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Added on : 2026-06-06 11:35:08

अजय बोकिल 

पश्चिम बंगाल में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में पराजय का महीना ही हुआ है,लेकिन इस दौरान पार्टी जिस तरह तिनका-तिनका बिखर रही है, वह सियासी शोधार्थियों के लिए शोध का विषय है। हारने के बाद पार्टियां कई बार टूटती- बिखरती हैं,लेकिन उसमें समय लगता है। पर एक माह पहले तक बेहद मज़बूत दिख रही टीएमसी के विधायक दो फाड़ हो गए और सांसद कभी भी दो हिस्सों में बंट सकते हैं। टूटन का यह खेल निचले स्तर तक भी पहुंच चुका है। टीएमसी में बिखराव के इस खेल के पीछे भाजपा का हाथ माना जा रहा है,लेकिन भाजपा तो निमित्त ही है। जो हो रहा है,उससे उजागर है कि विचार,संगठन और प्रतिबद्धता की दृष्टि से यह पार्टी रेत के महल पर खड़ी थी। कभी विचार क्रांति का केन्द्र रहे बंगाल में सियासत का मतलब अब केवल सत्ता का गोंद है।यह टीएमसी के हश्र से सिद्ध हो गया है। ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं। पहला,कल तक राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का नेता बनने का ख्वाब देख रही ममता बनर्जी क्या बंगाल में ही पार्टी बचा पाएंगी ? क्या हर क्षेत्रीय अथवा जातिवादी पार्टी की ‍त्रासदी परिवारवाद ही है? ममता की पार्टी के सियासी अवसान से राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के नए सिरे उभार को मदद मिलेगी या कांग्रेस भी अंतत: इसी अंतर्विरोध का शिकार होगी? और यह भी कि भाजपा का ‘बंगाल माॅडल’ लोकतंत्र को कैसे ताकतवर बनाएगा ? 

ममता बनर्जी जुझारू तो हैं, लेकिन झगड़ालू भी कम नहीं हैं। हर वक्त पंगा और टकराव जनता के मन में गंभीर और विश्वसनीय छवि नहीं बनाता। । ममता उद्योगों के लिए लोगों की जमीनों के हस्तांतरण और तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार का तगड़ा विरोध कर 2011 में सत्ता में आईं थीं। लेकिन सत्ता में जमे रहने के राजनीतिक चालों के अलावा कुछ नहीं हुआ।नतीजा क्या निकला ? लोगों को ममता से मोहभंग हो गया। उन्हें सशक्त विकल्प की तलाश थी।वह 2026 के चुनाव में मिल गया। भले ही ममता इसका ठीकरा एसआईआर और भाजपा पर फोड़ती रहें, लेकिन सच तो यही है कि ममता सरकार के कुशासन के प्रति लोगों का गुस्सा उन्हें सत्ता से बेदखल करने के बाद भी थमता नहीं दिख रहा।पार्टी में बगावत का सिलसिला अगर नहीं थम रहा तो बड़ा कारण ममता बनर्जी का तानाशाहीपूर्ण रवैया और परिवार प्रेम है। यही वो फांस है, जिसकी लगभग सभी क्षेत्रीय और जातिवादी पार्टियां शिकार हैं।यह जानते हुए भी कि यह प्रवृत्ति उनके पतन का कारण बनती है। यह बात अलग है कि ऐसे नेता दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ना चाहते। ममता की पार्टी में टूटन की शुरुआत भतीजे अभिषेक बनर्जी को 2021 से राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिशों से हो गया था। आम कार्यकर्ता में यही संदेश गया कि उसका राजनीतिक भविष्य नहीं है। अभिषेक भी पार्टी को तानाशाह की तरह चला रहे थे । ममता ने इसकी लगातार अनदेखी की। यदि वे सही वक्त पर इलाज करतीं तो पश्चिम बंगाल के नतीजे अलग हो सकते थे। आश्चर्य तो उन अल्पसंख्यक विधायकों का साथ छो़ड़ना है,जिनके तुष्टिकरण का इल्जाम ममता पर था। टीएमसी के टिकट पर जीते 17 मुस्लिम विधायक अब बागी गुट के साथ हैं। 

