राजेश बादल
संसार की पचास प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन ब्रिक्स इन दिनों अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है।जवान होते इस संगठन की उमर में पहली बार यह स्थिति बनी है।इस संगठन का भारत की भूमिका इसलिए भी इस बार महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि अठारहवाँ दो दिवसीय सम्मेलन बारह - तेरह सितंबर को दिल्ली में हो रहा है और इन दिनों भारत ही ब्रिक्स का अध्यक्ष है। यह भी ब्रिक्स के इतिहास में पहली बार है ,जब रूस जैसा वरिष्ठ सदस्य कुछ वर्षों से यूक्रेन के साथ जंग में उलझा हुआ है। यूरोप के अनेक देश और अमेरिका इस जंग में रूस के साथ नहीं हैं।इसके अलावा ईरान और अमेरिका - इज़रायल के साथ युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं।अमेरिका की शह पर हाल ही में मिस्त्र, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने मक्का संगठन बनाया है। सऊदी अरब भी एक मेहमान मुल्क के तौर पर ब्रिक्स में भागीदारी करता रहा है।इसलिए इस बार सम्मेलन के प्रस्तावों और निर्णयों पर अमेरिका की पैनी नज़र है। एक कारण यह भी है कि ब्राज़ील ,चीन ,रूस और भारत के साथ अमेरिका के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं है। इस कारण जिस चोटी की पंचायत में रूस, दक्षिण अफ्रीका और चीन के राष्ट्रपति, भारतीय प्रधानमंत्री तथा कुछ अन्य सदस्य देशों के शिखर पुरुष आ रहे हैं। इन देशों में ब्राज़ील की अर्थव्यवस्था सबको चौंकाती रही है।वह दुनिया की दस उन्नत अर्थ व्यवस्था वाले देशों में से एक है।लेटिन अमेरिकी देशों में शुमार ब्राज़ील की यह रफ़्तार अमेरिका को बहुत रास नहीं आ रही है।दिसंबर में ब्राजील से ही पिछले साल अध्यक्षता भार भारत ने संभाला है।इसके बाद यह पहला सम्मेलन हो रहा है।
बता दूँ कि ब्राज़ील ,भारत ,चीन रूस और दक्षिण अफ्रीका इस संगठन के संस्थापक सदस्य हैं। बाद में ग्यारह सदस्य इसमें शामिल किए गए और उनकी आमद के बाद भी यह पहली शिखर वार्ता है।नए सदस्य राष्ट्रों में ईरान,मिस्त्र ,इथियोपिया,इंडोनेशिया,सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुल्क भी हैं।वैश्विक जीडीपी में इस समूह के सदस्य राष्ट्रों का योगदान क़रीब 45 फ़ीसदी है।नए सदस्यों के प्रवेश के बाद आबादी और वैश्विक जीडीपी में ब्रिक्स की भागीदारी बढ़ जाएगी। यह भी दिलचस्प संयोग है कि प्रारंभिक पाँच राष्ट्रों की मुद्रा आर से शुरू होती है और इसी बरस ब्रिक्स की स्थापना के बीस साल पूरे हो रहे हैं।इसलिए इस बार हिन्दुस्तान की भूमिका पर संसार भर की नज़रें लगी हैं।
जहाँ तक भारत के हितों और प्राथमिकताओं की बात है तो हर बार की तरह भारत उन मसलों पर ज़ोर देगा ,जिनका समूचे विश्व की जनससंख्या से सीधा संबंध है। भारत की यह प्राथमिकताएँ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही चली आ रही हैं। इस वजह से सम्मेलन में खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद,स्वास्थ्य, तकनीक और वैश्विक शासन में सुधार जैसे अहम मुद्दों पर मंथन किया जा रहा है। यह अलग बात है कि ऊर्जा सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे पर भारतीय हितों को चुनौती मिलने वाली है। मसलन ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में ईंधन की आपूर्ति