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Added on : 2026-05-30 14:25:38

राजेश बादल 

हम भारतीय अक्सर अपनी श्रुति या वाचिक परंपरा पर गर्व करते हैं।कल भी करते थे । शायद आगे भी करते रहेंगे । लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि जब पूर्वजों को अपनी इस भूल का अहसास हुआ तो उन्होंने वाचिक परंपरा त्याग कर हमारे पौराणिक ग्रंथों को लिपिबद्ध करना शुरू किया। इसीलिए चार वेद समेत अनेक बेहद पुराने ग्रन्थ आज भी हमारे सामने हैं।इसके बावजूद अनगिनत अनमोल दस्तावेज हमारी वाचिक परंपरा की बलि चढ़ गए। हज़ार डेढ़ हज़ार साल पहले जो बेजोड़ पुस्तकें लिखी गईं ,वे हमने अपनी लापरवाही या उदासीनता से विलुप्त हो जानें दीं। मसलन कोई नहीं जानता कि राजा भोज का विमान ग्रन्थ कहाँ है और समूचा जल मंगल ग्रन्थ किसके पास है ? विमान ग्रन्थ में आधुनिकतम विमान बनाने की तकनीक थी और जल मंगल में पानी से प्रत्येक बीमारी का इलाज बताया गया है।जलमंगल के कुछ अध्याय तो कहीं कहीं उपलब्ध हैं ,लेकिन समूचा ग्रन्थ अनुपलब्ध है। यह आने वाली नस्लों के लिए हमारे पुरखों का एक ऐसा भयानक काम है,जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता। 

हमारे अधिकांश पूर्वज एक और अक्षम्य कृत्य कर गए। सामंती शासन प्रणाली के कारण उन्होंने चारण परंपरा का निर्वाह करते हुए ऐसे ऐसे हैरतअंगेज़ ग्रन्थ लिखे,जो अतिरंजना और अतिशयोक्ति की सारी सीमाएँ तोड़ते थे।जैसे आल्हा-ऊदल की वीरता का बखान करने वाली किताबों में लिखा है कि ऊदल में सैकड़ों हाथियों का बल था।दोनों भाइयों के पास उड़ने वाली घोड़ी थी वगैरह वगैरह।पृथ्वीराज रासो में भी कुछ ऐसा ही है। बढ़ा चढ़ा कर अपने स्वामी की चाटुकारिता बखान करने का दुष्परिणाम यह हुआ कि आज गाँव गाँव में इन अतिरंजित गाथाओं पर लोग आँख मूंदकर भरोसा करते हैं और अतीत के ऐतिहासिक चरित्रों के गीत गा रहे हैं।हमारी रगों में चारण परंपरा आज भी दौड़ रही है। सदियों तक ग़ुलामी का एक बड़ा कारण यह भी है। मैं अपने ऐतिहासिक चरित्रों की बहादुरी को कमतर नहीं आँकना चाहता ,लेकिन अशुद्ध और बढ़ा चढ़ाकर विरुदावलि गाने के सख़्त ख़िलाफ़ हूँ। इस प्रवृति का नुक़सान यह हुआ है कि इस कालखंड में प्रामाणिक लेखन अथवा इतिहास का दस्तावेज़ीकरण हाशिए पर चला गया और विकृत इतिहास लेखन से पन्ने के पन्ने भरे हुए हैं ।पुरखों के लिखे इन ग्रंथों पर हम आज आँख मूँदकर भरोसा करते हैं।पर ,उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसीलिए आज भी लेखन के नाम पर किए गए अपराध के दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं। 

*एक सौ अड़सठ साल* 

 

