डा.सुधीर सक्सेना
जंग जारी है और दोनों पक्षों की भाव भंगिमा बताती है कि लड़ाई लंबी खिंचेगी। मार्च के पहले हफ्ते में न केवल लड़ाई का घनत्व बढ़ेगा, बल्कि उसका दायरा भी। अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त आक्रमण के संभावित नतीजों से ईरान वाकिफ़ है, लिहाजा तेहरान की कोशिश होगी कि जंग लंबी खिंचे और साझा आक्रमणकारियों और उनके पिट्ठुओं को ज्यादा से ज्यादा क्षति पहुंचाई जाये। उसकी कोशिश होगी कि चीन, रूस और उत्तर कोरिया का संग-साथ उसे मिल जाये, जिससे वह अमेरिका-इस्राइल को छँका सके। तेहरान दिवंगत राष्ट्रपति अयातुल्लाह खामेनेई की इस उक्ति पर आखिरी दम तक अमल करेगा कि लड़ाई आप शुरू करेंगे लेकिन इसे खत्म हम करेंगे। यह एहसास होने पर कि बाजी उसके हाथों से फिसल रही है, वह रासायनिक और अन्य घातक हथियारों का इस्तेमाल करने से चूकेगा नहीं।
तेलअवीव और वाशिंगटन इस पर परस्पर पीठ थपथपा सकते हैं कि ऐलानिया जंग के चौबीस घंटों के भीतर ईरान ने अपना राष्ट्रपति और रक्षामंत्री खो दिया। अमेरिका से वार्ता पर भरोसा खामेनेई के लिए गफलत सिद्ध हुआ और वह राष्ट्रपति निवास पर हवाई हमले में ठौर मारे गये। उन्होंने 36 सालों की लंबी पारी खेली। वह पूंजीवादी, जियोनिस्ट और साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ दृढ़तापूर्वक खड़े रहे और नायकत्व अर्जित किया, किंतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिलाओं को समानता के अधिकारों के क्रूर दमन ने देश, विदेश में उनकी छवि को खरोंचे पहुंचाई। इससे उनकी वफात पर जश्न भी मनाया गया, ट्रंप को अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने का मौका मिला और निर्वासित युवराज पहलवी ने ईरानी अवाम से तख्तापलट के लिए सड़कों पर आने की गुजारिश कर डाली। बिलाशक तेलअवीव-वाशिंगटन की धुरी की यह कोशिश है कि ईरान में 'चेंज ऑफ रेजीम' हो। ट्रंप ईरान में वेनेजुएला दोहराना चाहते हैं। बीबी (नेतन्याहू) के साथ मिलकर उनकी इस आक्रमक कार्रवाई का सबसे चिंतनीय पहलू यही है कि उसने दोनों गोलार्द्धों के देशों को इस नाते सशंक कर दिया है कि महाबली अमेरिका के मुखिया ट्रंप अपने वर्चस्व और नियंत्रण के लिए हनक में किसी भी देश के विरूद्ध निर्लज्जतापूर्वक कोई भी बेजा कदम उठा सकते हैं।
ईरान के पूर्व राष्ट्रपति और धर्मगुरू खामेनेई अब नहीं हैं, लेकिन ईरान के लिए लोकतंत्र अभी दूर की कौड़ी है। उनके साहेबजादे के तख्तानशीं होने से स्पष्ट है कि मजहबी हुकूमत में राजशाही की वंशवाद की बुराई ने भी जड़ें जमा ली हैं। यकीनन ईरानी अवाम के लिए यह बुरा और कठिन वक्त है। वैसे भी यह असमान युद्ध है। अमेरिका और इस्राइल का संयुक्त बल ईरान से कहीं ज्यादा है। इस्राइल की आबादी फ़क़त 95 लाख है, लेकिन उसका रक्षा बजट पौने नौ करोड़ से अधिक आबादी के ईरान के बजट से करीब दो गुना है। ईरान का रक्षा बजट 15.45 बिलियन डॉलर है तो इस्राइल का 30.5 बिलियन डॉलर। बख्तरबंद गाड़ियों, राकेट लांचरों और पनडुब्बियों के मामले में ईरान इस्राइल पर भारी है, किंतु आसमान में इस्राइल बेहतर इंटेलीजेंस और तक्नालॉजी से लैस है। अमेरिका की ताकत को जोड़ लें तो ईरान कहीं नहीं ठहरता। युद्धपोत जेराल्ड फोर्ड और ईरान के इर्दगिर्द अमेरिकी नौसैनिक अड्डों की मौजूदगी से अमेरिका-इस्राइल को मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल है। फिर भी ईरान भरसक लोहा लेगा। उसके घुटने टेकने के आसार नहीं है। देखना दिलचस्प होगा कि, बीजिंग-मस्क्वा धुरी क्या रणनीति अख्तियार करती है, क्योंकि इस जंग के अंजाम का सबसे ज्यादा असर अगर किन्हीं पर पड़ेगा तो वे हैं रूस और चीन। निश्चित ही यह जंग आसान नहीं है और इसके नतीजे विश्व राजनीति और राजनय की दशा और दिशा बदल देंगे।




131.jpg)


225.jpg)



101.jpg)






