राजेश बादल
अमेरिका के अतीत में कभी यक़ीनन लोकतंत्र का अर्थ होता था।उन दिनों राष्ट्रपति के अलावा अन्य पदों पर विराजे राजनेताओं का भी सम्मान होता था।उस लोकतंत्र में एक दूसरे की भावना का आदर होता था।उन सबने मिलकर अमेरिका को ताक़तवर महाशक्ति बना दिया।यह अलग बात है कि मूल चरित्र में धन और स्वार्थ तब भी था और आज भी है।जम्हूरियत के महीन सरोकारों को अमेरिका ने कभी महत्त्व नहीं दिया।बराक़ ओबामा तक उस लोकतांत्रिक भावना के किसी न किसी रूप में दर्शन होते रहे।अलबत्ता मूल्यों में क्षरण भी लगातार होता रहा ।लेकिन डोनाल्ड ट्रंप तो जैसे मुल्क़ के लोकतंत्र से ही बग़ावत कर बैठे हैं।उनके लिए सामुदायिक नेतृत्व और सैद्धांतिक मर्यादाओं का कोई अर्थ नहीं है।वे निरंकुश अधिनायक जैसा बरताव कर रहे हैं।उपराष्ट्रपति समेत तमाम शिखर ओहदों पर बैठे विद्वान उनके लिए मायने नहीं रखते।अमेरिकी संविधान में राष्ट्रपति को प्राप्त असीमित अधिकारों का वे धड़ल्ले से दुरूपयोग कर रहे हैं। अवाम ठगी सी उनका यह अंदाज़ देख रही है।इसमें आम जनता का दोष नहीं है कि उसने डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति के रूप में चुना।हकीकत तो यह है कि उसने सपने में भी नही सोचा होगा कि अमेरिका में कोई ऐसा राष्ट्रपति भी आएगा,जो विकृत सामंत की तरह व्यवहार करेगा।अब मत का दुरूपयोग होते देख निश्चित रूप से वह खुद को कोस रही होगी।
वैसे आज के संसार में लोकतंत्र की यह कमज़ोरी ही है कि उसमें आम नागरिक की भागीदारी सिकुड़ती जा रही है।उसकी भूमिका सिर्फ़ वोट देने तक सीमित रह गई है।अरसे तक ग़ुलामी के बाद लोग आज़ादी दिलाने वाले नियंताओं पर भरोसा करते रहे हैं।विश्व इतिहास को देखें तो इन नियंताओं ने भी जनता से धोखा नहीं किया।इस परंपरा की निरंतरता के कारण प्रतिरोध की संस्कृति शनैः शनैः क्षीण होती गई है।उसके दिमाग़ में ग़ुलामी के वायरस इतने कमज़ोर पड़ गए कि वह निश्चिंत हो गई।अब ट्रंप तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं तो लोग नहीं समझ पा रहे कि वे क्या करें ? वे संसद,संविधान और न्यायपालिका का मख़ौल उड़ाते ट्रंप का नया चेहरा देख रहे हैं।एक सनकी राजा,जो कभी भी कोई भी फ़ैसला ले सकता है। जिसे अपने सलाहकारों और मंत्रिमंडल तक की परवाह नहीं है।जो आए दिन बयान बदलता है और मनगढ़ंत क़िस्से दुनिया के सामने परोसता है।जो अपने पहले कार्यकाल में प्रतिदिन 20 से अधिक झूठ बोलता रहा।जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच जंग रुकवाने का कम से कम पचास बार श्रेय ले चुका है।जो कभी शांति की वकालत करता था।जब नोबेल सम्मान नहीं मिला तो खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज़ पर आज जंगों को हवा दे रहा है।वह छोटे छोटे देशों को आपस में लड़ाता है।बेवजह ईरान पर हमले में शामिल हो जाता है। परमाणु हथियार और तकनीक पर किसी की ठेकेदारी नहीं है।समझ से परे है कि अमेरिका और सहयोगी देशों के पास परमाणु हथियारों का ज़खीरा है,लेकिन कोई नया मुल्क़ परमाणु हथियार बनाने का प्रयास करता है तो अचानक वह आक्रामक हो जाता है।यह सनक भरी चौधराहट है ,जो ट्रंप के लिए नहीं बल्कि समूचे राष्ट्र के लिए बेहद ख़तरनाक़ है।लेकिन अब ट्रंप उसी डाल को काट रहा है,जिस पर वह बैठा हुआ है।अमेरिकी शहरों में जिस तरह लाखों लोग विरोध में सड़कों पर उतरे हैं,वह राहत भरा संकेत है।