इन इतिहासकारों ने अपने लेखन के साथ न्याय नहीं किया। यह अलग चर्चा का विषय हो सकता है। फ़िलहाल मेरा आशय केवल प्रामाणिक लेखन और दस्तावेज़ीकरण से है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए ।मौटे तौर पर इतिहासकारों के बाद पत्रकारों की यह ज़िम्मेदारी बनती थी कि वे उन समसामयिक विषयों पर तथ्यात्मक लेखन करें,जिनके वे प्रत्यक्षदर्शी हैं।उनसे आशा की जाती थी कि पत्रकारिता के नज़रिए से उन दिनों की अतीत गाथा पन्नों पर उतारें,जो आने वाली पीढ़ियों के लिए उपयोगी हो सके। गुज़िश्ता अठहत्तर साल में ऐसा कोई ठोस प्रयास हमें नहीं दिखाई देता। हालाँकि कुछेक अपवाद भी हैं।अलबत्ता एक नायाब नमूना हमें इस बरस ज़रूर देखने को मिला है।यह अँधेरे बंद कमरे में रौशनदान जैसा है। अत्यंत गंभीर और वरिष्ठतम संपादक विजय दत्त श्रीधर ने 168 साल की पत्रकारिता को गागर में भरकर अनगिनत नस्लों पर उपकार का क़र्ज़ लाद दिया है। इस चुनौती भरे काम में उनकी उमर के तीन दशक से भी अधिक लग गए।श्रीधरजी का पहला शाहकार माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय के रूप में हमारे सामने है।यह संभवतः विश्व का अकेला संस्थान है ,जहाँ सदियों का अतीत करोड़ों पन्नों में सुरक्षित है।इसके बाद तीन खण्डों में समग्र भारतीय पत्रकारिता की रचना करके श्रीधरजी ने हमें नायाब धरोहर सौंपी है।पहले भाग का आग़ाज़ 1780 से होता है और एक सदी यानी 1880 तक चलता है।दूसरा हिस्सा 1881 से 1920 तक की पत्रकारिता समेटे हुए है। श्रीधर जी ने इसे तिलक युग का नाम दिया है।तीसरे खंड का सफ़र 1921 से शुरू होकर 1948 पर आकर रुकता है।यह संसार के सबसे बड़े पत्रकार गांधी जी के नाम से समर्पित है।क्या हमारी मौजूदा नस्लें महात्मा गांधी और तिलक महाराज की पत्रकारिता से वाक़िफ़ हैं ? बड़े बड़े पत्रकारिता विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी इन महापुरुषों की पत्रकारिता शुमार नहीं है।क्या लोग जानते हैं कि 1857 के नाकाम ग़दर के बाद पहले संपादक मौलाना बाक़र अली और दूसरे क्रांतिकारी पत्रकार बेदार बख़्त को अँगरेज़ों ने निर्भीक लेखन और अभिव्यक्ति के लिए सूली पर चढ़ा दिया था। कितने विद्वान इन तथ्यों से वाक़िफ़ हैं ? शायद एक फ़ीसदी भी नहीं । ऐसे उनचास अध्यायों में शामिल अदभुत जानकारियों से यह ग्रन्थ अटा पड़ा है।

इस बेमिसाल शोध पर सिलसिलेवार बात करना बेहतर होगा। पहले भाग से शुरुआत करते हैं।अपने निवेदन में श्रीधरजी विनम्रता से मानते हैं कि वे ऐसा कोई दावा नहीं कर रहे हैं कि सब कुछ इस ग्रन्थ में संजो लिया गया है। वे कहते हैं कि नए तथ्यों की खोज,उनमें संशोधन और उन्हें तराशने की प्रक्रिया निरंतर जारी रहने वाली है।यह हमें आश्वस्त करती है कि 168 साल की यात्रा कथा का यह विराम नहीं है। वे लिखते हैं," यह भारत का सबसे उथल-पुथल भरा कालखंड है।उन दिनों यह महादेश एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहा था। सम्पूर्ण आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था.....इस महासंग्राम में कलम के सिपाहियों ने कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी की। संपादकों और समाचारपत्र-पत्रिकाओं ने इसके लिए भारी क़ीमत चुकाई।उन पर छापे पड़े ,जुर्माने भरे,जेल गए,गोली खाई और फाँसी चढ़ गए।जोश और जूनून की इस बलिपंथी पत्रकारिता को मिशन कहा गया "। 

