दीपक पाचपोर
देश भर में हिन्दी के पत्रकार और मीडिया संस्थान जोर-शोर से उस ‘उदंत मार्तण्ड’ की 200वीं वर्षगांठ मना रहे हैं जो 30 मई, 1826 को कोलकाता से निकला था। हर मंगलवार को प्रकाशित होने वाला यह साप्ताहिक समाचारपत्र 4 दिसम्बर, 1827 को आर्थिक परेशानियों और महंगी डाक सामग्री के चलते बन्द हो गया। इसके अलावा तब की उच्च निर्धनता दर एवं अल्प साक्षरता वाले समाज में हर कोई अखबार या तो खरीद नहीं सकता था अथवा पढ़ नहीं पाता था। अमीर-उमराव और पढ़े-लिखे ज्यादातर अंग्रेजी समाचारपत्र पढ़ते थे।
देश का पहला अखबार एक आयरिश अंग्रेज जेम्स आगस्टस हिक्की 29 जनवरी, 1780 से ‘हिक्कीज़ बेंगाल गज़ट’ नामक समाचारपत्र निकाल ही चुके थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भ्रष्टाचार व अत्याचार के खिलाफ तथा गरीबों व सैनिकों की खबरें हिक्की बेधड़क छापा करते थे। फलतः उन पर मुकदमे चले और 30 मार्च, 1782 को ब्रिटिश प्रशासन ने उनकी मशीनें, प्रकाशन सामग्रियां तथा समाचारपत्र को जब्त कर प्रेस पर ताला मार दिया। यह अखबार भी कोलकता (तब का कलकत्ता या केलकेटा) से ही निकलता था। उसके बाद कुछ और समाचारपत्र निकले लेकिन सारे अंग्रेजी में तथा कुछ अन्य भाषाओं में। हिन्दी को अपने अखबार का मुंह देखने के लिये कई दशकों का इंतज़ार करना पड़ा।
पण्डित जुगल किशोर शुक्ल ने उस कमी को पूरा किया। सरकार से सवाल करना समाचारपत्र का बुनियादी दायित्व है- यह संदेश तो हिक्की साहेब पहले ही दे चुके थे। अंग्रेज होने के बावजूद वे अपने कंटेंट्स व तेवर के चलते जेल यात्राएं भुगत चुके थे। जब उदंत मार्तण्ड (उगता सूरज) शुरू हुआ तब भारत का एक बड़ा हिस्सा व्यापारी बनकर आई ईस्ट इण्डिया कम्पनी के या तो कब्जे में था अथवा उसका प्रभाव बढ़ रहा था। या उसकी दखलंदाजी रियासतों व भारतीय जनजीवन में काफी बढ़ चुकी थी। पं. शुक्ल ने अपने प्रकाशन के जरिये हिन्दीभाषियों तक समाचार पहुंचाने, साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने एवं सामाजिक सुधारों के प्रति जागरूकता फैलाने का महान बीड़ा उठाया।
इस प्रकाशन का जीवन इतना नहीं रहा कि उसके असर का ठीक से विश्लेषण हो सके। 1857 की क्रांति दूर थी, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का आगमन शेष था, गांधीजी का जन्म कई वर्षों बाद होना था, हिन्दी व भारत के पुनर्जागरण काल की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी और देश के महान स्वतंत्रता आंदोलन का आगाज़ अगली सदी में होना था। इन परिघटनाओं का जिक्र इसलिये आवश्यक है कि हिन्दी पत्रकारिता या कहें तो कुछ को छोड़कर लगभग सभी भाषाओं की पत्रकारिता की असली सान इन्हीं घटनाक्रमों के जरिये चढ़ी थी।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले आजादी के अहिंसक आंदोलन व सत्याग्रह के साथ ज्यादातर हिन्दी पत्रकार हो लिये थे। स्वतंत्रता आंदोलन की अन्य धाराओं के साथ भी कुछ समाचारपत्र चले थे लेकिन हिन्दी पत्रकारिता का प्रतिनिधि चेहरा गांधी समर्थक प्रकाशकों का ही रहा। आजादी के लिये संग-संग चले पत्रकार व पत्र-पत्रिकाओं ने वे सारी यातनाएं झेलीं जो स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष तौर पर और मैदानी लड़ाइयों में उतरे आजादी के परवाने भुगत रहे थे- जेल, प्रेस बंदीकरण, सजाएं.., सब कुछ। अनेक अखबारनवीस एवं प्रकाशन इस आंदोलन के अभिन्न हिस्से थे।
