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हॉट टोपिक
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Added on : 2026-06-11 08:08:21

राजेश बादल
अमेरिकी प्रशासन में इन दिनों खलबली है। विशेषज्ञों को एक के बाद एक भारतीय मूल के अधिकारियों के इस्तीफ़े स्वाभाविक नहीं लग रहे हैं।माना जा रहा है कि अपने दूसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारतीय मूल के अधिकारियों पर जितना भरोसा कर रहे थे ,अब वह बेहद निचले स्तर पर है। अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए यह चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि त्यागपत्र दे रहे अधिकारी भारतीय समुदाय के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहे हैं और अपनी पेशेवर प्रतिभा के दम पर उन्होंने अनेक क्षेत्रों में अमेरिका की साख बढ़ाई है। भारतीय मूल के लोगों की परेशानी का एक कारण यह भी है कि अभी तक उनका मूल्यांकन काम के आधार पर किया जाता रहा है। लेकिन अब स्थितियाँ बदल रही हैं। अब उन्हें अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों से जोड़कर देखा जा रहा है। जानकार तो यह भी कहते हैं कि त्यगपत्रों के इस सिलसिले के पीछे पाकिस्तान समर्थक समूह काम कर रहा है। हालिया ईरान-इजरायल-अमेरिका जंग के दरम्यान पाकिस्तान की निकटता भी इसकी वजह बताई जा रही है। 
सबसे ताज़ा उदाहरण श्रीरामकृष्णन के पद छोड़ने का है। वे व्हाइट हाउस में कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्र ( आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ) के प्रभारी थे और अमेरिका की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की कार्यकारी योजना तैयार करने में उनकी ख़ास भूमिका रही है।श्रीरामकृष्णन ने कहा है कि वे जून महीने के अंत तक अपना पद छोड़ देंगे। कुछ समय से उनका विरोध मागा यानी मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के कार्यकर्ता कर रहे हैं। इन कार्यकर्ताओं में अधिकतर डोनाल्ड ट्रंप के अंधभक्त हैं। विडंबना यह है कि विरोध का आधार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मुखिया के तौर पर नहीं है। वह तो अमेरिका को पसंद है। उनके खिलाफ खड़े कथित दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों का आरोप तो यह है कि श्रीरामकृष्णन ऐसी नीतियों का समर्थन कर रहे हैं ,जो भारतीयों का लाभ पहुँचाती हैं। मसलन वे आप्रवासन नीति ( इमिग्रेशन ) नीति में परिवर्तन चाहते हैं। उनका कहना है कि एच -1 बी वीज़ा नीति में कोटा व्यवस्था समाप्त की जानी चाहिए। विरोधी कहते हैं कि इससे भारत के आई टी क्षेत्र के पेशेवरों को ज़्यादा लाभ मिलेगा। उनकी नौकरियाँ छिन जाएँगी और भारतीयों का अमेरिका पर क़ब्ज़ा हो जाएगा। बेरोज़गारी के भय से मागा कार्यकर्ता श्रीरामकृष्णन का हर स्तर पर विरोध कर रहे थे। तंग आकर उन्होंने अपने इस्तीफ़े का ऐलान कर दिया। 
