त्रिलोक दीप
30 मई, 2026 को हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे. भारत में प्रकाशित होने वाला पहला अख़बार
'उदन्त मार्तण्ड' (उगता हुआ सूरज या समाचार सूर्य ) कलकत्ता ( वर्तमान कोलकाता) से 30 मई, 1826 को शुरू हुआ था जिसके संपादक और प्रकाशक थे पंडित जुगल किशोर शुक्ल जो मूलतया कानपुर, उत्तरप्रदेश के वकील थे और कलकत्ता में आकर बस गए थे.कुछ लोग उनके नाम का उच्चारण 'युगल' भी करते हैं.वह स्वयं अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत, फ़ारसी और बंगला भाषाओं में पारंगत थे.यहां आकर उन्होंने देखा कि अंग्रेज़ी, बंगला और फ़ारसी में तो अखबारें छपती हैं लेकिन हिंदी में कोई नहीं. हिंदी बंगलाभाषी किसी पत्रिका में सखी भाषा के तौर पर नत्थी हुई दीखती थी. यह बात पंडित जुगल किशोर शुक्ल को नागवार गुज़री और उनके ज़ेहन में हिंदी में समाचारपत्र निकालने का विचार आया. उन्होंने एक स्थानीय मन्नू ठाकुर से इसकी चर्चा की जिसके फलस्वरूप उन्होंने 16 फ़रवरी, 1826 को समाचारपत्र प्रकाशित करने का लाइसेंस प्राप्त कर लिया. अब तलाश हुई देवनागरी में मुद्रण की.हालांकि भारत में 1674 में मुद्रण शुरू हो गया था लेकिन अख़बारों के नाम पर अंग्रेज़ी, बंगला और फ़ारसी की अखबारें ही छपती थीं और दूसरे सरकारी और गैरसरकारी क्षेत्र में मुद्रण में बहुत काम होता था. माना जाता है कि भारतीय पत्रकारिता के जनक जेम्स आगस्टस हिक्की थे जिन्होंने देश में स्वतंत्र प्रेस की परंपरा स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी. 1780 में जब उन्होंने कलकत्ता से बंगाल गजट का शुभारंभ किया, तब भारत में जनसंचार के माध्यम के रूप में समाचारपत्रों का कोई नामोनिशान नहीं था.
लेकिन शुद्ध हिंदी समाचारपत्र उस समय कोई नहीं था. लिहाज़ा प्रिंटिंग से जुड़े लोगों की मदद से उन्होंने देवनागरी लिपि का एक छापाखाना ढूंढ़ निकाला. यह सारी व्यवस्था हो जाने के बाद 30 मई,1826 को कलकत्ता से पहली बार हिंदी का एक समाचारपत्र 'उदन्त मार्तण्ड' प्रकाशित हुआ जो पूरी तरह से देवनागरी लिपि में था. तब उदन्त मार्तण्ड की हिंदी खड़ी बोली और ब्रज भाषा का मिश्रण थी. कुछ लोग इसे 'पछाँही' तो कुछ 'माध्यदेशीय भाषा' कहते थे.हर मंगलवार को प्रकाशित होने वाले इस समाचारपत्र के पहले अंक की 500 प्रतियां छपीँ. आप्रवासी हिंदी भाषियों की तब कलकत्ता में इतनी संख्या नहीं थी कि ये सभी प्रतियां बिक जातीं. अपने पहले पत्र में पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने लिखा "यह 'उदन्त मार्तण्ड,' अब पहले पहल हिन्दुस्तानियों के हित के हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाल में जो समाचार का कागज छपता है उनका सुख उन बोलियों के जानने और पढ़ने वालों को ही होता है.और सब लोग पराये सुख से ही सुखी होते हैं.".इस समाचारपत्र का उद्देश्य उस समय के सामाजिक सुधारों, स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रवाद जगाने और ब्रिटिश दमनकारी नीतियों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण आवाज़ था ही विभिन्न नगरों की गतिविधियां भी प्रकाशित होती थीं तथा उस समय की वैज्ञानिक खोजों और आधुनिक जानकारियों को भी महत्त्व दिया जाता था. अलावा इसके वहां रहने वाले हिंदी भाषियों में देश से जुड़े विभिन्न मुद्दों के प्रति चेतना विकसित करना भी था. लिहाज़ा पत्रिका को हिंदी भाषी क्षेत्रों में भेजने के बारे में सोचा गया. 'लेकिन यहां सरकारी भारी डाक शुल्क उनके आड़े आया. उन दिनों सरकारी सहायता के बिना किसी भी पत्र का चलना प्राय: असंभव था. कंपनी सरकार ने ईसाई मिशनरियों के पत्र को तो डाक आदि की सुविधा दे रखी थी परन्तु चेष्टा करने पर भी 'उदन्त मार्तण्ड' को यह सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी. इसके कुल 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए थे कि डेढ़ साल बाद 4 दिसंबर, 1827 को इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा.
