डॉ. सुधीर सक्सेना
सन 1914... वह प्रथम विश्व युद्ध का कठिन समय था। लगभग सारा योरोप धुयें, धमाकों और बारूदी गंध में डूबा हुआ था। धरती का दिल दहल रहा था। जर्मनी और उसके साथी राष्ट्रों पर युद्धोन्माद तारी था। बीसवीं सदी की दूसरी दहाई में रक्तरंजित इबारतें लिखी जा रही थी। ब्रिटेन के उपनिवेश ब्रिटेन की ताकत थे। वे उसे जनबल और धनबल मुहैया कर रहे थे।
ब्रिटेन ने अंतत: जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। ब्रिटिश भारत के लाखों सैनिकों को अब योरोप में लाम पर जूझना था। अजनबी धरती, अजनबी मौसम और अजनबी दुश्मन। नयी-नयी युद्ध गाथायें सामने आ रही थीं। 28 जुलाई, सन 1914 से 11 नवंबर, सन 1918 के दरम्यान हुये इस युद्ध में एक ओर फ्रांस, रूस और ब्रिटेन जैसी महाशक्तियां थी, तो दूसरी ओर थे जर्मनी, आस्ट्रिया-हंगरी, बुल्गारिया और आटोमन साम्राज्य सन 1917 के उपरांत संयुक्त राज्य अमेरिका भी फ्रांस-ब्रिटेन-रूस की धुरी की ओर से युद्ध में शरीक हो गया। त्रिपक्षीय संधि और त्रिपक्षीय सहयोग के जरिये योरोप दो प्रतिद्वंद्वी खेमों में बंट गया था। जर्मनी और इटली के विस्तारवादी तेवर ब्रिटेन-फ्रांस जैसी उपनिवेशवादी ताकतों को रास नहीं आये। मोरक्को और बोस्निया संकट ने तनाव में इजाफा किया। रही सही कसर जर्मनी की बर्लिन-बगदाद रेलपांत-परियोजना ने पूरी कर दी। ब्रिटेन और जर्मनी के मध्य नाविक-प्रतिस्पर्द्धा ने वर्ष 1911 में अगादिर संकट को न्यौता दिया। अगले वर्ष 1912 में जर्मनी के विश्व के विशालतम नौसैनिक पोत 'इंपरेटर' के निर्माण ने सामरिक-आशंकाओं को घना किया। जून, 1914 में आस्ट्रिया, हंगरी के राजसिंहासन के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनांड की सारायेवो (बोस्निया) में गोली मारकर हत्या ने विस्फोटक माहौल में पलीते का काम किया। देखते ही देखते युद्ध छिड़ गया।
वर्ष 1914 वह प्रारंभिक काल था, जब जर्मनी को आंशिक बढ़त हासिल हुई। तब जर्मनी सम्राट काइजर विल्हेम द्वितीय के अधीन था।
अपूर्व और विलक्षण वचनबद्धता की इस कहानी में जर्मन सम्राट काइजर की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस अविश्वसनीय सी प्रतीत होती गाथा का नायक है एक ब्रिटिश फौजी, जो लाम पर जूझते हुये जर्मन सेनाओं द्वारा बंदी बनाया गया और जिसने कई साल बतौर युद्धबंदी जर्मन कैद में बिताये।
