राजेश बादल
भारत एक के बाद एक बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान को निमंत्रण भेज रहा है और वे रूठे हुए हैं।भारत अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों और कूटनीति की परंपराओं का पालन करते हुए उन्हें आमंत्रित करता आ रहा है।जबसे वे प्रधानमंत्री बने तो पहला आमंत्रण भारत ने ही भेजा था।लेकिन वे ठुकराकर मलेशिया और चीन चले गए।इसके बाद भी भारत के प्रयास जारी रहे।आगामी 12-13 सितंबर को भारत में ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन हो रहा है।हालाँकि बांग्लादेश ब्रिक्स का सदस्य नहीं है,फिर भी सदाशयता दिखाते हुए भारत ने स्वाभाविक न्यौता अपने इस पड़ोसी को भेजा।लेकिन बांग्लादेश अपनी दुविधा से बाहर नहीं निकल पा रहा है।तारिक़ रहमान पारिवारिक रंजिश या प्रतिद्वंद्विता को प्राथमिकता दे रहे हैं।वैदेशिक संबंधों की पेचीदगियाँ समझने में उन्हें वक़्त लगेगा।उनका हठ है कि भारत शेख हसीना वाजेद को उन्हें सौंप दे।भारत इसके लिए बाध्य नहीं है।यूँ तो दलाई लामा को दशकों से चीन मांग रहा है।पर,उसके साथ कूटनीतिक रास्ते बंद नहीं हैं।यह बात बांग्लादेश को आज नहीं तो कल समझनी ही पड़ेगी।तारिक़ को पारिवारिक अतीत भूलना होगा।
दरअसल बांग्लादेश की स्थापना के बाद से वहाँ का घटनाक्रम समझना होगा क्योंकि साठ साला प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान मुल्क को उसी राह पर ले जा रहे हैं,जिस पर कभी उनके पिता जियाउर्रहमान ले गए थे।उनके पिता ने पहले दो युद्धों में पाकिस्तान की ओर से भारत के विरुद्ध हिस्सा लिया।लेकिन जब बांग्लादेश को स्वतंत्र देश के रूप में स्थापित करने के लिए शेख़ मुजीबुर्रहमान ने संघर्ष छेड़ा तो वे अनमने होकर पाकिस्तानी फ़ौज का साथ दे रहे थे।जब पाकिस्तानी सेना के अत्याचार बढ़ते गए तो वे पाला बदलकर शेख मुजीब के साथ आ गए।बंगबंधु शेख मुजीब की गिरफ़्तारी के बाद जनरल जिया उर्र हमान ही थे, जिन्होंने बांग्लादेश की आज़ादी का ऐलान ढाका रेडियो से किया था।बांग्लादेश की अवाम इस ऐलान के बाद जनरल जिया पर भरोसा करने लगी थी।वह नहीं समझ सकी कि जनरल जिया के भीतर एक महत्वाकांक्षी फौजी पल रहा है और वह नए बांग्लादेश का सुप्रीमो बनना चाहता है।जिया को क़तई उम्मीद नहीं थी कि शेख मुजीब कभी ज़िंदा लौटेंगे और देश के पितृ पुरुष बन जाएंगे।शेख मुजीब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने धर्म निरपेक्ष बांग्लादेश की नींव डाली।जिस देश का नाम ही बांग्ला भाषा के आधार पर पड़ा हो तो स्पष्ट है कि इस्लाम का वहाँ वह रूप नहीं था,जो पाकिस्तान में था।पाकिस्तान अपने दूसरे हिस्से से नफ़रत करता था तो उसका मूल कारण यही था।