आज दिवस लौं उग चुक्यो मार्तण्ड उदन्त
अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत!'
पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने अपने संपादकीय के अंत में ग्राहकों एवं पाठकों से निवेदन किया था कि 'हमारे कुछ कहे-सुने का मन में न लाइयो जो दैव और भूधर मेरी अंतरव्यथा और गुण को विचार सुधि करेंगे तो मेरे ही हैं. शुभमिति' आर्थिक स्रोत न होने की वजह से इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा. बावजूद इसके 'उदन्त मार्तण्ड' को हिंदी पत्रकारिता का पहला समाचारपत्र बनने का गौरव प्राप्त हुआ इसीलिए 30 मई को ' हिंदी पत्रकारिता दिवस ' के तौर पऱ मनाया जाता है. शुक्ल ने इस पत्र के बाद भी 'समदन्त मार्तण्ड' नामक एक और पत्र निकालने की हिम्मत जुटाई लेकिन दुर्भाग्य से वह भी अल्पायु में बंद हो गया.
उन दिनों कलकत्ता ही देश की राजधानी थी. इसलिए वहीं से सभी साहित्यिक और पत्रकारिता के क्षेत्र में पहल हुआ करती थी. वहीं से हिंदी साहित्य की शुरुआत भी मानी जाती है और साहित्य और पत्रकारिता का एक दूसरे का पूरक. क्योंकि अंग्रेज़ी मुद्रण की व्यवस्था थी लिहाज़ा
1826 में 'उदन्त मार्तण्ड' से पहले तक अंग्रेज़ी पत्रकारिता काफ़ी विकसित हो चुकी थी. फ़ारसी भाषा की पत्रकारिता भी 18वीं सदी के आखिर तक आ चुकी थी. ये पत्र हस्तलिखित होते घे. आम तौर पर उर्दू और फ़ारसी के समाचारपत्र और पत्रिकाएं हस्तलिखित ही हुआ करती थीं. कुछ हस्तलिखित हिंदी पत्रिकाएं भी मैंने देखी हैं. लाला लाजपत राय की शहादत (1865-1928) के बाद ' चांद' पत्रिका खून से लिखी गयी थी. पूरे लाल रंग की इस पत्रिका की एक प्रति मेरे पास भी थी जो शिफ्टिंग में कहीं खो गयी. अंग्रेज़ी के साथ साथ भाषाई मुद्रण भी 1816 में गंगाकिशोर भट्टाचार्य ने 'बंगाल गजट' से प्रवर्तन किया. 1818 को श्रीरामपुर के पादरियों ने प्रसिद्ध प्रचार पत्र ' समाचार दर्पण' निकाला. इन प्रारंभिक पत्रों के बाद 1823 को बंगला में 'समाचार चन्द्रिका' और 'संवाद कौमुदी' तथा गुजराती में 'मुंबई समाचार'आए.
