Know your world in 60 words - Read News in just 1 minute
हॉट टोपिक
Select the content to hear the Audio

Added on : 2026-07-23 10:28:06

भूपेन्द्र गुप्ता

देश का युवा आज एक कठिन प्रश्न पूछ रहा है—क्या उसकी मेहनत की कोई कीमत है?
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लाखों छात्र अपने जीवन के कई वर्ष लगा देते हैं। परिवार कर्ज लेकर कोचिंग कराता है, छात्र अपने सपनों को दांव पर लगाता है, लेकिन जब बार-बार पेपर लीक होते हैं, परीक्षाएं रद्द होती हैं और चयन प्रक्रिया विवादों में घिर जाती है,तब सबसे बड़ी क्षति परीक्षा की नहीं,बल्कि युवाओं के विश्वास की होती है।
यदि पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में प्रतियोगी परीक्षाएं पेपर लीक या गंभीर अनियमितताओं से प्रभावित हुई हैं, तो यह किसी एक कर्मचारी की गलती नहीं मानी जा सकती। यह व्यवस्था की विफलता है। लोकतंत्र में व्यवस्था की सफलता का श्रेय यदि सरकार लेती है, तो उसकी विफलताओं की जवाबदेही भी स्वीकार करनी चाहिए।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जवाबदेही स्वीकार करने की जगह ऐसा वातावरण बनाया जाता है,मानो प्रश्न पूछने वाले छात्र ही कटघरे में हों। जो युवा निष्पक्ष परीक्षा की मांग कर रहे हैं, वे किसी दल के कार्यकर्ता नहीं हैं,वे देश का भविष्य हैं। उनके सवालों का उत्तर तर्क,पारदर्शिता और सुधार से दिया जाना चाहिए, न कि उन्हें संदेह से देखकर।
सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं में धांधली रोकने के लिए नया कानून बनाया है। यह स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन कानून का वास्तविक मूल्य उसके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होगा। यदि कानून बनने के बाद भी पेपर लीक की घटनाएं रुकती नहीं हैं, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि कमी कानून में है, व्यवस्था में है या उसे लागू करने की इच्छाशक्ति में।
देश यह भी जानना चाहता है कि हर पेपर लीक के बाद केवल छोटे-छोटे आरोपी ही क्यों सामने आते हैं? वे लोग कौन हैं जो इस पूरे नेटवर्क को संचालित करते हैं? उनकी राजनीतिक, प्रशासनिक या आर्थिक संरक्षण-श्रृंखला क्या है? जब तक इस संगठित अपराध की जड़ों तक नहीं पहुंचा जाएगा, तब तक गिरफ्तारियां केवल समाचार बनेंगी, समाधान नहीं।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या परीक्षा रद्द होने की कीमत केवल छात्र ही चुकाएगा? उसकी उम्र बढ़ती है, अवसर कम होते हैं, आर्थिक बोझ बढ़ता है और मानसिक तनाव अलग। क्या इस नुकसान की कोई जवाबदेही तय होगी?
लोकतांत्रिक शासन का मूल सिद्धांत है कि अधिकार के साथ उत्तरदायित्व भी आता है। यदि किसी विभाग में बार-बार गंभीर विफलताएं हों, तो केवल अधिकारियों पर नहीं, बल्कि नीति और नेतृत्व पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। जवाबदेही स्वीकार करना पराजय नहीं, बल्कि सुशासन का प्रमाण है।
आज देश के युवाओं को भाषण नहीं, भरोसा चाहिए; आश्वासन नहीं, निष्पक्ष व्यवस्था चाहिए; और सबसे बढ़कर यह विश्वास चाहिए कि उनकी सफलता का निर्णय उनकी मेहनत करेगी, किसी पेपर लीक गिरोह की पहुंच नहीं।
सरकार यदि वास्तव में युवाओं के साथ खड़ी है, तो उसे तीन स्पष्ट कदम उठाने चाहिए—हर पेपर लीक की समयबद्ध और स्वतंत्र जांच,दोषियों को शीघ्र एवं कठोर दंड, तथा जहां भी प्रशासनिक विफलता सिद्ध हो, वहां शीर्ष स्तर तक जवाबदेही तय करना।
भारत दुनिया का सबसे युवा देश बनने का दावा करता है। इस दावे की वास्तविक परीक्षा भाषणों से नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली की ईमानदारी से होगी। जिस दिन देश का युवा यह विश्वास कर लेगा कि उसकी मेहनत ही उसकी सबसे बड़ी सिफारिश है, उसी दिन भारत वास्तव में विश्वगुरु बनने की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाएगा।
समाधान की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।
केवल दोषियों की गिरफ्तारी से समस्या समाप्त नहीं होगी। परीक्षा प्रणाली में ऐसे संस्थागत सुधार आवश्यक हैं जो पेपर लीक की संभावना को न्यूनतम करें।
सबसे पहले, देश की सभी प्रमुख सार्वजनिक भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं का संचालन पूर्णतः सरकारी एवं संवैधानिक जवाबदेही वाली संस्थाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए। यदि किसी तकनीकी कार्य के लिए निजी एजेंसियों की सेवाएं ली भी जाएं,तो उनकी भूमिका सीमित और कड़ी निगरानी के अधीन हो। उनका अंतिम नियंत्रण पूरी तरह सरकारी संस्था के पास रहे।
दूसरा,प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया पूरी तरह गोपनीय और तकनीक- आधारित हो। प्रश्नों का चयन एक बड़े प्रश्न बैंक से रैंडम (यादृच्छिक) एल्गोरिदम के माध्यम से अंतिम समय में किया जाए, ताकि किसी एक व्यक्ति या समूह को पूरे प्रश्नपत्र की पूर्व जानकारी न हो।
तीसरा,प्रत्येक परीक्षा कक्ष में एक ही प्रश्नपत्र के स्थान पर अलग-अलग क्रम (Question Order) या समतुल्य प्रश्न सेट वितरित किए जाएं। इससे यदि कोई व्यक्ति उत्तर साझा करने या संगठित नकल का प्रयास करे तो उसका प्रभाव काफी कम हो सकता है। यह व्यवस्था कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परीक्षाओं में पहले से अपनाई जाती है।
इसके अतिरिक्त प्रश्नपत्रों की डिजिटल एन्क्रिप्शन व्यवस्था,सुरक्षित प्रिंटिंग, जीपीएस आधारित परिवहन निगरानी, परीक्षा केंद्रों का स्वतंत्र ऑडिट तथा प्रत्येक चरण की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।
इन उपायों से पेपर लीक पूरी तरह समाप्त होने की गारंटी तो नहीं दी जा सकती,लेकिन इस प्रवृति को काफी हद तक कम किया जा सकता है। करोड़ों युवाओं के भविष्य की रक्षा के लिए अब केवल कानून नहीं,बल्कि मजबूत और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है।
सरकारें कानून बनाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकतीं; कानून का सम्मान तब होता है जब सत्ता स्वयं उसकी पहली जवाबदेही स्वीकार करे।

आज की बात

हेडलाइंस

अच्छी खबर

शर्मनाक

भारत

दुनिया