समग्र भारतीय पत्रकारिता के पहले भाग में पंद्रह अध्याय हैं। इनमें मुल्क़ में पत्रकारिता की शुरुआत से लेकर भाषायी रूपों में इसके विकास का विवरण है।संभवतः यही इस शोधपरक दस्तावेज़ को सबसे अलग और विशिष्ट बनाती है।अभी तक हिंदी के साथ साथ सभी भारतीय भाषाओँ की पत्रकारिता और स्वाधीनता आंदोलन में उनके योगदान को सामने लाने वाला कोई अन्य दस्तावेज़ मेरी नज़र से नहीं गुजरा।लेकिन इस शोध में आप तमिल,बांग्ला,उड़िया,कन्नड़,तेलुगु,उर्दू,गुजराती,मराठी,मलयालम,असमियाँ और हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं का समावेश देखेंगे।उनसे पता चलता है कि कमोबेश पूरे हिन्दुस्तान में बरतानवी हुक़ूमत के विरुद्ध आक्रोश पनपना शुरू हो गया था। गोरों की तानाशाही से मोर्चा लेती हुई पत्रकारिता का लोकतान्त्रिक स्वरूप भी इन्ही दिनों उभरकर आया था,जो आज विलुप्त है। यह संपादक के नाम पत्र स्तंभ के बारे में है।श्रीधरजी लिखते हैं,

" संपादक के नाम पत्र स्तंभ का जनक हिकी का बंगाल गज़ट था। इससे ज्ञात होता है कि यह पत्र जनता की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का पक्षधर था। जन भावनाओं को उजागर करके समस्याओं और सोच को प्रमुखता से उठाता था। इसके पच्चीस मार्च 1780 के अंक में फिलन थ्रोप्स का संपादक के नाम पत्र छपा था। इस पत्र में कोलकाता के श्मशान घाट पर गंदगी की शिकायत थी "। 

आज के हिंदुस्तान में यह स्तंभ अख़बारों के पन्नों से नदारद है।लेकिन ,प्रसंग के तौर पर बता दूँ कि भारत के महान संपादक राजेंद्र माथुर ने पहले नई दुनिया और फिर नवभारत टाइम्स का प्रधान संपादक रहते हुए संपादक के नाम पत्र को एक आंदोलन बना दिया था। वे प्रतिदिन सैकड़ों पत्र ख़ुद पढ़ते थे। उनके नई दुनिया कार्यकाल में तो गाँव गाँव में पत्र लेखक मंच बन गए थे। इन मंचों ने लोगों की सोच को मुखरित किया था और उनकी भाषा को संस्कार दिए थे । पढ़कर आश्चर्य होता है कि 1822 में उर्दू साप्ताहिक जाम-ए-जहाँनुमा से गोरी हुकूमत घबरा उठी थी। कोलकाता के मुख्य सचिव विलियम ब्रूथ बैले ने एक फाइल में लिखा कि यह समाचार पत्र भविष्य में अँगरेज़ सत्ता के ख़िलाफ़ आग लगाने वालों का नेतृत्व कर सकता है। यह भी आज के पत्रकारों को शायद नहीं पता होगा कि मुंबई समाचार एक ऐसा अख़बार है,जो बीते दो सौ चार साल से नियमित प्रकाशित हो रहा है। यह भी एक दिलचस्प तथ्य होगा कि इस बरस 30 मई को उदन्त मार्तण्ड को 200 साल हो जाएँगे।इस कड़ी में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के जन्म की दास्तान यक़ीनन दिलचस्प है। यह तो लोगों की जानकारी में है कि इस समाचारपत्र की शुरुआत 1861 में गोरी सत्ता के दरम्यान हुई थी। लेकिन कितने लोग यह जानते होंगे कि एक अँगरेज़ रॉबर्ट नाईट ने बॉम्बे टाइम्स ,बॉम्बे स्टेंडर्ड और बॉम्बे टेलीग्राफ समाचारपत्रों का विलय करके टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रारंभ किया था। 