किस्सा अगस्त, सन 1914 का है। स्थान उत्तरी फ्रांस। ब्रिटेन की फर्स्ट बटालियन ईस्ट सरे रेजीमेंट मॉन्स कॉन्डे नहर के पास तैनात थी। रेजीमेंट की कमान कैप्टेन रॉबर्ट कैंपबेल के हाथों में थी। कैप्टेन कैंपबेल 29 वर्ष का युवा था। जांबाज और प्रशिक्षित ब्रिटेन को जंग का ऐलान किये कुछ ही हफ्ते बीते थे। विशाल जर्मन सेना आगे बढ़ रही थी। ब्रिटिश सेना का युद्ध कौशल कसौटी पर था। कैंपबेलन के सैनिकों को लाइन बनाये रखने का आर्डर मिला। परिस्थितियां विषम थीं। जर्मन चमू सामने थी। सुसज्ज और संख्या बल में ज्यादा।
जल्द ही जर्मन फौज का पलड़ा भारी हो गया। कैंपबेल और उसके सैनिकों का शौर्य काम न आया। बड़ी संख्या में वे हताहत हुये। कैंपबेल वीरता से लड़ा, लेकिन बुरी तरह घायल हुआ। आहत अवस्था में उसे जर्मनों ने बंदी बना लिया। वे अपने इस युवा युद्धबंदी को अस्पताल ले गये। वहां उसका उपचार हुआ। कैंपबेल के भाग्य में अभी जीवन बदा था। उपचार के बाद उसे मैग्डेबर्ग के युद्धबंदी शिविर में भेज दिया गया।
शिविर का जीवन त्रासद था। कठिन और यातनामय। कांटेदार बाड़। कुत्तों की रखवाली। प्रहरियों की चौकन्नी निगाह। घर से सैकड़ों मील दूर कैंपबेल की दिनचर्या कठोर थी। सुबह से लेकर शाम तक हाड़तोड़ श्रम। रोज रोल कॉल, मामूली बेस्वाद भोजन। नीरस दिन। विश्राम या मनोरंजन का नामोनिशां नहीं। उसने साथी अफसरों का मनोबल बनाए रखने के वास्ते लेक्चर, खेल और पत्राचार का सहारा लिया।
दिन बीतते रहे। घड़ी की सुइयां घूमती रहीं। धीरे-धीरे ज़र्द पड़ते कैलेंडर के पन्ने फड़फड़ाते रहे। इस तरह दो साल बीत गये। पहले सन 2014 का चौमासा बीता। फिर सन 2015 की दोनों छमाहियां। अपनी गति से युद्धग्रसत सन 2016 भी बीत चला। उसका अंत सन्निकट था कि कैंपबेल को एक खत मिला.....
यह खत उसके घर से आया था। पत्र मार्मिक था। ऐसा कि कैंपबेल की आंखों में आंसू भर आये। पत्र उनकी मां लुइस का था। लुइस कैंसर से पीड़ित थीं। कैंसर यानि असाध्य बीमारी। लाइलाज कैंसर से पीड़ित ममतालु मां ने अपने युद्ध बंदी बेटे को मृत्युशैया से अंतिम पत्र लिखा था....
कैंपबेल अपनी सेल में बैठकर पत्र पढ़ते रहे। डबडबाई आंखों से उन्होंने उसे बार-बार पढ़ा। मां और बेटे के मध्य सैकड़ों मील का फासला था, अलंघ्य फासला। कैंपबेल दुश्मन के कब्जे में थे। निरूपाय कैंपबेल मां को देखने जायें तो कैसे जायें? उन्होंने जुगत बिचारी। अनोखी युक्ति। उन्होंने युद्ध को क्रूर नियति मानकर अपनी ससहायता को कुबूल नहीं किया।
कैंपबेल ने एक खत लिखा। याचना के लहजे में यह पत्र जर्मन सम्राट काइजर विल्हेम द्वितीय को संबोधित था। जर्मन सम्राट के नाम एक बर्तानवी युद्धबंदी के इस खत का मजमून इस प्रकार था : "आपकी महिमा, सम्राट। मेरी मां मर रही है। मैं अंतिम बार उसे देखने के लिए घर लौटने की अनुमति चाहता हूँ। मैं आपको अपनी ब्रिटिश अधिकारी की कसम देता हूं कि उसके बाद मैं वापस आ जाऊंगा...."
