राजेश बादल
भारत में समय बेचने और किराया बढ़ाने का कारोबार इन दिनों बेहिसाब फल-फूल रहा है।विमान कंपनियों और भारतीय रेल ने वक़्त के साथ साथ मनमाने ढंग से बेहिसाब शुल्क बढ़ाने का जो रवैया अख़्तियार किया है,वह हैरत में डालने वाला है।भारतीय संविधान की मंशा के विरुद्ध है और उस पर समाज की चुप्पी निराश करने वाली है।संभवतः इसीलिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर नाराजगी दिखाई है।भारत की इस सर्वोच्च पंचायत ने सरकार से कहा है कि वह एक सप्ताह में विमान किराए के नए नियम और निर्देश जारी करे.सरकार ने तीन सप्ताह माँगे थे,जो सुप्रीमकोर्ट ने नहीं दिए।एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि इन नियमों को सात दिन के भीतर प्रकाशित करिए।अगर विमान कम्पनियाँ उनका पालन नहीं करती,तो उनके विमान जमीन पर खड़े कर दीजिए।अब इस पर सुनवाई सात सितंबर को होगी।सर्वोच्च न्यायालय में याचिका पिछले साल नवंबर में लगाईं गई थी।
यक़ीनन भारत के यात्रियों को इस याचिकाकर्ता का आभार व्यक्त करना चाहिए।क्योंकि इसके बहाने विमानन कंपनियों की मर्ज़ी और मुनाफ़ा कमाने की ललक पर देशव्यापी बहस छिड़ गई है।मूल बात यह है कि जब ईंधन की दरें नहीं बढ़तीं,पायलटों के वेतन नहीं बढ़ते,रखरखाव की वस्तुओं तथा उपकरणों के मूल्य नहीं बढ़ते,फ्लाइट में परोसे जाने वाले बेस्वाद भोजन या स्वल्पाहार की कीमतें नहीं बढ़तीं और विमानतल पर वायुयान के किराए तक एयरपोर्ट अथॉरिटी नहीं बढ़ाती तो यात्री किराए क्यों अचानक बदल जाते हैं।बाज़ार का सिद्धांत है कि लागत और मुनाफ़े में एक संतुलन तथा आदर्श अनुपात होना चाहिए।उससे अधिक लाभ कमाना कारोबारी नज़रिए से पाप समझा जाता है।भारतीय संविधान भी लगभग ऐसी ही बात कहता है।वह तो मानव श्रम और उसे मिलने वाले धन के बीच भी संतुलन की बात करता है।सभी सरकारें इस पर अमल करती आई हैं।फिर ऐसा क्या है,जो विमान कंपनियाँ किराया बढ़ा देती हैं ? वे यात्रियों को बढ़े किराए में सुविधाएँ नहीं बढ़ातीं।मसलन वे भोजन में महँगी डिशेज परोस सकती हैं।उन्हें समाचार पत्र निशुल्क दे सकती हैं,यात्री को बैठते ही वेलकम ड्रिंक दे सकती हैं।उन्हें फलों की टोकरी भेंट कर सकती हैं।पर,होता तो उल्टा है।वे वीवाईपी लाउंज तक उनके लिए नहीं खोलती ।क्या यह समय बेचने का धंधा नहीं है ?क्या समय खरीदने के लिए उन्होंने भारत सरकार को लायसेंस फीस में ज़्यादा भुगतान किया है ? सवाल तो यह भी है कि क्या कोई सरकारी नियम उन्हें समय का ठेका दे सकता है।ज़ाहिर है कि यह बेईमानी है और उपभोक्ता संरक्षण क़ानून का उल्लंघन है।किसी व्यापार में लागत जस की तस रहे और मुसाफिर की जेब ढीली होती रहे तो इसकी अनुमति किसी भी कीमत पर विमान कंपनियों को नहीं देनी चाहिए।