1826 में,'उदन्त मार्तण्ड' के प्रकाशन से पहले उन्नीसवीं सदी में हिंदी कम्पोज़िंग की शुरुआत हो चुकी थी. कलकत्ता में धातु से देवनागरी लिपि में टाइप तैयार किए गए थे. पहली प्रिंटेड किताब जॉन गिलक्रिस्ट की अंग्रेजी हिंदुस्तानी शब्दकोष बताया जाता है और 1805 में लल्लू लाल की पुस्तक प्रेम सागर छपी थी. लगता है हिंदी में प्रकाशित पुस्तकों से प्रभावित होकर पंडित जुगल किशोर शर्मा ने हिंदी में साप्ताहिक पत्र निकालने का मन बनाया था. थोड़ा खोजबीन करने से यह भी जानकारी मिली कि कलकत्ता में रहने वाले उत्तर भारत के आप्रवासियों ने उन्हें एप्रोच किया था. उन दिनों वहां उत्तरप्रदेश, बिहार और राजस्थान के काफ़ी लोग रहते थे जो हिंदी में पेपर पढ़ना चाहते थे. स्थानीय खबरों के अलावा उन दिनों की खबरें स्वतंत्रता संग्राम को लेकर छपती थीं और कुछ साहित्यिक भी. स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी खबरों को लेकर उन्हें सरकार के दमन का भी शिकार होना पड़ता था.
उस समय की अंग्रेज़ी और उर्दू की पत्रकारीय दुनिया से बाहर निकलने का 'हिंदी' ने 'साहस' किया था. तब देश-विदेश में मुख्यतया अंग्रेज़ी का ही दबदबा था, बावजूद इसके उर्दू और फ़ारसी के कुछ पत्र प्रकाशित हो जाया करते थे. उस समय की पत्रकारिता भारतीय राष्ट्रवाद और जातीय चेतना के प्रति पूर्णरूप से सचेत थी. ' उदन्त मार्तण्ड' साप्ताहिक पत्र आज के साप्ताहिकों से बिल्कुल भिन्न था. खबरों के नाम पऱ स्थानीय खबरें हुआ करती थीं. कोशिश होती थी कि हिंदी के प्रचार प्रसार से लोगों को अवगत कराना. वैसे भी उन्नीसवीं सदी में राजनीतिक चेतना उत्पन्न होनी शुरू हो गयी थी. उस समय देश में राजनीतिक और बौद्धिक क्लास मौजूद थी. बेशक अख़बारों को गोरी हुकूमत के दमनकारी रवैये से चौकस और सतर्क रहना होता था.
किसी भी क्षेत्र में पहल करनी मुश्किल होती है. एक बार किसी ने हिम्मत करके पहल कर दी तो उसके ' पिछलग्गू'
खूब मिल जायेंगे. उन्नीसवीं सदी में सामाजिक और शैक्षिक चेतना के साथ साथ राजनीतिक चेतना ने भी जन्म लेना शुरू कर दिया था. यही चेतना आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में परिवर्तित हो गयी. जुगल किशोर शुक्ल की पहल के बाद ' बंगदूत,'(1829) 'प्रजामित्र' (1834), छपे. हिंदी प्रदेश के प्रारंभिक पत्रों में 'बनारस अख़बार' (1845) काफ़ी प्रभावशाली था. क्योंकि वह उर्दू भाषा शैली अपनाता था और उसके विरोध में 1850 में तारामोहन मैत्र ने काशी से साप्ताहिक 'सुधाकर' और 1855 में राजा लक्ष्मणसिंह ने आगरा से 'प्रजाहितैषी' का प्रकाशन आरंभ किया. इन दोनों पत्रों को पंडिताऊ शैली वाला पत्र कहा जाता था. अभी तक भाषा की शैली के संबंध में हिंदी पत्रकार किसी निश्चित शैली का अनुसरण नहीं कर सके थे.1833 में दिल्ली से 'उर्दू अख़बार' और मराठी के ' दिग्दर्शन' का प्रदुर्भाव हुआ.
अब दिल्ली, आगरा और काशी से भी पत्र निकलने शुरू हो गए थे. पहले ये ज़्यादातर कलकत्ता तक ही सीमित थे.