इससे पहले तेज़तर्रार राजनेत्री तुलसी गावार्ड ने अपना पद त्याग दिया था। आपको याद होगा कि कुछ वर्ष पहले तक तुलसी गावार्ड डेमोक्रेटिक पार्टी में थीं और राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल थीं। बाद में वे डोनाल्ड ट्रंप की टीम का हिस्सा बन गई। उन्हें राष्ट्रीय ख़ुफ़िया निदेशक जैसे अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण पद की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। अमेरिकी रिकॉर्ड के मुताबिक़ वे कट्टर हिन्दू हैं और उन्होंने भगवतगीता की शपथ लेकर दायित्व संभाला था। यूँ तो उन्होंने अपने त्यागपत्र का कारण एकदम पारिवारिक बताया है। उनके पति को हड्डी का दुर्लभ कैंसर है। तुलसी ने कहा है कि वे पति की सेवा करना चाहती हैं। यह अलग बात है कि उनके पति को कैंसर की जानकारी परिवार को बहुत पहले से पता थी। जानकार तुलसी गावार्ड के इस्तीफे की एक अन्य वजह बताते हैं। उनका कहना है कि वे ख़ुफ़िया विभाग की सर्वोच्च अधिकारी थीं और ईरान पर हमले के समय व्हाइट हाउस ने उन्हें भरोसे में नहीं लिया। वेनेजुएला के मामले में भी ऐसा ही हुआ। लगातार उपेक्षा से तुलसी आहत थीं। व्हाइट हाउस को अंदेशा था कि भारतीय मूल की होने के कारण उनकी सहानुभूति ईरान के साथ हो सकती है। इसलिए जंग से जुड़ी कोई सूचना उन्हें नहीं दी गई ,जबकि सबसे अधिक ख़ुफ़िया सूचनाएँ उनके पास थीं। यह अलग बात है कि वे जानकारियां ईरान को बड़ा खलनायक नहीं बनाती थीं। इसके अलावा तुलसी ने अपने कार्यकाल में करीब पांच लाख पन्ने सार्वजनिक किए थे। उनमें एक अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ट्रंप को हारने के लिए रूस के हस्तक्षेप से संबद्ध था। उस समय तो तुलसी ने पूर्व की बराक ओबामा सरकार को घेरने के मक़सद से ऐसा किया था। लेकिन दस्तावेज़ों के खुलासे से रूस ख़फ़ा हो गया। प्रसंगवश बता दूँ कि ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार अभियान में बार बार कहा था कि वे रूस और यूक्रेन की जंग चौबीस घंटे में बंद करा देंगे। वे खुलकर रूस के पक्ष में बोल रहे थे कि यूक्रेन के जिन इलाक़ों पर रूस का अधिकार हो चुका है,वे वापस नहीं मिलेंगे। रूस की नाराज़ी दूर करने के लिए ट्रंप ने तुलसी की बलि ले ली।
इसी दौरान नासा में शिखर पद पर कार्यरत नीला राजेंद्र को भी बर्ख़ास्त कर दिया गया था। उन्होंने एक आदेश जारी किया था। यह आदेश व्हाइट हाउस को पसंद नहीं आया था। नतीजे में नीला को पद गंवाना पड़ा। अब सूत्र कहते हैं कि संघीय जांच ब्यूरो ( फेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन )के प्रमुख काश पटेल की बारी है। काश पटेल कभी डोनाल्ड ट्रंप की नाक के बाल होते थे। लेकिन उनके साथ कुछ विवादों के बहाने कभी भी वे हटाए जा सकते हैं। बीते दिनों व्हाइट हाउस में संवाददाताओं के रात्रि भोज में एक आला अफसर ने दावा किया था कि यह केवल समय की बात है कि काश पटेल को कब हटाया जाता है। अप्रैल में ट्रंप ने काश पटेल के संरक्षक पाम बांडी को भी बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद ही कहा जाने लगा है कि काश पटेल की भी चला चली की बेला है। ट्रंप स्वयं भी काश पटेल से निराश बताए जाते हैं। कारण यह है कि काश पटेल ने ट्रंप के राजनीतिक विरोधियों के साथ सख्ती नहीं बरती और न ही एपस्टीन विवाद पर अपेक्षित भूमिका निभाई। ट्रंप अगर किसी संकोच में हैं तो यही कि एपस्टीन फाइलों की अत्यंत गुप्त सूचनाएँ काश पटेल के पास हो सकती हैं। अंत में बता दूँ कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी भारतीय मूल के कुछ अफसरों पर गाज गिरी थी। इनमें ख़ास हैं प्रीत भरारा और राज शाह। अमेरिकी राजनयिक हलकों में अब यह सवाल तैर रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप को क्या शिखर पदों के लिए अमेरिकी क्यों नहीं मिलते ?

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