ध्यान दीजिए कि बढ़ते किराए के अनुपात में किसी भी यात्री की आमदनी या वेतन नहीं बढ़ता।विडंबना तो यह है कि अब खिड़की वाली सीट बेचने का भी धंधा होने लगा है।यानी खिड़की वाली सीट चाहिए तो अतिरिक्त शुल्क घूस की तरह दीजिए।अखरता तो तब है कि जब कोई मुसाफिर वेब चेक इन करने के लिए खिड़की वाली सीट चाहता है तो वे सारी पहले से ही बिकी हुई स्क्रीन पर नज़र आती हैं।वास्तव में ऐसा नहीं होता।मेरा अनुभव रहा है कि फ्री सीट केवल बीच वाली दिखाई देती है।बाक़ी खिड़की वाली और किनारे वाली सीटों पर तो जजियाकर लगता है।उन पर ऐसी बंदिश नहीं है कि जब कोई यात्री टिकट कैंसिल कर तो वे टिकट रद्द करने का अधिक से अधिक दस प्रतिशत ही वसूल करें।वे पचास फ़ीसदी तक किराया हड़प लेती हैं।यात्री अपने को ठगा सा महसूस करता है।बिना लागत के इस धंधे में इन कंपनियों ने एक और अनैतिक काम किया है।वे धीरे-धीरे अपने साथ ले जाने वाले लगेज की सीमा घटाती जा रही हैं।लगेज थोड़ा भी अधिक होता है तो वे इतना भारी भरकम शुल्क वसूलती हैं कि मुसाफिरों के माथे पर पसीना झलकने लगता है।इसके लिए कोई क़ानूनी बंदिश नहीं है।एक तरह से यह लूट की खुली छूट है।पीड़ित यात्रियों ने तो बीते दिनों मध्यप्रदेश में यात्री उपभोक्ता संघ बनाया है।यह संघ रेल और विमान के अलावा बसों के किराए और सुविधाओं पर नज़र रखेगा।ऐसे उपभोक्ता आंदोलन को सरकार का संरक्षण मिलना चाहिए।
बात निकली है तो एयरपोर्ट अथॉरिटी को भी आड़े हाथों लेना चाहिए।अलग-अलग शहरों में उसके नियम अलग-अलग हैं।कहीं तीन पहियों वाले ऑटो को विमानतल पर छोड़ने और लेने के लिए नहीं जाने दिया जाता।अगर चार पैसे बचाने के लिए यात्री ऑटो में जाना चाहे तो उसे यह सुविधा नहीं है।यह भी उपभोक्ता कानून के दायरे में आता है।ध्यान देना होगा कि हर यात्री करोड़पति नहीं होता।उनमें आपात परिस्थितियों में जाने वाले निम्न मध्यवर्ग के लोग भी होते हैं।कोई पेंशनर होता है तो कोई वरिष्ठ नागरिक ऐसा भी होता है,जिसे पेंशन नहीं मिलती।अनेक छात्र और नई-नई नौकरी वाले नौजवान भी होते हैं।उनकी वेतन कम होती है और रेल से घर जाने में उन्हें चौबीस घंटे तक लग जाते हैं।छुट्टी कम होती है।बुजुर्ग माता-पिता के लिए घर भी जाना होता है।ऐसे में तिपहिया ऑटो उनके पाँच-सात सौ रूपए बचा देते हैं।प्राधिकरण को यह ज़िद छोड़नी चाहिए।इसके ख़िलाफ़ तो कोई भी कोर्ट में जा सकता है।
अब रेल के रवैए पर भी बात कर लें।हालिया दौर में प्रीमियम किराए और तत्काल जैसी सेवाएं भी उपलब्ध हैं।होता यह है कि कम्प्युटर लंबी प्रतीक्षा सूची बताता है तो प्रीमियम या तत्काल पर जाना मुसाफ़िर की मजबूरी बन जाता है।इमरजेंसी में आपको तत्काल टिकट रद्द करना पड़ जाए तो रेलवे टिकट की राशि किसी सूदखोर की तरह दबा लेता है।यह भी विमान की खिड़की सीट जैसा कारोबार है।बर्थ अनुपलब्ध होती हैं,लेकिन प्रीमियम किराया अदा करते ही वह उपलब्ध हो जाती है।सीनियर सिटिज़न नीचे की बर्थ के लिए टापते रह जाते हैं और नीचे की बर्थ पर नौजवान लैपटॉप लिए काम करते हैं ।प्राइवेट बसों की तरह अब रेलों में भी वही व्यवहार होने लगा है।जब लंबी प्रतीक्षा सूची होती है तो किराया अनाप-शनाप बढ़ जाता है।भारतीय उत्सवधर्मी समाज के लिए त्यौहारों पर घर जाना ज़रूरी होता है और भारतीय रेल किसी शिकारी की तरह यात्री की ताक में बैठी रहती है।अभी रक्षाबंधन और गणेश चतुर्थी जैसे पर्व पर रेल किराए आसमान में जा चुके हैं।यह पहेली शायद ही कोई सुलझा पाए कि जब खिड़की से या ऑन लाइन प्रतीक्षा सूची का टिकट मिलता है तो अधिकृत और अनधिकृत एजेंट कन्फर्म बर्थ कैसे दिलाते हैं ?




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