राजेश बादल
इधर हालिया कुछ समय से अपरिहार्य कारणों से राजीव भाई के कई नाटक नहीं देख सका था।लेकिन इस बार ठान लिया था कि अब जो भी उनकी नई प्रस्तुति आएगी,उसे नहीं छोडूंगा।इसी बीच विश्व रंगमंच दिवस आ गया और इस मौक़े पर राजीव भाई ने अपने नए धमाके की ख़बर दी। उनके अनूठे धारावाहिक प्रयोग - छोटी बड़ी बातें के नवें एपिसोड में तीन लघु नाटिकाओं का गुलदस्ता लुभा रहा था । एक थी आख़िर तुम्हें आना है,ज़रा देर लगेगी, दूसरी थी अटैची केस और तीसरी कुछ तो कहिए। मैंने मित्र डॉक्टर सुधीर सक्सेना से पूछा कि उनकी शाम ख़ाली है क्या ? फिर हम दोनों जनजातीय संग्रहालय में चल रहे उर्दू ड्रामा जलसे में राजीव जी और रीता भाभी की प्रस्तुतियाँ देखने जा पहुँचे।
नाटक क्या थे-हमारे घरों में रोज़मर्रा की बेहद महीन और नाजुक संवेदनशील घड़ियों का खुलासा था । पूरे समय लगता रहा कि अरे ! यह तो हमारी अपनी कहानी है। अब जैसे आख़िर तुम्हें आना है,ज़रा देर लगेगी की बात करें, तो घर का बेटा परदेस में है।उसने घर अपने आने की ख़बर पिता को दी है । माँ की खुशियों का पारावार नहीं है । घुटने की तकलीफ़ भूलकर वह बेटे की पसंद के बेसन लड्डू बनाने किचिन में मोर्चा संभालती है।देह का दर्द ममता भरे दिल में समा जाता है । घंटों की मेहनत का मज़ा पिता जी लेते हैं ।बीवी को तंग करते हैं कि बेटे के लिए तो सब कुछ न्यौछावर और हम बेचारे तरसते ही रहते हैं ।तुम्हारे हाथ का कुछ अच्छा सा खाने के लिए। इसी नोक झौंक के दरम्यान सूचना मिलती है कि बेटे ने अपनी यात्रा टाल दी है। लाड़ के गुब्बारे में सुई चुभो दी है बेटे ने । यही कथा है।कहीं बेटा मां के ज़रिए पिता से संवाद करता है तो कभी पिता के माध्यम से मां को संदेश भेजता है। पीढ़ियों के बीच संप्रेषण के तरीक़े पर कहीं टकराव है तो कहीं पिता नहीं पचा पाता कि बेटा उससे बदतमीजी से बरताव क्यों करता है।पिता सोचता है कि उसने अपने पिता से तो कभी ऊँची ज़बान में बात नहीं की।फिर बेटा ऐसा क्यों कर रहा है ? उसने कभी कॉलेज की पढ़ाई के लिए भी पैसे पिता से नहीं मांगे और ये बच्चे बुढ़ापे की जर्जर देह को भी एटीएम समझ बैठे हैं ।नहीं दो तो बैंक में पैसे बचाकर नहीं रखने का ताना देते हैं ।बच्चों की पढ़ाई में खर्च हो गए - यह तर्क भी वे नहीं सुनना चाहते ।सत्तर साल के बाप से कहते हैं - तबियत ख़राब है तो डॉक्टर को जाकर दिखाते क्यों नहीं ? जिम तो ज्वाइन कर ही सकते हो।
संयुक्त परिवार बिखर गए,दरक गए,लेकिन अब तो एकल परिवार में भी चटकन दिखने लगी है।अटैचीकेस में कुछ ऐसा ही नज़र आता है । पति का भाई आए तो खातिरदारी करने में पत्नी की नानी मरती है और मायके से भाई आए तो घुटने और कमर का दर्द काफ़ूर हो जाता है।पति बेचारा ठगा सा रह जाता है। कुछ तो कहिए में भी एक महिला का दुख कमोबेश यही है। पचपन - साठ की उमर आते आते महिला को लगता है कि उसकी ज़िंदगी तो घर ,पति और बच्चों की सेवा में गई।अपने पर तो ध्यान नहीं दे पाई । अक़्ल तो तब आई,जब एक भाई मिलने आया और उसने बहन से जवानी के दिनों की गुलाबी ड्रेस पहनने का आग्रह किया और कैफे में जाकर कॉफी पीने की ख्वाहिश का इज़हार किया । तब उसे लगा कि वो औरत तो उसके भीतर से मर चुकी है । अब सन्नाटा ही शेष है ।
क्या कहूं ! राजीव जी और रीता भाभी हों तो मंच लूट ही लेते हैं,लेकिन अन्य कलाकारों ने कमाल का अभिनय किया। नाट्यागार कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजा तो बार बार आँखों में आंसू भी लाया। सब यह सोच रहे थे कि उसके घर की बात स्टेज पर कैसे आई ? वह कनखियों से बगल वाले को देखता ।शायद यही सोचते हुए कि कहीं बाजू वाला भी तो यही नहीं सोच रहा है।पर कलेजे के भीतर की बात कहीं कनखियों से दिखती है भला ?
कुल मिलाकर लौटते हुए मन भारी था तो हल्का भी था।दोनों अहसास एक साथ । मैंने तो कभी अनुभव नहीं किया । हां याद आता रहा कि हम भी चालीस - पैंतालीस साल पहले तक मंच पर उतरते थे ।
सलाम राजीव भाई और रीता भाभी !






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