उस समय ऐसा लगता था कि हिंदी पत्रकारिता ने शुरुआती चरण पूरा कर लिया है. दूसरा चरण भारतेन्दु 'हरिश्चन्द्र'पत्रिका से प्रारंभ हुआ माना जाता है. इसका बौद्धिक जगत में स्वागत हुआ. यह दौर साप्ताहिक और मासिक पत्रों का था. दैनिक पत्र तो 1871 में आया 'समाचार सुधावर्षण' के रूप में जो द्विभाषीय था बंगला और हिंदी में. इसकी शुरुआत भी कोलकाता से हुई. हैंड कम्पोजिंग बेशक 1805 में शुरू हो गयी थी. लेकिन वह उसका शुरुआती दौर था. ' उदन्त मार्तण्ड' की प्रिंटिंग के बाद हैंड कंपोजिंग के क्षेत्र में भी सुधार हुआ. आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक, जिन्हें ब्रजभाषा और खड़ी बोली का कालजायी कवि भी कहा जाता है, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885) युग के आते आते हैंड कम्पोजिग ने अच्छा स्तर प्राप्त कर लिया था. उनकी प्रमुख रचनाओं में राष्ट्रप्रेम, भक्ति और सामाजिक चेतना का अनूठा संगम मिलता है. जैसे कि ' निज भाषा उन्नति अहै' 'प्रेम सरोवर', 'वर्षा विनोद' और 'भारत दुर्दशा'. 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को भूल. बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल'.भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा प्रकाशित प्रमुख पत्रिकाएं कविवचन सुधा (1868) पहली साहित्यिक पत्रिका थी,जो पहले मासिक शुरू हुई उसके बाद पाक्षिक और आखिर में साप्ताहिक हो गयी.हरिश्चंद्र मैगज़ीन / चन्द्रिका (1873) मासिक पत्रिका थी जो साहित्यिक और सामाजिक विषयों पर लेख छापती थी तथा बाला बोधिनी (1874) हिंदी में पहली नारी विषयक पत्रिका थी जो महिलाओं से संबंधित विषयों पर केंद्रित थी. इन पत्रिकाओं ने आधुनिक हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के विकास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इन साहित्यिक पुस्तकों और पत्रिकाओं की छपाई में भी पहले की तुलना बहुत सुधार देखा गया.
बाद में जो युग शुरू हुआ उसमें 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका ' (1896) का प्रकाशन था जिसमें गंभीर साहित्य समीक्षा का आरंभ हुई. यह हिंदी की प्राचीनतम शोध पत्रिका है जो हिंदी साहित्य और इतिहास पर शोध लेख प्रकाशित करती है.इसके संपादकों में श्यामसुंदर दास, महामहोपध्याय सुधाकर द्विवेदी, राधाकृष्ण दास,आचार्य रामचंद्र शुक्ल, चन्द्रदत्त शर्मा गुलेरी, बाबू रामचंद्र शर्मा और हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे मूर्धन्य विद्वानों ने योगदान दिया. यह एक त्रेमासिक पत्रिका थी जिसे 1907 में मासिक पत्रिका में परिवर्तित कर दिया गया. अभी तक के सभी दौरों में जितनी भी पत्रिकाएं प्रकाशित हुईं वे साहित्य, समाज सुधार, विज्ञान, इतिहास, भूगोल आदि विषयों पर थीं, राजनीति के रंग से दूर और बेखबर.
