राजेश बादल
ख़बर है कि यूक्रेन ने रूस के साथ युद्ध में अपने हज़ारों रोबोट वाली मशीनी सेना उतार दी है।यह सेना रूस की ओर बढ़ रही है।यूक्रेन का दावा है कि इसमें 3000 रूसी सैनिक मारे गए हैं। इन रोबोट की सहायता से यूक्रेन ने कुछ गाँव और इलाक़े रूस के क़ब्ज़े से छीन लिए हैं।अब रूस समेत यूरोप के कई देश भी भयभीत हैं और उन्होंने भी अपनी रोबोट सेना का उत्पादन तेज़ कर दिया है। टेंक,ड्रोन और राइफल की तरह यह भी एक जंगी मशीन या उपकरण है। इसमें सैनिकों के मारे जाने का डर नहीं है।इसलिए रोबोट नामक यह मशीन अधिक निर्ममता से दुश्मन देश में जाकर संहार कर सकती है।ज़ाहिर है कि यूक्रेन इतने बड़े पैमाने पर रोबोट का निर्माण अपने बूते नहीं कर सकता था।उसे इसमें यूरोप के मित्र देशों से सहायता मिली है।यह यूरोपीय देशों का वही समूह है,जो इन दिनों रूसी आक्रमण की आशंका से भयभीत है और अमेरिकी सुरक्षा कवच से बाहर है।जंग में रोबोट के इस्तेमाल ने अब अनेक देशों का सीधा दख़ल बढ़ा दिया है।इसके अलावा दूर से रिमोट,कम्प्युटर या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम अक्ल ) से निर्देशित इस चलित मशीन के उलटकर मार करने का भी डर है।यानी जो पक्ष रोबोट भेज रहा है,उसकी प्रोग्रामिंग में दुश्मन सेंध लगा कर उसी रोबोट को उलटी दिशा में भी आक्रमण के लिए भी मजबूर कर सकता है।क़रीब पाँच - छह बरस पहले तो एक रोबोट ने अपने विवेक से फैसला ले लिया और इंसानों को मार डाला था,जबकि उसे किसी रिमोट या इंसानी उपकरण ने निर्देश नहीं दिया था। यह मानवता के नज़रिए से भयावह और विनाशकारी पहलू है,जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। खतरनाक चेतावनी तो यह है कि अपने सैनिकों की जान बचाने के लिए कोई देश रोबोट का इस्तेमाल तो करेगा,लेकिन वह रोबोट अपने मिशन को पूरा करने के लिए निर्दोष नागरिकों को नहीं मारेगा,इसकी कोई गारंटी नहीं है।यह ऐसी चेतावनी है,जिसके एक बार आरंभ होने पर स्वयं इंसान के लिए भी उसे रोकना शायद संभव नहीं होगा।
इसे समझने के लिए मैं एक आसान उदाहरण देना चाहूंगा।जब हम किसी परिचित से फ़ोन पर बात करते हैं और आमने-सामने बात करते हैं तो एक बड़ा अंतर होता है।आमने-सामने बात करने पर हम उसका चेहरा देख पाते हैं और चेहरे पर उभरने वाले भावों को पढ़ सकते हैं।इन भावों को पढ़ने से कई बार हमारी प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सामान्य और सहज होती है।हम उसकी आँखों के भीतर झाँककर दिल की ज़बान भी पढ़ सकते हैं।इस कारण आपसी संवाद कर्कश नहीं होता और सीधे संघर्ष की नौबत कम बनती है।लेकिन वही परिचित यदि फोन पर होता है तो हमारे सामने चेहरा नहीं होता।सिर्फ़ उसकी आवाज़ होती है,जो शब्दों की सख़्ती और कर्कशता को कई गुना बढाकर प्रस्तुत करती है।यह ध्वनि विज्ञान का प्रामाणिक सिद्धांत है।ऐसी स्थिति में फोन पर झगड़ा करने अथवा तीखा संवाद होने की आशंका अधिक होती है।यही रोबोट के मामले में कहा जा सकता है।रोबोट चेहरे के भाव नहीं पढ़ता।वह तो सिर्फ प्राप्त कमांड के आधार पर लोगों को मारना या विस्फोट करना जानता है। इस तरह बेकुसूर नागरिक मारे जाते हैं। रोबोट का कुछ नहीं होता। इंसानियत मर जाती है।