इस पृष्ठभूमि में कह सकते हैं कि जनरल जिया उर रहमान उचित अवसर की तलाश में थे,जब वे शेख मुजीब को हटा सकते थे।मिजाज़ से वे कट्टरपंथी थे और धर्मनिरपेक्ष नहीं थे।परदे के पीछे अपने मक़सद में उन्हें चार साल लगे।जब 1975 में सेनिक विद्रोह हुआ और शेखमुजीब कुनबे के साथ मारे गए तो बांग्लादेश की धर्म निरपेक्षता,लोकतांत्रिक धारा और भारत के प्रति मैत्री भावना की भी हत्या हो गई।जनरल जिया-उर -रहमान राष्ट्रपति बने तो भारत से दूरी और चीन से निकटता उनकी विदेश नीति की प्राथमिकताएँ थीं।धर्मनिरपेक्षता की राह त्यागकर बांग्लादेश सांप्रदायिक और इस्लामी मुल्क बनने जा रहा था।यह अलग बात थी कि जियाउर्रहमान ने विकास की रफ़्तार तेज़ की और दुनिया के लिए द्वार खोले।पर,उन्हें अपनी सेना के बहुमत का समर्थन नहीं मिला।उनके ख़िलाफ़ कम से कम 20 बार सशस्त्र विद्रोह या तख़्तापलट के प्रयास हुए।वे क्रूर तानाशाह के रूप में उभरे और उनके आलोचक फौजी अफसर या तो रहस्यमय ढंग से ग़ायब हो गए अथवा मार डाले गए।यह आँकड़ा हैरान करता है कि उनके कार्यकाल के दरम्यान 1977 में 1143 लोगों को तख़्तापलट की साज़िश के आरोप में जेलों में फाँसी दे दी गई थी।यही नहीं,जो फौजी अफसर शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार की हत्या में शामिल थे,वे जनरल जियाउर्रहमान की आँखों के तारे बन गए।उन्हें पदोन्नति दी गई अथवा अन्य देशों में भेज दिया गया।भारत के ख़िलाफ़ नफ़रत का ज़हर उगलने का काम इसी दौर में हुआ।हालाँकि जियाउर्रहमान के विरुद्ध 21 वीं तख्तापलट साज़िश कामयाब रही और उनका हश्र भी वही हुआ,जो शेख मुजीब का हुआ था।चटगाँव में उनके आठ सुरक्षाकर्मियों के साथ उनकी हत्या कर दी गई।बाद में उनकी पार्टी बांग्ला नेशनलिस्ट पार्टी की बागडोर जिया की विधवा खालिदा जिया ने संभाली और तीन बार प्रधानमंत्री रहीं।
जब शेख मुजीब की हत्या हुई तो बेटी शेख़ हसीना वाजेद जर्मनी में थीं।वहाँ से वे भारत आईं।भारत से जाकर बांग्लादेश में चुनाव लड़ा और अपनी पार्टी अवामी लीग को जीत दिलाई।वे तीन बार देश की मुखिया बनी। ज़ाहिर था कि उन्हें प्रतिद्वंद्वी बीएनपी से प्रतिशोध लेना ही था।बीएनपी की मुखिया खालिदा जिया तमाम आरोपों में जेल में डाली गई। उनके बेटे और मौजूदा प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान तो अवामी लीग की एक रैली पर हमले में दोषी पाए गए।उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।हमले में अवामी लीग के 24 से अधिक शिखर नेता मारे गए थे।राष्ट्रपति की पत्नी और महिला अवामी लीग की अध्यक्ष श्रीमती रहमान भी मारी गई थीं।इस नरसंहार में एक बार फिर बीएनपी की भूमिका पाई गई थी।शेख हसीना वाजेद इसके बाद बेहद आक्रामक हो गईं और बीएनपी नेत्री खालिदा जिया को जेल जाना पड़ा। तारिक़ रहमान भी निर्वासन में थे।अब तारिक़ रहमान के हाथों में मुल्क की बागडोर है तो वे अवामी लीग और उसकी सुप्रीमो शेख हसीना वाजेद से दो दो हाथ करना चाहते हैं।ऐसे में भारत के लिए शेख हसीना को स्वदेश भेजना ख़तरे से खाली नहीं है।शेख हसीना भारत को अपना दूसरा घर मानती हैं।वे और उनकी पार्टी की भारत के साथ स्वाभाविक मैत्री रही है और रहेगी।अपने किसी शरणार्थी को मौत के मुंह में धकेलने की भारत की नीति कभी नहीं रही है। दलाईलामा के मामले से ही भारत की स्पष्ट नीति रही है। ऐसे में अविश्वसनीय और पाकिस्तान की गोद में बैठे तारिक़ रहमान की बात कैसे मानी जा सकती है ?






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