राजेश बादल
वाशिंगटन के व्हाइट हाउस पर दो दिन तक दुनिया भर की नज़रें लगी हैं।चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच गुरूवार को लंबी द्विपक्षीय वार्ता हुई। क़रीब ग्यारह साल बाद चीनी शिखर पुरुष अमेरिका गए हैं।अपनी अटपटी प्रशासनिक शैली से संसार में अलग थलग पड़ रहे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने चीनी समकक्ष के लिए पलक पांवड़े बिछाकर स्वागत करने पहुंचे।प्रोटोकॉल की अनेक परंपराएँ तोड़कर उन्होंने विमानतल पर स्वयं शी की अगवानी की।यह पहली बार है ,जब मेहमान के लिए व्हाइट हाउस के भीतर नए-नए तरीके अपनाए गए हैं। उनके खाने -पीने से लेकर विश्राम तक में अनोखी शैलियाँ देखने को मिल रही हैं। ग़ौरतलब यह है कि लगभग चार महीने पहले जब डोनाल्ड ट्रंप बीजिंग गए थे तो वहां भी उनके लिए भव्य प्रबंध किए गए थे। लेकिन ,असल बात तो यह है कि दिखावे और तड़क -भड़क के पीछे दोनों मुल्क़ अपनी कूटनीतिक और कारोबारी सर्वोच्चता बनाए रखना चाहते हैं। कुछ वर्षों से बीजिंग संसार की एक तरह से दूसरी राजधानी बन गया है। इसलिए स्वागत के पीछे क्या छिपा है - कहना मुश्किल है।पर , शायद भारत के लिए इस बातचीत से कुछ सकारात्मक संदेश निकलते हैं।
ज़ाहिरा तौर पर तो दोनों वैश्विक ताक़तें अपनी वार्ता के दौरान अपने कारोबारी हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाली हैं। बीते कुछ वर्षों में अमेरिका को चीन ने झटका दिया है।डोनाल्ड ट्रंप को एक से अधिक बार अपने बढ़े हुए आक्रामक क़दम पीछे खींचने पड़े हैं। इससे अपने ही देश में उनकी किरकिरी हुई है। इतना ही नहीं,अमेरिका के पिछलग्गू राष्ट्रों ने भी चीन से अपने कारोबार की फिर से समीक्षा शुरू कर दी है। दुर्लभ खनिजों और भू-तत्वों के मामले में चीन अमेरिका पर भारी पड़ता है। इसलिए डोनाल्ड ट्रंप ने उस समय अपने देश को कमज़ोर पाया , जब चीन ने इन दुर्लभ खनिजों से जुड़े व्यापार पर इकतरफा रोक लगा दी थी।इसके बाद चीन-अमेरिकी व्यापार पर प्रतिकूल असर पड़ा था। भारत के नज़रिए से एक सकारात्मक परिणाम यह निकला था कि वैश्विक स्तर पर बड़ी कंपनियों ने अपनी भावी योजनाओं में तब्दीली शुरू कर दी थी। उन्होंने चीन के अलावा ऐसे वैकल्पिक राष्ट्र की खोज शुरू कर दी थी ,जहाँ वे अमेरिका-चीन के बीच गहरे तनाव के बावजूद कारोबार कर सकती थीं। इसलिए उनका ध्यान भारत की ओर गया। ऐसा नहीं था कि वे चीन को एकदम धता बताने की स्थिति में थीं ,मगर वे सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखना चाहती थीं।
इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हिन्दुस्तान इन वृहत औद्योगिक घरानों के लिए कोई आदर्श देश है। भारत की तुलना में आज भी चीन के भीतर प्रशिक्षित मैनपावर, बड़ा उत्पादन प्लेटफॉर्म और संसार भर में फैला सप्लायर नेटवर्क है। भारत इस तुलना में काफी पीछे है। हालाँकि एप्पल जैसी कंपनियों ने भारत में ज़ोरदार उपस्थिति दिखाई है। इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भी भारत पीछे नहीं है। दवाओं का कारोबार भी हिन्दुस्तान का सबसे मज़बूत क्षेत्र है।
दूसरा मुद्दा अमेरिका और चीन के बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता ( नक़ली अक्ल या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ) का है।डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग वार्ता में यह एक प्रमुख मसला बताया जाता है। दोनों शिखर ताक़तें इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े ख़तरों को सीमित करने पर विचार कर सकती हैं। अमेरिका चाहेगा कि वह तकनीकी सर्वोच्चता के मामले में चीन का दखल स्वीकार नहीं करे।,जबकि चीन इस सिलसिले में कुछ अमेरिका की ओर से लगाईं गई तकनीकी बंदिशों से राहत चाहेगा। भारत के लिए बेहतर स्थिति यह मानी जा सकती है कि अमेरिका-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता उसे रास आएगी। वह अपनी सुरक्षा चिंताओं के मद्देनज़र चीन से दूरी बनाकर ही रखना चाहेगा।मगर उसके लिए भारत को अपनी चारित्रिक तकनीकी कमज़ोरियों को भी दूर करना पड़ेगा।यदि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां यह सोचने लगें कि उन्हें भारत ही चाहिए ,बजाय इसके कि यदि चीन उपलब्ध नहीं तो फिर भारत की ओर रुख किया जाए। उनकी सोच में यह परिवर्तन हिन्दुस्तान के लिए दूरगामी लाभदायक हो सकता है।
जटिल मसला तो रूस और ईरान से ईंधन की खरीद का है। भारत और चीन दोनों ही दोनों राष्ट्रों से ईंधन खरीद रहे हैं। चूंकि ईरान और रूस लंबे समय से जंग में उलझे हुए हैं और वे अपनी अर्थव्यवस्था को चटकने से रोकने के लिए भारत और चीन को ईंधन आपूर्ति लगातार करते रहना चाहेंगे।खरीद की दरों में रियायत भी एक बड़ा कारण है। अमेरिका लगातार भारत पर ईरान और रूस से कच्चा तेल आयात नहीं करने का दबाव लंबे समय से बना रहा है। फिलहाल चाबहार बंदरगाह से व्यापार को छोड़कर भारत ने अमेरिकी दबाव की बात नहीं मानी है। शी और ट्रंप इस मामले में किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचेंगे ,कहना कठिन है। जानकारों की राय है कि यह विषय सहमति के पन्नों से नदारद रहेगा। पर,अघोषित एजेंडे में एक बात हो सकती है ,जिस पर दोनों राष्ट्रपति सहमत होना चाहेंगे। परदे के पीछे से दोनों देश स्वीकार कर सकते हैं कि वे मंच पर एक दूसरे पर गुर्राते रहेंगे ,लेकिन नेपथ्य में भारत और रूस को वैश्विक महाशक्ति बनने से रोकते रहेंगे। क्योंकि दोनों देशों की अंततः मंशा यही होगी कि वे आधी-आधी दुनिया बाँट लें और आधे-आधे चौधरी बनकर राज करें। आपसी मतभेद तो शाश्वत बने रहेंगे।इसलिए चीन और अमेरिका पाकिस्तान और यूक्रेन को सहायता करते रहेंगे। इससे भारत और रूस लगातार दबाव में रहेंगे।अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में इस तरह के प्रपंच जायज़ माने जाते हैं और उनमें नैतिकता तथा इंसानियत की भलाई का कोई स्थान नहीं होता। यह हमारे समय की क्रूर विडंबना है




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