बीसवीं सदी के प्रारंभ में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी (15 मई1864-21दिसंबर, 1938) ने, जो हिंदी के महान साहित्यकार, पत्रकार, स्वाधीनता सेनानी एवं युगप्रवर्तक थे, 32 पृष्ठ की ' सरस्वती' का प्रकाशन शुरू किया.''सरस्वती' भारत में पहली हिंदी मासिक पत्रिका थी. इसकी स्थापना 1900 में इंडियन प्रेस के स्वामी चिंतामणि घोष ने की थी. महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन (1903-1920) में इसकी सफलता ने आधुनिक हिंदी गद्य और कविता, खास तौर पर खड़ी बोली में, के विकास को बढ़ावा दिया. यह 20वीं सदी के पहले दो दशकों के दौरान हिंदी साहित्य में सबसे प्रभावशाली पत्रिका बन गयी.द्विवेदी जी ने हिंदी के उभरते लेखकों को एक मंच प्रदान किया जहां प्रेमचंद और मैथिली शरण गुप्त सहित कई प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाएँ प्रकाशित हुईं. इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने न केवल अपने सामाजिक और सुधारवादी एजेंडे को लाकर हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी बल्कि हिंदी साहित्य के इन बीस वर्षो के दौरान शैली और संवेदनशीलता के निर्माण पर अपना अमिट प्रभाव भी डाला. आज इसे उनके नाम पर ' द्विवेदी युग' के रूप में जाना जाता है. 'सरस्वती ' के अन्य प्रख्यात संपादकों में पद्मलाल पुन्नालाल बख्शी (1921-1928), गणेश शंकर विद्यार्थी (1928-1933) देवीदयाल चतुर्वेदी 'मस्त' (1935-1955), लल्लीप्रसाद पांडेय (1935-1945), श्रीनारायण चतुर्वेदी 'भइया साहब' (1955-1976) आदि शामिल हैं. सरस्वती पत्रिका 1975 में बंद हो गयी थी जिसे 2020 में पुनर्जीवित किया गया.
'सरस्वती' पत्रिका पर कुछ साहित्यकारों की महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं हैं : आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सरस्वती पत्रिका को 'प्रारंभिककाल का विश्वकोश' कहा जबकि रामविलास शर्मा ने सरस्वती को ' हिंदी की जातीय पत्रिका और आदर्श पत्रिका' कहा. मैथिली शरण गुप्त के शब्दों में
' उस समय सरस्वती ही एक ऐसी पत्रिका थी जिसे भारत के सभी प्रांतों में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई.' सुमित्रानंदन पंत के अनुसार ' सरस्वती नि:संदेह तब की हिंदी की सर्वश्रेष्ठ और उच्चकोटि की मासिक पत्रिका है.' डॉ बच्चन सिंह का कहना था कि ' सरस्वती के माध्यम से द्विवेदी जी ने हिंदी साहित्य के गद्य और पद्य की विभाजक रेखा को मिटा दिया.'
इस युग में पत्रकारिता की भाषा में विविधता और बहुरूपता मिलती है.महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और पत्रकार बाल गंगाधर तिलक ( लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध) की मराठी पत्रिका ' केसरी' का हिंदी संस्करण भी था. वह मराठी में खुलकर और बेबाकी से अपने विचार व्यक्त किया करते थे. उनका नारा था 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा.' केसरी के साथ वह अपने अंग्रेजी पत्र 'मराठा' में भी लिखा करते थे. उनके ये दोनों दैनिक समाचारपत्र जनता में बहुत लोकप्रिय थे. उनके माध्यम से उन्होंने लोगों में देशभक्ति की भावना जगाई.तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीनभावना की बहुत आलोचना की. 'देश का दुर्भाग्य' नामक शीर्षक से लिखे एक लेख में उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध किया जिसके चलते उनपर देशद्रोह के अभियोग में उन्हें गिरफ्तार कर छह वर्ष की कठोर कारावास के अंतर्गत मांडले (बर्मा) में बंद कर दिया गया. लेकिन उनकी लेखनी अनवरत चलती रही और 'गीता रहस्य'एक ग्रंथ की रचना की.बाल गंगाधर तिलक पहले नेता थे जिन्होंने पूरे भारत के लिए समान लिपि के रूप में देवनागरी की वकालत की और कहा था कि समान लिपि की समस्या ऐतिहासिक आधार पर नहीं सुलझायी जा सकती. उन्होंने तर्कपूर्ण ढंग से दलील दी थी कि रोमन लिपि भारतीय भाषाओं के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है. देवनागरी को समस्त भारतीय भाषाओं के लिए स्वीकार किया जाना चाहिए.
