सिस्टम की नाकामियों की कड़ी आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे आदमी को बरी कर दिया, जिसने मर्डर के जुर्म में 22 साल जेल में बिताए थे. कोर्ट ने कहा कि उसकी सजा 'बहुत ही नामुमकिन' चश्मदीद गवाह की गवाही और गलत जांच पर आधारित थी.
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी दुख जताया कि हाशिए पर पड़े लोगों को न्याय तक पहुंच अभी भी नहीं मिल पा रही है, और देरी और लापरवाही दशकों की आजादी छीन रही है. जस्टिस जे बी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने 4 अगस्त को यह फैसला सुनाया. जस्टिस चंद्रन ने बेंच की ओर से फैसले में लिखा, 'हम इस ऑर्डर से बहुत निराश और परेशान हैं.




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