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हॉट टोपिक
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Added on : 2026-09-06 16:55:30

राजेश बादल 

तुर्किये और सऊदी अरब के साथ मक्का रक्षा समझौते ( एमडीए ) से पाकिस्तान गदगद है। वह खुश है कि संगठन भारत के ख़िलाफ़ रक्षा कवच का काम करेगा।अगली कड़ी के रूप में बांग्लादेश और मिस्र को संगठन का सदस्य बनाने की पहल की जाएगी।सूत्र वाक्य यह है कि एक मुल्क पर हमला तीनों देशों पर आक्रमण माना जाएगा।कमोबेश नाटो की तर्ज़ पर गठित इस एमडीए के पीछे ज़ाहिरा तौर पर तो इज़रायल-अमेरिका और ईरान के बीच जंग को नए संगठन का आधार माना जा रहा है,मगर परदे के पीछे के कारण कुछ और ही हैं। संगठन के तीनों सदस्य सुन्नी बाहुल्य हैं और वे शियाओं से दूरी बनाए रखना चाहते हैं।अप्रत्यक्ष रूप से वे अमेरिका के इशारे पर इस संगठन के लिए बाध्य हुए हैं।इसलिए भारत के लिए कम,ईरान के लिए यह ज़्यादा चिंता का विषय हो सकता है।बहुत संभव है कि आगे जाकर यह हाथी का दाँत साबित हो जाए।क्योंकि अभी तक मज़हबी धुरी पर बने ऑर्गनाइजेशन बहुत कारगर साबित नहीं हुए हैं।

एक नज़र अतीत पर डालें तो धार्मिक नज़रिए से विश्लेषण में आसानी हो जाएगी।करीब 76 साल पहले अरब लीग के देशों ने सामूहिक सुरक्षा और आर्थिक नज़रिए से संगठन बनाया।तब पाकिस्तान को ख़ालिस मुस्लिम देश नहीं माना गया था।लेकिन अलग-अलग मुल्कों में अलग-अलग राजनीतिक नेतृत्व,उनके विरोधाभासों तथा सैनिक समन्वय में भरोसे की कमी के चलते संगठन ने दम तोड़ दिया।इसके 5 साल बाद बग़दाद संधि के ज़रिए ईराक, ईरान,पाकिस्तान,ब्रिटेन और तुर्की एकजुट हुए।उस समय इसका मक़सद सोवियतसंघ की विस्तारवादी नीतियों से अपने को बचाने का था। लेकिन 1958 में इराक में फ़ौजी तख्तापलट और 1979 में ईरानी क्रांति से यह एकजुटता बिखर गई।फिर 5 साल बाद खाड़ी सहयोग परिषद बनी।इस संगठन को पेनिनसुला शील्ड फ़ोर्स नाम दिया गया। उन दिनों ईरान-इराक जंग चल रही थी।यह जंग 1980 से 1988 तक चली और यह संगठन भी कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा सका।इसके बाद इस्लामिक सैन्य और आतंकवाद विरोधी संगठन बनाया गया।मुख्य रूप से यह ईरान के खिलाफ था।सऊदी अरब इसका नेता था।अब तक तो यह कोई ख़ास भूमिका नहीं निभा पाया है।अलबत्ता सदस्य देशों की संख्या 40 के आसपास पहुँच गई।यहाँ तक कि पाकिस्तान ने इस फोरम में कश्मीर का मसला अनेक बार उठाया,मगर उसे सफलता नहीं मिली।