पत्र में याचना थी और वचन भी। यह अत्याशित और अविश्वसनीय अनुरोध था। युद्ध अपने चरम पर था। विमान और तोपें गड़गड़ा रही थीं। गोलियों से दोनों ओर के सैनिकों के जिस्म छलनी हो रहे थे। ऐसे में एक युद्धबंदी सम्राट से कातर गुहार कर रहा था। वह कसम खा रहा था कि वह लौट आयेगा।
कुछ हफ्तों बाद सम्राट काइजर का जवाब आ गया। अविश्वसनीय पत्र और अप्रत्याशित उत्तर। सम्राट ने लिखा कि कैंपबेल को दो हफ्तों का सहानुभूति-अवकाश दिया जाता है। यात्रा समेत छुट्टी। शर्त बस इतनी थी कि कैंपबेल अपना वचन निभाएंगे। कोई गार्ड नहीं। कोई जंजीर नहीं।.... अमेरिकी दूतावास के माध्यम से जरूरी इंतेजामात हुये। दिसंबर, 2016 में कैंपबेल शिविर से रिहा एकाकी कैंपबेल नीदरलैंड होते हुये इंग्लैंड पहुंचे।
अब कैंपबेल स्वदेश में थे। मादरे-वतन की आजाद हवा में सांस लेने का सुख अलग होता है। कैंपबेल ने खुली हवा में सांस ली। अपने घर पहुंचे। मां बेटे को देखकर निहाल हुई। बेटे ने एक सप्ताह मां के साथ बिताया। दोनों ने अपनी-अपनी पीड़ा सांझा की। एक हफ्ता देखते-देखते बीत गया। लगा कि समय के वाकई पंख होते हैं....
अंतत: लौटने की वेला आ गयी। असमंजस और निर्णय की घड़ी। कैंपबेल को फैसला करना था। एक ओर आजादी तो दूसरी ओर वचन। वचन-भंग करने पर क्या होता? कौन उस पर तोहमत मढ़ता। युद्ध में तो सब जायज है...
आप सोचते होंगे कि कैंपबेल ने क्या किया? कैंपबेल ने वचन निभाया। उसने सम्राट काइजर को दिये वचन की अवमानना नहीं की। यह एक फौजी का कौल था। वह अवकाश के लिये सम्राट का कृतज्ञ था। वह वापस लौट गया। जर्मनी में मैग्डेबर्ग के उसी युद्धबंदी-शिविर में। सात दिन रूग्ण मां के साथ बिताकर उसने कुछ देर मां की ऊष्ण हथेली में माथा टिकाकर विदा ली। मां ने अपने पुत्र को सम्मान और वचन की ईमानदारी की परिधि में खड़ा देखा तो रोका नहीं।
कैंपबेल ने वचन तो निभाया, लेकिन एक फौजी की भांति शिविर से भागने की फिराक में साथियों के साथ नौ माह तक गुपचुप सुरंग खोदी। वे नीदरलैंड की सीमा तक पहुंचे भी लेकिन पकड़े गये। वह सन 1918 में युद्ध विराम तक कैदी रहे।
युद्ध खत्म होने पर कैंपबेल इंग्लैंड लौटे। सन 1925 में वह सक्रिय सेवा से निवृत्त हुये। द्वितीय विश्वयुद्ध में वह सन 1939 में फिर से फौज में लौटे। तदंतर उन्होंने आइसल ऑफ वाइट में शांति निरूद्वेग जीवन बिताया। जुलाई, सन 1966 में उनका निधन हुआ। तब उनकी उम्र 81 वर्ष थी।
कैंपबेल की कहानी अन्य युद्ध गाथाओं से भिन्न है। वह आलोड़ित करती है। उसमें नैतिकता का बोध भी है। उसने शत्रु राष्ट्र के सम्राट के सामने कसम खाई थी, पत्र के जरिये कसम। सम्राट ने एक फौजी नहीं, बल्कि एक पुत्र की भावनाओं की क़द्र की। और पुत्र ने सम्राट का मान रखा....
युद्ध की समाप्ति ने अनेक सरहदें बदल दीं। सम्राट काइजर विल्हेम द्वितीय का तख्तो-ताज जाता रहा। काइजर और कैंपबेल ने कभी एक दूजे को नहीं देखा। कैंपबेल ने दूसरे महासमर में जर्मनी के खिलाफ जंग में शिरकत की।
पता नहीं कैप्टेन राबर्ट कैंपबेल पूछे जाने पर या आपबीती लिखने पर सम्राट काइजर के प्रति अपनी भावनाओं को किन शब्दों में व्यक्त करता?




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