दिलचस्प बात यह है कि मराठी 'केसरी' का हिंदी अनुवाद माधवराव सप्रे किया करते थे. तब यह ' हिंदी केसरी' के नाम से छपा करती थी. सन 1900 में माधवराव सप्रे ने पेंड्रा से हिंदी में अलग से अपनी एक पत्रिका निकाली थी 'छत्तीसगढ़ मित्र'. मैं रायपुर के माधवराव सप्रे स्कूल में पढ़ा हूं (1949-1954) इसलिए जिज्ञासावश माधवराव सप्रे के बारे में अपने हिंदी के अध्यापक पंडित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी से जाना. उन्हीं से यह जानकारी भी मिली कि जिस प्रकार पंडित जुगल किशोर शुक्ल की हिंदी की पहली पत्रिका ' उदन्त मार्तण्ड' थी सप्रे जी की 'एक टोकरी भर मिट्टी' हिंदी की पहली कहानी थी.इस प्रकार वह एक ऐसा दौर था जहां अंग्रेज़ी और उर्दू का वर्चस्व था और हिंदी का तीसरा स्थान था. हिंदी पत्रकारिता अनेक दिशाओं में विकसित तो हुई लेकिन उस समय के पत्र सामाजिक, साहित्यिक,शिक्षा प्रसार, धर्म प्रचार तक ही सीमित थे. हिंदी में गद्य शैली का भी विकास हुआ लेकिन उन्नीसवीं सदी में राजनीति के क्षेत्र में नेतृत्व करने वाली कोई पत्रिका नहीं थी. 1920 तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की 'सरस्वती' और रूप नारायण पांडेय की 'इंदु' का खासा प्रभाव था.
राजनीतिक क्षेत्र में हिंदी पत्रकारिता उन्नीसवीं सदी में शुरू हुई. प्रारंभ में ' प्रताप' (1913), ' कर्मयोगी' और 'हिंदी केसरी' (1904-1908) में राजनीतिक पत्रकारिता कुछ कदम आगे बढ़ी लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) के समय कई दैनिक पत्रों ने जन्म लिया. कलकत्ता से जहां 'विश्वमित्र'और 'स्वतंत्र' पेपर निकले वहां काशी से 'आज' और कानपुर से 'वर्तमान' प्रकाशित हुए. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान कलकत्ता से ' स्वतंत्र' और विश्वमित्र छपे जिससे राजनीतिक क्षेत्र में हिंदी पत्रकारिता का अपना नया जीवन आरंभ हो गया. गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन मध्य वर्ग तक सीमित न रहकर ग्रामीणों और श्रमिकों तक पहुंच गया और इसके प्रसार में हिंदी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा. 'आज' (1921)और उसके संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर ने हिंदी पत्रकारिता के विकास में बहुत योगदान दिया. गांधी जी ने भी पराड़कर की निर्भीकता के साथ साथ राष्ट्रीवाद के प्रचार प्रसार की बहुत तारीफ की थी. पत्रकारिता में उनका स्थान वैसा ही माना जाता है जैसे साहित्य में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का.
एक और निडर पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे
गणेश शंकर विद्यार्थी ( अक्टूबर, 1890- मार्च, 1931).
उन्होंने 'स्वराज्य' अख़बार के जरिये उर्दू में लिखना शुरू किया और अंग्रेज़ी के लेखक एवं पत्रकार पंडित सुन्दरलाल के सान्निध्य में वह हिंदी की ओर आकृष्ट हुए. विद्यार्थी जी ने उन्हें हिंदी साप्ताहिक ' कर्मयोगी' के संपादन में सहयोग दिया. उसके बाद वह महवीरप्रसाद द्विवेदी की पत्रिका 'सरस्वती' में सहायक संपादक रहे.
