्क़ के लिए शून्य विक्रयकर कर दे ( जो कि संभव नहीं है ) तो भी भारतीय दवाओं से वे सस्ती नहीं होंगीं । एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा कि अमेरिका में मानव श्रम भारत की तुलना में कई गुना मंहगा है।सिर्फ इसी वजह से लागत मूल्य बढ़ जाएगा। इसके अलावा दवाओं के लिए संसार में दवाओं के लिए रॉ मटेरियल चीन और भारत में सर्वाधिक मिलता है। चीन से भारत लाने में ट्रांसपोर्ट शुल्क न्यून है ,जबकि अमेरिका के लिए चीन और भारत से रॉ मेटेरियल आयात करना अपेक्षाकृत मंहगा होगा। ज़ाहिर है कि अपनी भारत विरोधी सनक के चलते डोनाल्ड ट्रंप इस तरह के फैसले ले रहे हैं।
आपको याद होगा कि डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में अवैध प्रवासियों के सन्दर्भ में भारत को धरती का नरक बताया था। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस अश्लील और अपमान जनक टिप्पणी के लिए सख़्त विरोध दर्ज़ कराया था। ईरान और रूस से कच्चे तेल की ख़रीद पर तो वह पहले ही अपनी नाराज़गी प्रदर्शित कर चुका है।अमेरिका की यह विचित्र धौंस है कि डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाला राष्ट्र अपनी मर्ज़ी से ईंधन भी खरीद नहीं सकता।इसके अलावा वे एच -1 बी वीज़ा नियमों को और सख़्त बनाए जाने पर ज़ोर दे चुके हैं। इसका असर सीधे सीधे भारतीय पेशेवरों पर होने वाला है। यह अलग बात है कि भारतीय पेशेवरों के बिना अमेरिका की आई टी इंडस्ट्री लगभग ठप्प हो जाएगी। इतिहास गवाह है कि अंग्रेज़ों ने हमको तब तक लूटा ,जब तक हम चुप रहे। जैसे ही भारत ने गोरी हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाई तो उन्हें देश से जाना पड़ा। क्या अमेरिका भारतीय नक़्शे में अपनी कारोबारी उपस्थिति का सफाया चाहता है ?
चंद रोज़ पहले अमेरिका ने ईरान में भारत की ओर से बनाए गए चाबहार बंदरगाह को हमले में नष्ट कर दिया। ईरान में इस बंदरगाह के लिए भारत पाँच दशकों से प्रयास कर रहा था। चीन ने पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह बनाया। दोनों मुल्कों का मक़सद उससे भारत को घेरना है। गुजरात प्रदेश ग्वादर से क़रीब है। इसलिए ग्वादर के पीछे ईरान में चाबहार बंदरगाह बनाने में भारत की मंशा घेराबंदी की रणनीति को नाक़ाम करने की थी ,लेकिन चाबहार पर हमले से भारत को रणनीतिक रूप से भारी क्षति हुई है। व्यापार चटक गया,सो अलग।हिन्दुस्तान की तरफ से इसका तीव्र प्रतिरोध आवश्यक था। डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में संसार का सबसे पुराना और एक विराट देश क्यों आए ? चाबहार को क्षति से स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका एशिया में पाकिस्तान और चीन के साथ गठजोड़ का एक नया संस्करण तैयार करना चाहता है।वह भारत, रूस, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान जैसे राष्ट्रों को रिश्ते की एक डोर में बंधा नहीं देखना चाहता। पाकिस्तान तो आधी सदी से उसकी गोद में बैठा हुआ है और अमेरिका भारत के विरोध में जब-तब उसका इस्तेमाल करता रहा है। अमेरिका के लिए पाकिस्तान एक ऐसा बच्चा है ,जिसे वह कभी कभार लॉलीपॉप देकर संतुष्ट कर देता है। अब ईरान के साथ मध्यस्थता कराने के नाम पर ( जो नाकाम रही है ) पाकिस्तान ने अमेरिका से 96000 करोड़ रूपए की भीख माँगी है।अमेरिका उसकी मदद कर भी देगा ,क्योंकि उसका अघोषित सैनिक अड्डा पाकिस्तान में चलता रहेगा। इमरान ख़ान इसके विरोधी थे इसलिए उन्हें सत्ता से हटवाया गया। बांग्लादेश में भी अमेरिका ने यही किया। अब भारत उसके निशाने पर है।






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