इसके बाद इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) का ज़िक्र।यह संगठन तनिक ताक़तवर है और संयुक्त राष्ट्र के बाद दूसरे नंबर पर माना जाता है। लेकिन इसका आधार मज़हबी है।इसका गठन 1969 में हुआ था।तीन साल बाद 1972 में इस संगठन ने अपना चार्टर अपनाया।पाकिस्तान इसका शुरुआती सदस्य था और बांग्लादेश बनने के बाद वह भी इसका सदस्य बन गया।उसके बाद बांग्लादेश ने कई बार भारत को इसमें शामिल करने के लिए अनुरोध किया।उसका तर्क था कि जिस देश में विश्व की सारी मुस्लिम आबादी का दस प्रतिशत रहता हो,उसे संगठन से बाहर रखने का औचित्य नहीं है।तब तो बांग्लादेश भारत के मित्र देशों की सूची में था।हालांकि,अब उसके सुर बदले हुए हैं।बता दूँ कि 1970 में भारत को विशेष आमंत्रित के तौर पर इसके शिखर सम्मेलन में बुलाया गया था।पर,पाकिस्तान ने इतना उग्र विरोध किया कि वह बैठक में भाग नहीं ले सका।इसके बाद बांग्लादेश ने 2018 में भारत को पर्यवेक्षक के तौर पर आमंत्रित करने की बात कही,पर पाकिस्तान का अडियल रवैया बाधा बन गया।फिर भी 2019 में भारत को पाकिस्तान की खिलाफत के बावजूद शिखर सम्मेलन में न्यौता गया।इस संगठन ने कश्मीर के मसले पर अनेक बार अनावश्यक दखल दिया।हर बार भारत ने उसे खारिज कर दिया।यह संगठन भी अभी तक अपने महत्त्व को स्पष्ट नहीं कर पाया है क्योंकि इसके सदस्य देश भी आपस में ही लड़ते रहे हैं।अनेक सदस्य देश तो भारत से साफ़ कहते हैं कि कश्मीर संबंधी संगठन के बयानों पर ध्यान नहीं दे।असल बात तो यह है कि संगठन के अधिकतर मुस्लिम देशों के साथ भारत के सीधे कारोबारी रिश्ते हैं और वे भारत से यह संबंध चाहकर भी नही तोड़ सकते।लब्बोलुआब यह कि मजहबी धुरी पर टिके संगठन दरअसल बेअसर साबित हुए हैं।फिर इस समय अचानक एमडीए का गठन क्यों हुआ ?

आते हैं तुर्की पर।तुर्की मक्का संगठन का महत्वपूर्ण सदस्य है।वह नाटो का सदस्य भी है और नाटो से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों बहुत ख़फ़ा हैं।रूस-यूक्रेन जंग में और फिर ईरान-इज़राइल-अमेरिका जंग में नाटो देशों ने अमेरिका की पूँछ नहीं पकड़ी और ट्रंप को आइना दिखा दिया।नाटो देश तो यूक्रेन-रूस जंग से बाहर आना चाहते हैं,पर उन्हें ठोस बहाना नहीं मिल रहा है।नाटो के अनेक सदस्य देश खुल्लमखुल्ला अमेरिका का विरोध कर चुके हैं।ऐसे में ट्रंप जानते हैं कि तुर्की की सेना नाटो सेनाओं की तुलना में बड़ी और ताकतवर है।तुर्की कश्मीर के मामले में हमेशा पाकिस्तान के साथ रहा है और अमेरिका उस पर हमेशा भरोसा करता रहा है।डोनाल्ड ट्रंप भारत से चिढ़े हुए हैं।यह तथ्य छिपा नहीं है।भारत के विरोध में अमेरिका हरदम पाकिस्तान के कंधे पर हाथ रखता रहा है।ऐसे में ट्रंप ने नवोदित संगठन के बहाने एक तीर से तीन निशाने साधे हैं।इज़राइल से दूरी,नाटो देशों को सन्देश और भारत विरोधी मोर्चा बनाना ही एमडीए का असल उद्देश्य है।सऊदी अरब हमेशा से सुन्नीवाद के चलते पाकिस्तान के साथ रहा है और ईरान का धुर विरोधी है।वह अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है।उसकी अपनी सेना कमज़ोर है।हाँ,वह पैसा खर्च कर सकता है।ईरान पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका को इसमें सऊदी अरब को शामिल करना ज़रूरी था।रही पाकिस्तान की बात तो वह असुरक्षित और भारत से आतंकित मुल्क है।उसे भारत के साथ जंग की स्थिति में अपने लिए कवर चाहिए।इस वजह से उसे अमेरिका के इशारे पर तो नाचना ही था। ध्यान दें कि सऊदी अरब से भारत का आयात-निर्यात लगभग 50 अरब डॉलर और तुर्की के साथ करीब 10 अरब डॉलर है।क्या पाकिस्तान की ख़ातिर ये मुल्क अपने लिए कारोबारी अस्थिरता चाहेंगे ? शायद नहीं।

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