यह खंड एक तथ्य और उद्घाटित करता है।ब्रिटिश राज की तमाम साज़िशों के बावजूद हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच कोई कड़वाहट नहीं थी। मदरसों की ओर से संचालित समाचारपत्रों के संपादक हिन्दू होते थे और हिंदूवादी संस्थाओं में मुस्लिम संपादक काम करते थे।यहाँ तक कि कई गोरों ने जो अख़बार निकाले,उनमें भी मुस्लिम और हिन्दू संपादक होते थे।सांप्रदायिक सद्भाव का ऐसा उदाहरण आज नहीं दिखाई देता। जब साक्षरता का प्रतिशत पाँच या छह फ़ीसदी था तो हमारे दिल और दिमाग़ बड़े और उदार थे। मगर,आज अस्सी प्रतिशत साक्षर होने के बाद भी हमारे मष्तिष्क संकुचित और संकीर्ण हो गए हैं।पाठकों को भरोसा नहीं होगा लेकिन मुझे याद है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का यह नाम मदरसे के मौलवी ने दिया था। इस नामकरण के नेंग स्वरूप वस्त्र और सोने-चांदी के सिक्के बैलगाड़ी में भरकर उनके पिता सेठ रामचरण कनकने मौलवी जी के पास ले गए तो दिन भर बहस के बाद भी मौलवी जी ने एक पैसा नहीं लिया था । राष्ट्रकवि का मूल नाम उनके जन्म के समय एक पंडित जी ने रखा था ,जिसमें लगभग पचास अक्षर थे। ऐसे नाम को कौन स्वीकार करता ? 

*बालगंगाधर तिलक की पत्रकारिता* 

 

बहरहाल ! आगे बढ़ते हैं। तिलक युग की पत्रकारिता याने इस वृहत शोध के दूसरे खंड की बात करते हैं। उन्नीस अध्यायों वाला यह खंड मेरी नज़र में सबसे खास है।इसमें अगले 39 साल की सशक्त होती अख़बारनवीसी का ब्यौरा है।आज़ादी के लिए संघर्ष जवान हो रहा था और सामाजिक चेतना करवट ले रही थी।इसी कालखंड में बाल गंगाधर तिलक यानी तिलक महाराज प्रकट होते हैं। वे नारा देते हैं - स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। देखते ही देखते यह नारा समूचे मुल्क़ की अवाम की आवाज़ बन जाता है। आज़ादी की चाह अंगड़ाई लेती है और महात्मा गांधी इस देश में आत्मा की तरह साँसों में धड़कने लगते हैं। मगर,तिलक महाराज का ज़िक्र एक बार फिर करते हैं।एक जनवरी 1881 को वे अँगरेज़ी साप्ताहिक मराठा और तीन दिन बाद चार जनवरी को मराठी साप्ताहिक केसरी का शुभारंभ करते हैं। केसरी के तेवर सख़्त थे और वह विचारों का शोला था। हिंदी भाषी क्षेत्र में स्वराज का नारा बुलंद करने के लिए माधवराव सप्रे हिंदी में केसरी का प्रकाशन करते हैं। तिलकजी से घबराकर बरतानवी सत्ता ने उन्हें मांडले (आज के म्यांमार में) जेल में डाल दिया।लेकिन तब तक वे अपना काम कर चुके थे। कानपुर से गणेशशंकर विद्यार्थी का प्रताप,बनारस से विष्णु पराड़कर का आज और जबलपुर से माखनलाल चतुर्वेदी का कर्मवीर और काला कांकर से महामना मदनमोहन मालवीय के संपादन में हिंदोस्थान क्रांतिदूत बन गए।तेलुगु में सुब्रमण्यम अइयर ने स्वदेशमित्रन और मलयालम में कंदतिल वर्गीज़ मापिल्लै ने मलयाला मनोरमा का आग़ाज़ किया। यह सिलसिला पूरे राष्ट्र में फैल गया। मौलाना आज़ाद एक शानदार पत्रकार थे। उन्होंने 1912 में उर्दू में आज़ादी की अलख जगाने वाले पत्र अल हिलाल का प्रकाशन किया। नतीज़तन उन्हें बंगाल से निकाल दिया गया। मगर आप उर्दू के एक और साप्ताहिक स्वराज का प्रकाशन है। यह शांति स्वरूप भटनागर ने निकाला था। ढाई साल तक यह अख़बार निकला। इसके आठ संपादक हुए। इनमें छह को 94 बरस की क़ैद हुई और दो को आजन्म कालापानी दिया गया।इस भाग में एक पूरा अध्याय इस संपादक गाथा पर केंद्रित है। क्या हमारी नई पीढ़ियों को अपने पुरखों के इन बलिदानों की ख़बर है ?