थोड़ा अतीत में जाने से स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी ।पढ़ने में अटपटा लग सकता है कि दुनिया में रोबोट के पूर्वज सौ साल से भी पहले अस्तित्व में आ गए थे। पहले विश्वयुद्ध में ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था,जो मानव रहित थे और बहुत दूर से रिमोट के ज़रिए संचालित होते थे।कुछ ऐसे वायुयान भी काम में लिए गए थे,जो रेडियो कण्ट्रोल से संचालित होते थे।इसके बाद दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर की अगुआई में जर्मन सेना ने मानव रहित टेंकों का उपयोग किया।ये सौ किलोग्राम तक के विस्फोटक ले जाने में सक्षम थे और दूर कहीं कोई फौजी बैठकर इन्हें संचालित करता था।इन्ही दिनों सोवियत संघ ने भी रेडियो कंट्रोल टेंकों का उपयोग किया था।यह टैंक क़रीब 5000 फिट दूर से रिमोट के माध्यम से नियंत्रित करते थे।लगभग एक दशक बाद या यूँ कहूँ कि विएतनाम युद्ध के आसपास दो दशक तक अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने ड्रोन तकनीक पर काम किया।इसके पश्चात अफ़ग़ानिस्तान जंग में पहली बार 2002 में ज़मीनी रोबोट का उपयोग किया गया।अमेरिका ने इस रोबोट का उपयोग अफ़ग़ानिस्तान की गुफाओं में तालिबानी लड़ाकों तथा हथियारों का पता लगाने के लिए किया था।फिर अमेरिका ने ही इराक़ में अगले साल ज़मीनी रोबोट का उपयोग किया और छह साल पहले तो तुर्की में बने एक रोबोट ने अपने मन से निर्णय ले लिया और एक इंसानी लक्ष्य को मार डाला। इस ख़बर ने भले ही संसार में हलचल नहीं मचाई ,लेकिन यह एक खतरनाक और विनाशकारी मोड़ था।इसके बाद यूक्रेन ने आत्मघाती रोबोट फ़ौज के ज़रिए सारी दुनिया को विनाश का एक नया रास्ता दिखा दिया है।रूस का जो होगा ,सो होगा ,लेकिन यूक्रेन को इस मोड़ पर रोकना अत्यंत आवश्यक है।
जहाँ तक अन्य देशों की बात है ,तो इस विनाशकारी मशीन के बारे में चीन,इज़रायल,रूस और भारत भी अनुसंधान कर रहे हैं। मगर ,भारत का उद्देश्य यक़ीनन उसे रोबोट आर्मी के रूप में विकसित करना नहीं है।हिन्दुस्तान में एक्सपलोडर श्रेणी के एक रोबोट को विकसित करने पर काम चल रहा है ,जो ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर रिमोट से निर्देश लेकर जा सकेगा ,सीमा पर निगरानी रख सकेगा और विस्फोटकों की पहचान करके उससे बचाव में सहायता करेगा। विज्ञान के नए नए अवतारों का रचनात्मक उपयोग हो तो बेहतर अन्यथा रोबोट नाम की मशीन इंसानियत को विनाश के एक अंधे कुएँ में ले जाने पर उतारू है।इससे बचाव का रास्ता खोजना ही पड़ेगा ।संयुक्त राष्ट्र जैसी महत्वपूर्ण संस्थाएँ किसी मुल्क़ पर अगर इस मामले में रोक लगाने में नाकाम रहती हैं तो साफ़ है कि विश्व एक नई आदम गुफा में क़दम रखने जा रहा है।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इसी वजह से और याद आते हैं। उनके बाद शांति के लिए काम करने वाला व्यक्तित्व कौन है ?






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