राजेश बादल
शनिवार की शाम वाकई ख़ुशनुमा थी।विवेकानंद लायब्रेरी में चारों तरफ किताबों से घिरे उस छोटे से सभागार में दो घंटे की महफ़िल जमी। महफिल में देश के अनेक शीर्षस्थ शब्द सितारे एकत्रित थे। व्यंग्य के शिखर पर विराजे पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी , भारत के ज्ञान तीर्थ सप्रे संग्रहालय के मुखिया पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ,जाने माने हिंदी शायर और क्रांतिकारी कवि दुष्यंतकुमार के बेटे आलोक त्यागी ,लेखिका और अपने ज़माने के मशहूर संपादक ,कथाकार कमलेश्वर की बेटी ममता त्यागी ,दैनिक भास्कर के समूह संपादक प्रकाश दुबे ,मायानगरी मुंबई से आए लोकप्रिय पटकथा लेखक और निदेशक रूमी जाफरी ,वेब दुनिया के संस्थापक संपादक प्रकाश हिन्दुस्तानी ,हिंदी के वरिष्ठ समालोचक विजय बहादुर सिंह , लेखिका और कवियत्री रेखा कश्तवार ,प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो के आला अफसर और गांधीवादी चिंतक पराग मांडले समेत अनेक बुद्धिजीवी ,साहित्यकार , कवि ,पत्रकार और लेखक इस महफ़िल में शामिल हुए और शाम यादगार बन गई। अवसर मेरी नई किताब बेजोड़ शायर साहिर लुधियानवी की बायोग्राफी पर डॉक्टर ज्ञान चतुर्वेदी के विचार और संवाद का था।किताब मुल्क़ के प्रतिष्ठित मंजुल प्रकाशन ने प्रकाशित की है। उसके कर्ता -धर्ता विकास राखेजा ,संपादक कपिल सिंह और विपणन समन्वयक तथा कार्यक्रम की संचालनकर्ता सुश्री नेहा भी आयोजन में शिरकत करने पहुंचे थे।
कार्यक्रम का आग़ाज़ परंपरागत स्वागत से हुआ। उसके बाद डॉक्टर ज्ञान चतुर्वेदी के संबोधन से हुआ। संयोग है कि पुस्तक के लेखक राजेश बादल और ज्ञान जी एक ही शहर छतरपुर के हैं और ज्ञान जी महाविद्यालय में राजेश बादल के सीनियर थे। इसलिए ज्ञान जी अपने शहर की भावुक यादों में खो गए।उन्होंने छतरपुर की तासीर और मिजाज़ की बारीकियों का गहराई से विश्लेषण किया। राजेश की किताब - ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया से साहिर की ज़िंदगी के बेहद मार्मिक प्रसंगों को ज्ञान जी ने छुआ और राजेश बादल से सवाल भी किए।जब एक प्रश्न के उत्तर में राजेश बादल ने साहिर की निजी ज़िंदगी के दर्दनाक पहलुओं का बयान किया तो महफ़िल ग़मगीन हो गई।साहिर ने माँ के संरक्षण में अपनी परवरिश के पल गुजारे और क्रूर पिता से छुटकारा पाया। जवान होते साहिर की ज़िंदगी में एक के बाद अनेक हिन्दू और सिख लड़कियां आईं , लेकिन कोई भी मोहब्बत परवान नहीं चढ़ सकी। बेटे के प्यार को नाक़ाम देख्रते माँ घुटती रही और जब साहिर शौहरत की बुलंदियों पर थे ,तो इस दुःख को लिए इस संसार से चली गई।साहिर ने माँ के लिए बहू खोजने में कोई कसर नहीं छोड़ी।माँ चाहती थी कि कोई मुस्लिम लड़की ही साहिर की ज़िंदगी संवार दे ,पर ऐसा न हुआ। दो मुस्लिम लड़कियां निकाह की देहलीज़ पर आकर लौट गईं। साहिर की नियति उनके संग छल करती रही। इन प्रसंगों पर ज्ञान चतुर्वेदी और राजेश बादल के संवाद से कई बार अतिथियों के आँसू छलके।
क्या विडंबना थी कि अपने से दो साल छोटे साहिर से इश्क़ का इज़हार अमृता प्रीतम ने खुलकर किया,पर साहिर साहस न जुटा पाए। बचपन से अमृता के इकतरफा प्यार में डूबे आठ साल छोटे इमरोज़ को अमृता का साथ नसीब हुआ। मगर,वह लिव-इन रिश्ते तक ही सीमित रहा।दशकों तक साहिर ने मायानगरी पर राज किया। यहाँ तक कि लतामंगेश्कर जैसी सुर साम्राज्ञी से एक रूपए अधिक लिया। रेडियो पर शायरों और गीतकारों को सम्मान दिलाया।लुधियाना में साहिर की याद में 49 साल तक उनका एक दीवाना हेलीकॉप्टर किराए से लेकर उस स्थान पर दिन भर गुलाब के फूल बरसाता रहता था,जहाँ जश्न ए साहिर होता था।लुधियाना के सिनेमाघर दर्शकों के लिए साहिर की फिल्मों के लिए निशुल्क खुल जाते थे।संसार में ऐसी लोकप्रियता किसी शायर या कवि को नहीं मिली।साहिर की यादों में खोई महफ़िल उस समय धड़कने लगी ,जब सभागार में बैठे साहिर के दीवानों ने राजेश बादल से साहिर के ज़िंदगीनामे पर सवालों की झड़ी लगा दी। डॉक्टर ज्ञान चतुर्वेदी की टिप्पणियों ने लोगों को ख़ूब गुदगुदाया।
महफ़िल में मुंबई से सीधे धूमकेतु की तरह प्रकट हुए फिल्मों के लोकप्रिय लेखक और निर्देशक रूमी जाफरी ने साहिर के निधन के बाद उनकी निशानियों और अनमोल विरासत को कबाड़ी के ढेर में जाने की दर्दनाक दास्तान सुनाई तो लोग रो पड़े। राजेश बादल ने कहा कि हम इतने कृतघ्न हैं कि पुरखों की निशानी सहेज कर नहीं रखते। अब तो क़ब्रिस्तान में साहिर की क़ब्र भी ज़मींदोज़ हो चुकी है। बड़े दिनों के बाद साहिर को इस तरह भोपाल के लोगों ने याद किया। चित्र इसी अवसर के हैं।






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