इसी खंड में द्विवेद्वी युग के सूत्रधार महावीर प्रसाद द्विवेद्वी का भी हवाला दिया गया है। महावीर प्रसाद द्विवेद्वी ने सरस्वती के ज़रिए भाषा और व्याकरण के नए संस्कार डाले।मैं याद कर सकता हूँ कि द्विवेद्वी जी ने ही हमें मैथिलीशरण गुप्त से परिचित कराया था । उनका छद्म नाम रसिकेन्द्र बंद कराकर असली नाम से छापना शुरू किया। इतना ही नहीं,मैथिलीशरण गुप्त ने खड़ी हिंदी में लिखना सरस्वती से ही शुरू किया था क्योंकि द्विवेद्वी जी ने बृज बोली से प्रभावित गुप्त जी के लेखन को प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था।आज हमारे समाचारपत्रों में कार्टून विधा का लोप सा होता जा रहा है लेकिन क़रीब डेढ़ सौ साल पहले के ग़ुलाम हिन्दुस्तान में कार्टून के ज़रिए अभिव्यक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण थी।जब 1883 में वृन्दावन से राधाचरण गोस्वामी ने भारतेन्दु का प्रकाशन प्रारंभ किया ,तो उसमें पूरे एक पन्ने का कार्टून छपता था।यह कार्टून चुटीले कटाक्षों के लिए विख्यात था। मैं याद कर सकता हूँ कि आज़ादी के बाद भी कार्टून विधा की लोकप्रियता चरम पर थी। हम लोगों ने आर के लक्ष्मण और उनके आम आदमी के माध्यम से ऐसे ऐसे व्यंग्य बाण निकलते देखे ,जो आज विलुप्त हो चुके हैं। प्रसंगवश बता दूँ कि आर के लक्ष्मण का आख़िरी साक्षात्कार मैंने लिया था। उनका केबिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक के कक्ष से कम से कम दोगुना था। उनकी ज़िंदगी का एक उदाहरण मैं कभी नहीं भूल सकता। जब लक्ष्मण जवान थे और बतौर कार्टूनिस्ट अपनी पेशेवर पारी शुरू करना चाहते थे तो उनका सपना था कि वे उस दौर के महान कार्टूनिस्ट डेविड लाओ जैसे बनें। वे मेहनत करते गए। जब वे सारे संसार के कार्टूनिस्टों के आराध्य बन गए तो एक दिलचस्प घटना हुई। दरअसल वे अपने कार्टून बनाने के समय में कोई दख़ल पसंद नहीं करते थे और न ही किसी से मिलते थे। उनकी निजी सचिव को यह स्पष्ट निर्देश थे। एक दिन जब वे कार्यालय पहुँचे तो उनकी सचिव ने बताया कि कोई अतिथि मिलने के लिए उनके कक्ष में बैठा है। लक्ष्मण का पारा सातवें आसमान पर था। उन्होंने सचिव को डाँट लगाईं कि उसने ऐसा क्यों किया तो सचिव ने उत्तर दिया ," सर ! वह एक अँगरेज़ है और लन्दन से सिर्फ़ आपसे मिलने के लिए आया है। लक्ष्मण हैरान परेशान से अंदर दाख़िल हुए। भीतर एक अँगरेज़ बैठा था। लक्ष्मण को देखते ही सम्मान से उठ खड़ा हुआ और बोला ," सर ! आय एम डेविड लाओ। कार्टूनिस्ट फ्रॉम लंदन एंड ग्रेट फैन ऑफ़ योर कार्टून्स "।लक्ष्मण को काटो तो ख़ून नहीं। उनके द्रोणाचार्य सामने और वे एकलव्य की तरह थे।क्या ऐसा किसी की ज़िंदगी में होता है ? यह लक्ष्मण की लोकप्रियता है कि लक्ष्मण के रचे गए काल्पनिक ' कॉमन मेन ' की मूर्तियाँ पुणे और मुंबई के चौराहों पर लगी हैं। यह लोकतंत्र में आम आदमी की ही आवाज़ है। आज संपादक के नाम पत्र की तरह कार्टून भी हमारे पन्नों से अनुपस्थित होते जा रहे हैं। श्रीधरजी के इस दूसरे भाग में विशेषीकृत पत्रकारिता के भी अनेक उदाहरण मिलते हैं।मसलन कृषि,विज्ञान ,रंगीन चित्र और पुस्तक समीक्षा जैसे क्षेत्र भी उस काल की पत्रकारिता से अछूते नहीं थे। तिलक युग का यह दूसरा भाग जहाँ अपना उपसंहार करता है,वहाँ से भारत में गांधी युग की शुरुआत होती है ।