लेकिन नवंबर, 1913 को कानपुर से अपना हिंदी साप्ताहिक 'प्रताप' निकाला.(इस प्रताप का 1919 में लाहौर से प्रकाशित महाशय कृष्ण के 'प्रताप' से कोई संबंध नहीं. विभाजन के बाद उनके बेटे वीरेंद्र ने दिल्ली से यह पत्र निकाला था. 2017 में यह बंद हो गया) सात वर्ष बाद 1920 में 'प्रताप' दैनिक कर दिया गया और जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई. 'प्रताप' के माध्यम से न जाने कितने क्रन्तिकारी स्वाधीनता आंदोलन से रूबरू हुए, समय समय पर 'प्रताप' क्रांतिकारियों की सुरक्षा की ढाल भी बना. पहले ही अंक में अपने संपादकीय में गणेश शंकर विद्यार्थी ने साफ कर दिया था कि 'यह पत्र राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक-आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत के लिए संघर्ष करेगा.'प्रताप' ने किसानों,मिल मज़दूरों और दबे-कुचले लोगों के दुखों को उजागर किया. 'प्रताप' में लिखे अग्रलेखों में विद्यार्थी जी ने अपने विचारों को खुल कर व्यक्त किया जिसके चलते उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. विद्यार्थी जी 'प्रताप' की भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे. इसप्रकार उन्होंने सरल, सहज, मुहावरेदार और लचीलपन लिए हुए एक नयी प्रकार की शैली का प्रवर्तन किया. उन्होंने राजनीतिक मुद्दों के साथ साथ समाज को उसके कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों के प्रति भी जागृत किया.विद्यार्थी जी को 'प्रताप' में माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे सहयोगी मिल गए जिनकी वजह से 'प्रताप' की यात्रा निर्वाध रही.
उस समय 'प्रताप' क्रान्तिकरियों की आवाज़ थी. तब कलकत्ता और पंजाब के बाद कानपुर ही क्रांतिकारियों का मृगवन था. भगत सिंह ही नहीं राम दुलारे त्रिपाठी ने भी 'प्रताप' में काम किया था. उन्हें काकोरी कांड में सज़ा हुई थी. गणेश शंकर विद्यार्थी ने ही 'प्रताप'कार्यालय में क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह की भेंट कराई थी. विद्यार्थी जी के प्रयत्न से ही क्रन्तिकारी अशफ़ाक़ उल्लाह खान की कब्र बन सकी. उन्हें 1927 में फैज़ाबाद में फांसी दी गयी थी. एक और बड़े क्रन्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा भी प्रताप में ही छपी थी. क्रन्तिकारी तेवरों के कारण 'प्रताप' को अंग्रेज़ी हुकूमत का गुस्सा कई बार झेलना पड़ा. एक बार तो नानक सिंह की 'सौदा-ए-वतन'नमक कविता के छपने पर अंग्रेज़ सरकार इतनी नाराज़ हो गयी कि उसने गणेश शंकर विद्यार्थी पर राजद्रोह का आरोप लगाते हुए पहली बार 'प्रताप'पर पाबंदी लगा दी. इस दमन से विद्यार्थी जी झुके नहीं बल्कि और मज़बूत हुए. सरकार की दमनपूर्ण नीति का देशवासियों ने जमकर विरोध किया और विद्यार्थी जी को आर्थिक सहयोग और सहायता देकर अपनी मुहिम को जारी रखने के लिए कहा.
विद्यार्थी जी की प्रेरणा से श्याम लाल गुप्त ने ' विश्व विजयी तिरंगा प्यारा' झंडा गीत लिखा और यहीं माखनलाल चतुर्वेदी ने अपना कालजयी गीत ' पुष्प की अभिलाषा' लिखा और दोनों गीत सबसे पहले 'प्रताप' में प्रकाशित हुए. विद्यार्थी जी के प्रयत्न से ही झंडा गीत कानपुर में कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया. इतना ही नहीं एक समय बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहनलाल द्विवेदी, गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' , प्रताप नारायण मिश्र जैसे तमाम देशभक्त, लेखक, कवि 'प्रताप' से ही जुड़े थे.