याद कीजिए। अमेरिका को विश्व की चौधराहट यूँ ही नहीं मिली थी। उसने ख़ुद को साबित किया था।लेकिन आज तो छोटे छोटे देश भी अमेरिका को आँख दिखा रहे हैं।लगभग आठ दशक पुराने नाटो के साझीदार उससे छिटक कर अलग हो रहे हैं।वे समझ रहे हैं कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। जंग तो अपने आप में समस्या है। जो समस्या हो ,वह समाधान कैसे हो सकती है ?मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ही अपनी एक रचना में यह सच बयान किया था। उन्होंने लिखा था -
जंग तो खुद ही एक मसला है,जंग क्या मसलों का हल देगी ? आग और खून आज बख्शेगी, भूख और एहतियाज कल देगी ।
लेकिन अमेरिकी अधिनायक इस कड़वे सच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं ।अपना कोष हथियारों और गोला बारूद के नाम पर ख़ाली करने वाले डोनाल्ड ट्रंप अपने देश की आर्थिक बदहाली ही देखना नहीं चाहते।उन्हें पता है कि अमेरिका पर कुल ऋण 3096 लाख करोड़ रूपए से भी अधिक है।क़र्ज़ राष्ट्र की कुल जीडीपी का 127 फ़ीसदी से भी अधिक है।इस देश को प्रतिदिन दो अरब डॉलर केवल ऋण का ब्याज चुकाने पर ख़र्च करने पड़ रहे हैं। कुछ समय पुराने आँकड़े कहते हैं कि प्रत्येक अमेरिकी नागरिक पर क़रीब एक करोड़ रूपए का ऋण है। यह विश्व में सर्वाधिक है।बताने की ज़रूरत नहीं कि सैनिक साजो सामान और गोला बारूद पर अमेरिका का व्यय सर्वाधिक है। तटस्थ समीक्षा करें तो पाते हैं कि अमेरिका ने खुद को इन युद्ध जैसी परिस्थितियों में उलझाया है। चाहे वह यूक्रेन का साथ देने पर किया गया ख़र्च हो या फिर ईरान के ख़िलाफ़।
इन दिनों अमेरिका में यह बहस भी आम है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को संविधान प्रदत्त असीमित अधिकार कहाँ तक जायज़ हैं और क्या अब समय आ गया है,जब अमेरिका संविधान की समीक्षा करे। प्रसंग के तौर पर बता दूँ कि भारतीय संविधान को रचने वाले हमारे पूर्वज इस मामले में अत्यंत संवेदनशील थे।इसीलिए देश में राष्ट्रपति शासन का प्रावधान ही नहीं है।हमारे संविधान शिल्पी समझते थे कि एक व्यक्ति को सर्वशक्तिमान बना देने से लोकतंत्र का भला नहीं होगा।जब संविधान सभा में चर्चा के दौरान मामला उठा तो कुछ सदस्यों ने एतराज़ किया कि प्रदेशों में राष्ट्रपति शासन का प्रावधान है तो केंद्र में क्यों नहीं ? इस पर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को संशय दूर करना पड़ा। उन्होंने कहा कि प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के बाद राज्यपाल निरंकुश हो जाए तो उसे राष्ट्रपति हटा सकता है।मगर,देश में राष्ट्रपति शासन लग जाए और राष्ट्रपति के पद पर बैठा राजनेता तानाशाह बन जाए तो उसके ऊपर कौन है,जो उसे हटा सकता है ? लोकतंत्र को बचाने के लिए केंद्र में राष्ट्रपति शासन नहीं होना चाहिए।क्या अमेरिकी लोकतंत्र के शिखर राजनेता इस तथ्य को समझेंगे ?




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