*महात्मा गांधी की पत्रकारिता*  

 

दक्षिण अफ्रीका में पत्रकारिता करते करते गांधी जी 1915 में स्वदेश लौटे और हिन्दुस्तान की आज़ादी के केंद्र बिंदु बन गए। इसीलिए तीसरा हिस्सा यानी गांधी युग की पत्रकारिता मेरी दृष्टि में इस समग्र पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण भाग है।केवल 27 बरस की पत्रकारिता ने भारत से गोरों की विदाई देखी। पंद्रह अध्यायों में सिमटी भारतीय पत्रकारिता का यह सबसे जीवंत और धड़कता हुआ दस्तावेज़ है।गांधी इस कालखंड के प्राण हैं। श्रीधरजी इस खंड की प्रस्तावना में लिखते हैं ,

" यह तथ्य रेखांकित किया जाना चाहिए कि लोकमान्य तिलक के बाद महात्मा गांधी ने भारतीय पत्रकारिता को सर्वाधिक प्रभावित किया। सन 1921 से 1948 तक के कालखंड को पत्रकारिता का गांधी युग कहा जाएगा...गांधी युग में भारत की सभी भाषाओं और प्रांतों में पत्र-पत्रिकाएँ निकाले जा रहे थे। धारवाड़ - कर्नाटक से 1921 में कन्नड़ साप्ताहिक कर्मवीर का प्रकाशन तिलक की विचारधारा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हुआ।यह नए युग की माँग के अनुरूप महात्मा गांधी की राह का राही बन गया "।

गांधी की पत्रकारिता इस मायने में बेमिसाल कही जा सकती है क्योंकि 1921 से 1935 के बीच पत्रकारिता करना जान की बाज़ी लगाना था। गोरी सत्ता ने ख़ौफ़ और दहशत का ऐसा माहौल बना दिया था,जिसमें आम आदमी आज़ादी का सपना देखने में भी डरता था। कुछ उदाहरण देता हूँ।अँगरेज़ों ने कलकत्ता से दिल्ली राजधानी स्थानांतरित की थी। उसे ख़ुशी का मौका मानते हुए दिल्ली में 23 दिसम्बर 1912 को वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग की शाही सवारी निकल रही थी। वाइसराय एक हाथी पर सवार थे। उस पर आज़ादी के मतवालों ने बम फेंका। इसमें महावत की मृत्यु हो गई और वाइसराय घायल हो गए। उन्हें तीन महीने बिस्तर पर रहना पड़ा। इसके बाद तो गोरे जल्लाद बन गए। उन्होंने मुल्क़ में ऐसा क़त्लेआम मचाया कि लोग कराह उठे। बात-बात में क्रांतिकारियों को फाँसी दी जाने लगी। वाइसराय पर बम फेंकने के आरोप में मास्टर अमीरचंद,भाई बालमुकुंद और मास्टर अवधबिहारी को मृत्युदंड दिया गया और कई क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास दिया गया।इसके बाद 17 नवंबर 1913 को राजस्थान के अरावली के मानगढ़ में बरतानवी फौज ने 2500 भील आदिवासियों को घेरकर गोलियों से भून दिया।दो साल बाद यानी 2015 में संसार के सबसे बड़े गदर की योजना विश्वासघात के कारण नाकाम हो गई ,जिसमें 8000 क्रांतिकारी गोपनीय तरीके से समंदर के रास्ते जहाजों में भरकर भारत पहुँचे थे। उन्होंने अविभाजित हिन्दुस्तान की 26 सैनिक छावनियों में सशस्त्र विद्रोह की खुफिया योजना बनाई थी। इसमें ग़दर के नौजवान संपादक करतार सिंह सराभा और इलाहाबाद से प्रकाशित उर्दू अख़बार स्वराज में उप संपादक रहे पंडित परमानन्द ( भाई परमानन्द नहीं ) समेत 26 क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुनाई थी। बाद में प्रिवीकौंसिल ने मुल्क़ में बगावत की आशंका के मद्देनज़र 19 देशभक्तों की सजा आजन्म क़ैद में बदल दी। शेष 7 को फाँसी दे दी गई थी। आज़ाद हिंद फ़ौज़ के संस्थापक रास बिहारी बोस भी इस गदर के सूत्रधार थे। वे ऐन वक़्त पर ग़ोरी पुलिस को चकमा देकर भाग निकले थे।जब मैं 7 या 8 साल का था तो पंडित परमानन्द ने मुझे बताया था कि वे स्वराज में पत्रकारिता प्रशिक्षण के दरम्यान जेल की चक्की पीसा करते थे और बाज़ार में घंटा बजाकर स्वराज बेचते थे। लोग आते। चुपचाप अखबार खरीदकर ले जाते। पंडित परमानन्द पंडित सुंदरलाल के कर्मयोगी में भी लिखते थे।इसके बाद 1919 में जलियाँवाला बाग़ नरसंहार हुआ। बाद के वर्षों में चंद्रशेखर आज़ाद,भगतसिंह,सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी जाती है और छतरपुर ज़िले में चरणपादुका नरसंहार किया जाता है। अर्थात भारत के हर इलाक़े में बेग़ुनाह देशवासियों को मारकर बरतानवी सत्ता आतंक का साम्राज्य क़ायम कर चुकी थी।