आज भी जब हिन्दी पत्रकारिता की बात होती है तो उन्हीं समाचारपत्रों-पत्रिकाओं की मान्यता बनती है जो हमारी आजादी के वक्त तय किये गये आदर्शों एवं मूल्यों की वकालत करते हैं और जो कालांतर में भारतीय संविधान में समाहित किये गये- स्वतंत्रता, समानता, बन्धुत्व, धर्मनिरपेक्षता आदि। एक न्यायपूर्ण समाज बनाने का संकल्प जो स्वतंत्र भारत ने लिया, संविधान ने उसे घोषित किया और सरकारों ने दोहराया- हिन्दी पत्रकारिता ने इन्हें ही अपना दायित्व माना है।
उपरोक्त तथ्यों के चलते हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास गौरवपूर्ण तो है, परन्तु उसका वर्तमान बेहद चिंताजनक; भविष्य तो और भी भयावह। शुकुलजी का योगदान आज जिस माहौल में याद किया जा रहा है, वह पत्रकारिता ही नहीं देश के लिये भी चिंताएं पैदा करने वाला है। उदंत मार्तण्ड के 200 साल में पहुंचते-पहुंचते देश उन मूल्यों को तिरोहित करने की कगार पर है, जिनकी बदौलत इस देश ने लम्बी औपनिवेशिक गुलामी की बेड़ियां तोड़कर अल्प समय में एक विकसित और आधुनिक राष्ट्र के रूप में गौरव व सम्मान अर्जित किया था। नयी विचारधारा उन मूल्यों के ठीक विपरीत ध्रुव पर खड़ी है, जिन पर भारत अब तक चलता आया है। आज समानता असम्भव कही जाने लगी है, सर्व धर्म समभाव अस्वीकार्य और न्यायपूर्ण समाज बकवास की बात बनकर रह गयी है। विविधता से परिपूर्ण संस्कृति को परिष्कृत करने की राह से वह एकदम अलग बैठ गयी है।
अंग्रेजों के दमन के आगे न झुकने वाली, इस सम्प्रभु देश को ऊंचाइयों पर ले जाने के लिये अन्य स्तम्भों के समांतर चलने वाली यही पत्रकारिता प्रिंट के फॉर्मेट से बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल, यूट्यूब, पॉडकास्ट जैसे कई रूपों में तो वर्तमान दौर में सबके सामने है लेकिन उसकी साख चकनाचूर है। विपक्ष का अटूट जोड़ीदार कहलाने वाले मीडिया का बड़ा हिस्सा आज सत्ता की भाषा बोलने लगा है। सरकार के कृत्यों को जस्टिफाई करना ही उसे अपनी जिम्मेदारी लगती है। बड़े-बड़े प्रकाशन व पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने की आदत व साहस दोनों ही खो चुके हैं। साख स्वाहा!
पहले राज्य मीडिया से उन्मुक्त संवाद में भरोसा करता था, आज सत्ता से खुली व भयरहित बातचीत इतिहास की बात होकर रह गयी है। देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग अपने दायित्वों को लेकर न तो जवाब देते हैं न ही स्पष्टीकरण। हिन्दी पत्रकारिता की जिज्ञासा इससे आगे नहीं बढ़ पायी है कि शासक आम चूसकर खाते हैं या काटकर, वे बटुवा रखते हैं या नहीं? नये दौर की पत्रकारिता महंगाई व गरीबी से पस्त अवाम की उतरी शक्लों व थके जिस्मों की बजाय शासकों के चेहरे की चमक और बगैर थके कई-कई घंटों तक काम करने का राज़ जानना चाहती है। लोकतंत्र की अपराधी हिन्दी पत्रकारिता अपनी सम्पूर्ण विश्वसनीयता को खोकर उदंत मार्तण्ड के न्यायालय से बाइज्जत बरी होने का जश्न मना रही है।






133.jpg)
66.jpg)
72.jpg)









