राजेश बादल
संसार में सब कुछ बदल रहा है। लोग बदल रहे हैं।उनका सोच और जीवन-शैली बदल रही है।पूंजी के परंपरागत स्रोत बदल रहे हैं।पहले समाज के लिए पूंजी होती थी।अब पूंजी के पीछे समाज भाग रहा है।इस क्रांतिकारी परिवर्तन ने समूचे विश्व में लोकतंत्र की प्रचलित प्रणालियों पर असर डाला है।धनप्रधान राजनीति होने से शासन के तौर तरीकों और व्यवहार पर उलटा प्रभाव पड़ा है।क्योंकि मेरी दृष्टि में लोकतंत्र का पूँजी से बैर है।इसी वजह से अब लोकतंत्र का अर्थ सामुदायिक नेतृत्व नहीं रहा।सामुदायिक नेतृत्व अर्थात जिसमें नैतिक मूल्यों,लोकहित और मर्यादाओं को प्रधानता दी जाती हो ।अब चूँकि पूंजी-नियंत्रण समूह के हाथ से फिसल रहा है इसलिए निर्णय का अधिकार भी सामूहिक नहीं रहा।सामूहिक व्यवस्था में एक दूसरे की राय का आदर किया जाता है,लेकिन पूंजी प्रधान तंत्र में कभी तंत्र की आलोचना पसंद नहीं की जाती।यही मानवीय स्वभाव है।समाज संचालन की बुनियादी शर्त असहमति के स्वरों को संरक्षण देना है।इस नाते सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अभय ओका की सलाह का सम्मान किया जाना चाहिए।
पूर्व न्यायाधीश अभय ओका ने मुंबई के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बीते सप्ताह विचार रखे।उन्होंने कहा कि असहमति का सम्मान करना चाहिए।यह अपराध नहीं है।भारतीय संविधान के अनुच्छेद19और 21यही बात विस्तार से बताते हैं।ख़ासतौर पर अनुच्छेद 21हिन्दुस्तान के नागरिकों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हक़ देता है।यह मौलिक अधिकारों में शामिल है।जीवन की स्वतंत्रता का मतलब शारीरिक सुविधा के अतिरिक्त सम्मान,गरिमा और उचित मानवीय व्यवहार के साथ जीने का अधिकार भी है।इसमें क्रूर,अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार ( चाहे वह पूछताछ के दौरान हो या किसी अन्य स्थान पर) से मुक्त रहने का हक़ भी शामिल है।व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मतलब व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता है।इसमें अनुचित रोक-टोक के बिना अपने शरीर और जीवन से जुड़े फ़ैसले की आज़ादी शामिल है।पर इससे संवैधानिक उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
मतलब यह कि मौजूदा परिस्थितियों में परिवर्तन को नहीं रोका जा सकता।परिवर्तन प्रकृति का नियम है।बदलाव रोक नहीं सकते और संवैधानिक मर्यादा में रहना है तो लोकतंत्र का ऐसा आधुनिक संस्करण चाहिए,जिसमें आज के भारतीय की ज़िंदगी सक्रिय सियासत में शामिल हो।वर्तमान में पूंजी का दबदबा है।आधुनिक तकनीक का उपयोग,संचार के अत्याधुनिक उपकरणों और निजी संपन्नता की चाहत इस राष्ट्र के नागरिकों की ज़िंदगी और सोच में शामिल हो चुकी है।राजनीति में भी इन दिनों नए नए तरीके अपनाए जाने लगे हैं।इसमें आम अवाम तक पहुँचने अथवा उससे संवाद करने के लिए रैलियों में भारी भीड़ जुटाना बेमानी हो गया है,क्योंकि संप्रेषण के नए नए उपकरण प्रचलन में आ चुके हैं।गाँवों और कस्बों से लोगों को लाना पड़ता है।उनके भोजन की व्यवस्था करनी होती है।उनको नक़द दक्षिणा देनी पड़ती है।