यहाँ लंबी पृष्ठभूमि इसलिए भी ज़रूरी थी क्योंकि मैं बताना चाहता था कि उन दिनों अँगरेज़ों का डर कितना था।ऐसे में गांधी जी के लिए पत्रकारिता कितनी जोखिम भरी थी — बताने की आवश्यकता नहीं। शायद इसीलिए श्रीधर जी ने इस खंड का नाम गांधी युग दिया होगा। सन 1919 में यानी क़रीब एक सौ छह साल पहले गांधीजी गुजराती में नवजीवन शुरू करते हैं।यंग इंडिया के संपादक बनते हैं और झकझोरने वाले विचारों की नदी बहाते हैं ।यंग इंडिया का संपादक बनते ही वे पहला पत्र अखबार में उन लोगों को लिखते हैं,जो उनसे असहमत थे या उनका विरोध करते थे ।दूूूसरा पत्र वे उन गोरों को लिखते हैं,जिसमे वे उन्हें भारत की आज़ादी के लिए मजबूर करने वाले तर्क़ देते हैं।यह दोनों अखबार करीब-करीब तेरह-चौदह साल निकलते रहे ।गांधी के नैतिक साहस का एक और उदाहरण। सन 1919 में ही रॉलेट एक्ट लागू हुआ। इसमें प्रकाशित होने वाली हर सामग्री की पूर्व अनुमति ज़रूरी बना दी गई थी।एक्ट के तहत किसी अपील और दलील का स्थान नहीं था ।गांधी जी इसके विरोध में सत्याग्रह का प्रकाशन करते हैं।इस अख़बार के प्रकाशन की अनुमति वे नहीं लेते। पहले अंक में ही लिखते हैं कि सत्याग्रह का प्रकाशन तब तक होता रहेगा,जब तक कि एक्ट वापस नहीं लिया जाता।यह साहस दिखाने वाले सिर्फ़ गांधी ही हो सकते थे।  

इसके बाद 1933 मेंं उनकी पहल पर हरिजन कल्याण के लिए नया अखबार हरिजन निकलता है ।क्या आप यह जानते हैं कि हरिजन नाम संपादक के नाम पत्र लिखने वाले एक दलित पाठक ने गांधी जी को भेजा था। यह पहले अँगरेज़ी में फिर हिंदी में निकला । उनका इस समाचारपत्र के लिए उद्देश्य एकदम साफ़ था - सेेेवा ।आज विचारों की ख़ुराक़ हमें कहां मिलती है । न के बराबर ।गांधी ने उस समय कहा था कि एक विचार पत्र होना चाहिए।सरकार के दबाव और सेेंसरशिप के विरोध में वे लिखते हैं - एक एक पंक्ति अगर दिल्ली में बैठे प्रेस सलाहकार को भेेेजना पड़े तो मैैं स्वतंत्रतापूर्वक काम नही कर सकता ।प्रेस की आज़ादी तो विशेषाधिकार है ।गांधी के तेवर से सरकार परेशान हो चुकी थी । जब 1942 में उन्होंने अँगरेज़ो ! भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू किया तो हरिजन बंद करना पड़ा। गांधी जेल गए और इधर हरिजन पर ताला पड़ गया ।एक-एक प्रति जला दी गई ।दो बरस बाद गांधी जी जेल से छूटे तो फिर हरिजन शुरू कर दिया । सेवाग्राम से ही उन्होंने सर्वोदय का भी प्रकाशन प्रारंंभ कर दिया ।यह उनके अंत समय तक जारी रहा। गांधी ने अपने को हमेशा पूर्णकालिक पत्रकार माना। उनका कहना था कि सबसे बड़ा काम देश की आज़ादी है। इसके बाद मेरा काम पत्रकारिता का है।उन्होंने साफ-साफ कहा था," संपादक को कोई भी परिणाम भुगतना पड़े,लेकिन उसे अपने विचार खुलकर व्यक्त करना चाहिए "।