बेहद अहम मामला है। ईरान और रूस से कच्चे तेल की सप्लाई भारत ही नहीं ,सभी विकासशील देशों के लिए एक ज़रुरत है। मगर , अमेरिकी दबाव के चलते इसमें बाधा आ रही है। अमेरिका ने भारत पर पहले ईरान से कच्चे तेल की आपूर्ति बंद कराने के लिए दबाव डाला। उसके बाद उसने रूस से तेल खरीदने पर भारत के साथ किच -किच की। अभी भी जब तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के इस फैसले की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आलोचना करते रहते हैं। विडंबना है कि सऊदी अरब और मिस्त्र जैसे राष्ट्र अमेरिका की मित्र सूची में हैं और वे ब्रिक्स के सदस्य भी हैं। ब्रिक्स के बुनियादी एजेंडे में संसार की उभरती अर्थ व्यवस्थाओं को मजबूत करना तथा उनके विकास की गति तेज़ करना है। अब यदि अमेरिका के दोस्त उसके दबाव में आते हैं तो वे ब्रिक्स का सदस्य बने रहने का नैतिक अधिकार खो देते हैं क्योंकि वे इस संगठन के मूल उद्देश्यों से भटक जाएंगे और अपने ही साथी सदस्यों के हितों की खिलाफत करेंगे। इस सम्मेलन में उनका रवैया यक़ीनन ध्यान खींचेगा।
दूसरा मामला आतंकवाद से जुड़ा है। भारत दशकों से कहता रहा है कि पाकिस्तान आतंकवाद को पालता पोसता है।पाकिस्तानी राष्ट्राध्यक्ष ,प्रधानमंत्री ,और फौजी तानाशाह इस मामले में दो टूक बोलते रहे हैं।उनकी स्वीकारोक्ति के बाद भी अमेरिका जैसे चौधरी उसे मदद जारी रखते हैं। यही नहीं ,ताज़ा उदाहरण मक्का का है। मिस्त्र ,सऊदी अरब और पाकिस्तान इसके सदस्य हैं। बांग्लादेश जैसे मुस्लिम आबादी प्रधान मुल्कों को इसमें घसीटकर लाने की कोशिशें भी चल रही हैं। अब ब्रिक्स में मिस्त्र और सऊदी अरब भी शामिल हैं ,जो अमेरिकी इशारों पर चलते हैं। क्या वे भारतीय आर्थिक हितों की चिंता करेंगे ? पड़ोसी देश से आतंकवाद को मिल रही पनाह के कारण क्या वे भारत के साथ एक मंच पर खड़े होंगे। समझने की बात यही है कि आतंकवाद को पालने के कारण ही पाकिस्तान की दुर्दशा हुई है। अब वह खुद अपनी जलाई आग में झुलस रहा है। ऐसे में उसकी अपनी आर्थिक रफ़्तार तो ठहर गई है ,भारत पर भी उसका उल्टा असर पड़ा है। भारत को आतंकवाद का मुक़ाबला करने के लिए असीमित संसाधन झौंकने पड़ते हैं। इसका असर सीधे सीधे अर्थ व्यवस्था पर पड़ता है। ब्रिक्स के ये सदस्य देश मक्का के मंच पर पाकिस्तान को इस बात के लिए फटकार लगाएंगे ? शायद नहीं। अगर वे पाकिस्तान का विरोध करना चाहते तो मक्का समझौते में यह शर्त नहीं होती कि एक देश पर आक्रामक कार्रवाई तीनों देशों पर मानी जाएगी। भारत को आज नहीं तो कल ,देर सबेर पाकिस्तान के साथ आतंकवाद के मसले पर निर्णायक लड़ाई लड़नी ही पड़ेगी। ऐसे में दोनों देश क्या करेंगे ? मक्का संगठन तो अमेरिका के इशारे पर ही बना है और मिस्त्र तथा सऊदी अरब क्या अमेरिकी राजनयिकों के बयान देखते हैं कि वे किस तरह भारत के साथ दोस्ती की डींगें हांकते हैं। ज़ाहिर है अमेरिका दोनों तलों में तेल डालकर आग लगाने का प्रयास कर रहा है।
इस बार के एजेंडे में एक महत्वपूर्ण विषय वैश्विक शासन में सुधार भी है। भारत अरसे से संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय शिखर संस्थाओं की शैली और ढाँचे में सुधार की बात करता रहा है। क्या अमेरिकी दबाव में ऐसा कभी हो पाएगा ?






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