विद्यार्थी जी ने भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों के लेख गुप्त नामों से प्रकाशित किये.गणेश शंकर विद्यार्थी कांग्रेस में शामिल हो गए तथा कानपुर के मज़दूर वर्ग के नेता बन गए. उन्होंने कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचार के विरुद्ध निर्भीक होकर 'प्रताप' में लिखा जिसके चलते वह पांच बार जेल भी गए
विद्यार्थी जी बड़े ही सुधारवादी किंतु साथ ही धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे. वक्ता भी वह गजब थे, बहुत प्रभावशाली और उच्चकोटि के. 25 मार्च, 1931 को कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में इनकी हत्या कर दी गयी. क्या संयोग है कि 23 मार्च, 1931 को सरदार भगत सिंह को फांसी दी गयी थी और उसके दो दिन बाद गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या हो गयी.क्या दोनों घटनाओं का एक दूसरे से संबंध है. साम्य जो थीं ये दोनों घटनाएं. एक को फांसी और दूसरे को सांप्रादयिक दंगे में मरवाना. अंग्रेज़ों की गणेश शंकर विद्यार्थी से खुन्नस जो थी जो उन्होंने इन घटनाओं से निकाली हो. शक इसलिए भी व्यक्त किया जाता है कि विद्यार्थी जी ' क्रांतिकारी तेवर' के व्यक्ति थे और भगत सिंह ने उनके पत्र ' प्रताप' में करीब एक बरस तक काम कर अपनी क्रन्तिकारी गतिविधियों का विस्तार किया था. शहीदे आज़म भगत सिंह की जीवनी लिखने वाले प्रो.मलविंदरजीत सिंह वडैच (अब दिवंगत) ने मुझे एक बार बताया था कि भगत सिंह को फांसी देने के बाद गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या अंग्रेज़ों की सोचीसमझी साज़िश है. तब वह भगत सिंह पर एक किताब लिखने के लिए रिसर्च कर रहे थे. उन्हें अपनी खोजबीन के दौरान कुछ ऐसे प्रसंग देखने को मिले थे.इसे लेकर उस समय भी कानपुर में स्वाधीनता संग्रामियों ने विरोध किया था जिसे अंग्रेज़ों ने दबा दिया. यह बात मुझे उन्होंने तब बताई थी जब करीब दस बरस पहले मैं उन्हें चंडीगढ़ के पास उनके घर मिला था. इससे पहले दिल्ली आने पर भी उनसे भेंट होती रहती थी. मैं और उनके अनुसंधान के कामों में उनका हाथ भी बंटाया करता था.
कानपुर से प्रकाशित 'प्रताप' में सुप्रसिद्ध क्रन्तिकारी सरदार भगत सिंह ने अपने अज्ञातवास में 1923-25 में गणेश शंकर विद्यार्थी के सान्निध्य सहायक संपादक के रूप में काम किया जब वह घर से भागकर कानपुर आए थे.वह लाहौर नेशनल कॉलेज में पढ़ते थे. उनके बारे में माना जाता है कि वह बहुत ही अनुशासित, अध्ययनशील और विचारशील छात्र थे. उनके प्रिंसिपल छबीलदास का मानना था कि भगत सिंह जहां एक बहुत ही जोशीला इंकालबी था वहां एक बहुत ही मेधावी विद्यार्थी भी था. इतिहास की उसने ढेरों किताबें पढ़ी थीं लेकिन उसे सबसे ज़्यादा कारलाईल की 'क्राई फॉर जस्टिस' यानी न्याय की पुकार बहुत पसंद थी. 'प्रताप' में गणेश शंकर विद्यार्थी उनकी प्रतिभा के कायल थे. लिहाज़ा भगत सिंह बलवंत सिंह ( या बलवंत) के छद्म नाम से लिखा करते थे ताकि वह अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां








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