*बनारसीदास चतुर्वेदी की पत्रकारिता* 

 

गांधीजी को समर्पित समग्र भारतीय पत्रकारिता के इस अंतिम भाग में कन्नड़,असमिया,मलयालम ,मराठी,तमिल,तेलुगु तथा अन्य भारतीय भाषाओँ की शब्दक्रान्ति का विवरण है।चाँद के फांसी अंक को सलामी दी गई है।ख़ास बात यह है कि इस कालखंड में जो समाचारपत्र निकले,उनमें से अधिकांश आज भी प्रकाशित हो रहे हैं ( लेकिन उनकी वर्तमान पत्रकारिता की दिशा और दशा पर मैं चुप रहना पसंद करूँगा ) इनके अलावा डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के मराठी साप्ताहिक मूक नायक और बहिष्कृत भारत के जन्म की कहानी भी आप इस भाग में पढ़ सकते हैं। डॉक्टर आम्बेडकर को भारतवासी संविधान निर्माण में उनकी भूमिका के लिए जानते हैं। पर,वे मूलतः विलक्षण अर्थशास्त्री थे — यह लोग नहीं जानते।अर्थशास्त्र में पहली भारतीय पीएचडी डॉक्टर आंबेडकर ने ही की थी,यह भी कम लोग ही जानते हैं।साढ़े नौ बरस तक बनारसीदास चतुर्वेदी ने विशाल भारत का निर्भीक संपादन किया और उसके बाद मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ आ गए। वहाँ कुण्डेश्वर से मधुकर का प्रकाशन किया।सन्दर्भ के तौर पर बता दूँ कि चतुर्वेदी जी पहले इंदौर के डेली कॉलेज में प्राध्यापक थे। इस कॉलेज में अधिकतर रियासतों के राजकुमार पढ़ने आया करते थे। टीकमगढ़ रियासत के राजकुमार भी चार साल तक बनारसीदास चतुर्वेदी के छात्र रहे थे। जब वे राजा बने तो उन्होंने चतुर्वेदी जी को न्यौता भेजा कि वे टीकमगढ़ आकर रहें और पत्रिका का प्रकाशन करें। मधुकर पत्रिका चतुर्वेदी जी ने ही निकाली थी। दिलचस्प कहानी यह है कि राजा साहब बुंदेलखंडी व्यंजनों के बड़े शौक़ीन थे और बहुत अच्छे रसोइये भी थे। उन्होंने बुंदेली व्यंजनों पर एक किताब लिखी और अपने प्रधानमंत्री को दिल्ली भेजा कि वे इस किताब को किसी प्रेस से प्रकाशित कराएँ। उन दिनों दिल्ली में गिने-चुने प्रकाशक ही होते थे। जब प्रधानमंत्री दिल्ली गए तो उन प्रकाशकों ने बड़ा मज़ाक़ उड़ाया। प्रधानमंत्री से राजा साहब ने यह क़िस्सा सुना तो बहुत क्रोधित हो गए और सीधे लन्दन या जर्मनी से नई प्रिंटिंग प्रेस खरीदकर टीकमगढ़ में लगाईं। इस प्रेस में बुंदेली व्यंजनों की वह किताब छपी। बाद में इस मशीन के लिए कोई पूर्णकालिक काम नहीं बचा तो उन्होंने बनारसीदास दास चतुर्वेदी से प्रार्थना कि वे राजा मधुकर शाह के नाम से मधुकर नमक पत्रिका निकालें। चतुर्वेदी जी ने

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