इसके लिए सत्तारूढ़ सियासी पार्टियां सरकारी संसाधनों का दुरूपयोग करती हैं और भ्रष्टाचार का दरवाज़ा खुल जाता है।जब खेत की मेड़ पर बैठा किसान और सड़क पर झाड़ू लगा रहा सफाईकर्मी मोबाईल का इस्तेमाल कर रहा हो तो फिर पांच सौ फुट दूर से मक्खी के आकार में दिख रहे राजनेता को कोई क्यों देखना चाहेगा? रैली के लिए सुरक्षा व्यवस्था में सैकड़ों सिपाही तैनात किए जाते हैं।प्रत्येक राज्य में पुलिसबल आबादी के मान से अपर्याप्त है।उसे अपराध नियंत्रण और जांच पड़ताल के लिए ही वक़्त नहीं मिलता तो रैली या सभा में तैनाती मानव श्रम का दुरूपयोग ही है।एक ज़माना था,जब लोग गांधी या नेहरू को देखने के लिए स्वमेव कई किलोमीटर पैदल चलकर देखने जाते थे।वे चाहते थे कि उन महापुरुषों को देखें,जिन्होंने वाकई आज़ादी दिलाई है।उन दिनों टेलिविज़न या मोबाईल से लाइव देखने की सुविधा होती तो शायद तब भी लोग नहीं जाते।आज आधुनिक तरंगों ने घर बैठे देखना - सुनना सब कुछ आसान बना दिया है तो इतना मँहगा डीज़ल -पेट्रोल खर्च करने की क्या आवश्यकता है ? इसी तरह रोड शो भी आज की सियासत का आम हिस्सा बन गए हैं। उनकी उपयोगिता क्या है ? सड़क पर बांसों की सुरक्षा बाड़ लगाना,सुरक्षा घेरा बनाए रखना और अनगिनत गाड़ियों का काफिला आगे पीछे रखने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता।
हम लोग लेखन और पत्रकारिता में अक्सर राजनेताओं के लिए जनाधार शब्द का उपयोग करते हैं।जनाधार यानी जिस नेता को अधिक से अधिक संख्या में लोगों को सम्मोहित करने या खींचने की कला आती हो।अब रैलियों,सभाओं और रोड शो में पैसे देकर लाई गई भीड़ को जनाधार का पैमाना नहीं माना जा सकता।जब राजनेता अपने धर्म,जाति,उपजाति,क्षेत्र या प्रदेश के आधार पर मतदाताओं को बांटकर देखते हों और उसी आधार पर चुनाव जीतने की रणनीति बनाते हों तो जनाधार की ज़रुरत क्या रह जाती है ? व्यापक जनाधार वाला नेता न मज़हब के आधार पर बांटकर देखता था और न किसी अन्य आधार पर।उसके लिए भारत का नागरिक होने की शर्त ही जनाधार में दाखिल होने के लिए पर्याप्त थी।अब बड़े नेताओं के बेटे-बेटियों को बिना पसीना बहाए उत्तराधिकार में मतदाता बैंक मिल जाता है। यह लोकतंत्र का सामंती संस्करण है। फिर जनाधार वाला योग्य नेता किस काम का ? ऐसे जनाधार का क्या मतलब,जिसमें कोई नेता लोगों के दिल में तो बसता हो,लेकिन उसके पास चुनाव जीतने के लिए पैसे नहीं हों।ऐसे जनाधार वाले नेता को तो पार्टियाँ टिकट देना भी पसंद नहीं करतीं।अब साफ़ समझ में आ गया है कि चुनाव धनबल और बाहुबल से जीते जाते हैं।जनाधार से नहीं।मतदाता तो चुनाव के दिनों में खरीद लिया जाता है।कहीं नक़द बंट जाता है तो कहीं शराब या उपहारों से लाद दिया जाता है।जहाँ वोटर नहीं मानता तो फिर बाहुबल काम आता है।कह सकते हैं कि सिर्फ़ चुनाव जीतना ही लोकतंत्र का मतलब हो गया है।ऐसे में भारत को लोकतंत्र का नया और आधुनिक संस्करण तैयार करना अत्यंत ज़रूरी हो गया है।लोकतंत्र के पौराणिक संस्करण से बात नहीं बनेगी।




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