जिन 58 बागियों की अगुवाई कर ऋतुब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विस में नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं,वो खुद पुराने कम्युनिस्ट हैं और सीपीएम से राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। हालांकि ऋतु्ब्रत पर लगे चारित्रिक आरोपों के बाद पार्टी ने उन्हें निकाल ‍िदया था। उसके बाद ऋतुब्रत टीएमसी में आ गए और ममता के चहेते बन गए। लेकिन अभिषेक को तवज्जो मिलने के बाद उन्होंने बगावत का रास्ता चुना। कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह 2011 के विस चुनाव में ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाकर राज्य में बरसों से जमे कम्युनिस्टों को हमेशा के लिए सत्ता से बेदखल किया था, उसी कम्युनिस्ट पार्टी के एक पूर्व कार्यकर्ता ने टीएमसी विधायक दल को तोड़कर पुरानी पराजय का बदला ले लिया है। 

 सवाल यह है कि क्या ममता पार्टी को फिर पहले की तरह मजबूत शक्ल में खड़ी कर पाएंगी ?शायद नहीं क्योंकि ममता की बढ़ती उम्र और अभिषेक मोह से उनका न उबर पाना बड़ी बाधा है। वैसे भी आने वाले पांच बरसों में भाजपा राज्य में हर स्तर पर पांव जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। इसे बदलना अब आसान नहीं है। ऐसे में टीएमसी के साथ वे ही रहेंगे, जो ममता भक्त हैं। यानी टीमएसी रहेगी तो लेकिन विपक्ष की सीमित भूमिका में। बाकी सत्ता के साथ जाएंगे। 

टीएमसी के पतन से कांग्रेस को कितना लाभ मिलेगा या कम्युनिस्टों को संजीवनी मिलेगी, इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी है। इतना तो तय है ‍कि कांग्रेस अब ममता को ज्यादा भाव नहीं देगी। आगामी चुनावों में सीटों के बंटवारे में भी वह ज्यादा दबंगई से सौदेबाजी कर सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर उनके विपक्ष का नेतृत्व करने की संभावना पर भी पानी फिर गया है। यानी विपक्ष की कमान राहुल गांधी के हाथों में ही रहेगी। राज्य में वामपंथियों की स्थिति पहले से बेहतर हो सकती है। लेकिन पहले सी व्यापक स्वीकृति अब मुश्किल है।  

 ‍िदलचस्प तो अब भाजपा का ‘पश्चिम बंगाल माॅडल’ है। कुछ लोग इसे सत्ता प्राप्ति के ‘महाराष्ट्र माॅडल’ से जोड़ कर देख रहे थे,लेकिन वह सही नहीं है। महाराष्ट्र में भाजपा ने दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को राज्य में सत्ता में पाने के लिए तोड़ा था,लेकिन बंगाल में उसके पास पहले ही बहुमत है,इसलिए टीएमसी को तोड़ने के पीछे असली मकसद संसद में ताकत बढ़ाना है न कि राज्य में। यह कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना वाला अंदाज है। माना जा रहा है कि विधायकों के टूटने के बाद जल्द ही टीएमसी के 29 लोकसभा सांसद भी दो धड़ों में बंट जाएंगे। अगर 20 सांसद भी अलग हुए तो वे पृथक गुट बनाकर भाजपा में विलय कर सकते हैं। ऐसा हुआ तो लोकसभा में भाजपा के सांसदों की संख्या 240 से बढ़कर 260 तक जा पहुंचेगी। बाकी 12 का इंतजाम भी किसी और तिकड़म से ‍िकया जा सकता है। और पार्टी अपने दम पर ही लोकसभा में बहुमत में आ सकती है।

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