डॉ. सुधीर सक्सेना
पाक अधिकृत जम्मू-काश्मीर अशांत है और वहां जनाक्रोश दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। पिछला पूरा पखवाड़ा पीओजेके, गिलगित और बाल्टिस्तान में हड़ताल, रास्ता रोको और प्रदर्शनों में बीता है। सरकार के खिलाफ प्रदर्शन की खास बात यह रही कि बाजारों में दुकानों के शटर गिरे रहे। कल तक जो आंदोलन मंहगाई, सब्सिडी और सुविधाओं को लेकर हुआ करता था, अब पाकिस्तान के कब्जे, प्रशासनिक नियंत्रण और सैन्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ आवाज में तब्दील हो गया है। आंदोलन के दमन के लिये पाकिस्तान की हुकूमत ने गिरफ्तारी, छापों और गोलियों की बौछार का सहारा लिया है। बिगड़ते हालात पर काबू के लिये उसने इलाके में करीब चौदह हजार पुलिसकर्मी तैनात किये हैं और आंदोलनकारी नेताओं की सुरागकशी के लिये एक करोड़ रूपयों के ईनाम का ऐलान किया है। इस्लामाबाद के लिये डर और फिक्र का सबब यह है कि मीरपुर, रावलकोट और मुजफ्फराबाद की सभाओं में अब वी वान्ट फ्रीडम और गो बैक पाकिस्तान के नारे लगने लगे हैं।
इसमें शक नहीं कि सिंतबर, सन 2023 में ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के गठन के बाद समूचे इलाके में न सिर्फ आंदोलन में विस्तार और तेजी आई है, वरन अब उसकी नली पाकिस्तान के हुक्मरान की ओर मुड़ गई है। अब तक आंदोलन की कमान शौकत नवाज मीर, सरदार उमर नजीर, ख्वाजा मेहरान अर्शद, हफीज हमदानी और इम्तियाज असलम जैसे नेताओं के हाथों में रही है, लेकिन इधर सरदार अमन खान सर्वप्रमुख और मुखर नेता के तौर पर उभरे हैं। अमन खान तुर्श जुबां नेता हैं। हाल में रावलकोट की सभा में उन्होंने ज़ालिम निजाम को शिकस्त देने की अवाम से अपील की। अमन मानते हैं कि इलाके में पाक-फौज की मौजूदगी जरूरी नहीं है। भारत के साथ व्यापारिक रिश्ता खोलने के साथ-साथ वह यह भी कहते हैं कि भारत के साथ रिश्ता कैसा हो, यह इस्लामाबाद नहीं, वरन हम तय करेंगे।
स्पष्ट है कि पाक अधिकृत क्षेत्र में अवाम की सोच में वक्त के साथ परिवर्तन आ रहा है। जनता की मांगें अब बिजली कटौती, मंहगाई कम करने या सस्ता गेंहू मुहैया करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अब अपनी तकदीर की इबारतें खुद लिखने को बेताब हैं। वे मानते हैं कि पाकिस्तान ने इलाके को बेतरह लूटा है। उसे काश्मीरियों से नहीं, वरन इलाके की जमीनों-जायदाद से सरोकार है। सभाओं और जुलूसों में दिलचस्प तौर पर इंकलाब जिंदाबाद के नारे तो लगते ही हैं, 'दहशतगर्दी के पीछे वर्दी' जैसी तीखी सेना विरोधी बातें और तोहमतें भी सुनी जाती हैं। सामूहिक सोच में आये इस काबिले गौर परिवर्तन के पीछे संचार साधनों का बड़ा हाथ है। इंटरनेट की आमद ने इलाके के लोगों तक जम्मू-काश्मीर के मेनलैण्ड की तस्वीर पहुंचाने का काम किया है। जम्मू काश्मीर में रेल सेवा, टनलिंग, हवाई अड्डों, अस्पतालों, सड़कों और अन्य सुविधाओं के आगमन ने अधिकृत क्षेत्र के लोगों को अपनी दशा और दिशा के बारे में नये सिरे से सोचने को बाध्य किया है।
यह व्यापक प्रतिरोध का ही नतीजा है कि हालात पर काबू पाने में प्रशासन के हाथ-पाँव फूल रहे हैं। पिछले दिनों बिंबर से मुजफ्फराबाद तक के कूच से प्रशासन की पेशानी पर पसीना चुह चुहा आया। असंतोष चौतरफा और इतना घना था कि दमन और हिंसा के नजारे देखने को मिले। कम-अज-कम दो दर्जन नागरिक, ठौर मारे गये और लगभग 500 आहत हुये। बदले में भड़की हिंसा में चार पुलिसकर्मी मरे और अनेक घायल। सूचनाओं के मुताबिक हालात दिनोंदिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। उधर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनवा में भी असंतोष ऊफान पर है। अधिकृत क्षेत्र में स्वायत्तता और अधिकारों की मांग का असर सीमांत क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। लेकिन आंदोलनकारियों से वार्ता के मूड में इस्लामाबाद नजर नहीं आता। उसने दमन का हथियार चुना है और ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी को आतंकवादी संगठन घोषित कर अपने इरादों का संकेत दे दिया है। देखना होगा कि अवाम की सोच में बदलाव बगावत की शक्ल अख्तियार करेगा या नहीं?





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