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हॉट टोपिक
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Added on : 2024-03-05 09:10:55

राजेश बादल 

पाकिस्तान में शाहबाज़ शरीफ़ एक बार फिर प्रधानमंत्री के ओहदे पर हैं।इस बार भी वे फ़ौज के कन्धों पर सवारी करते हुए सत्ता में आए हैं।यदि सेना समर्थन नहीं करती तो मुल्क़ फिर अंधी सियासी सुरंग में समा जाता।पिछले गठबंधन के कड़वे अनुभव पीपल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग ( नवाज़ ) भूल नहीं पाए थे कि उनकी नियति ने फिर संयुक्त सत्ता सँभालने पर मजबूर कर दिया।चुनाव नतीजों ने सेना के लिए भी कोई विकल्प नहीं छोड़ा था।पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने जेल में रहते हुए जिस तरह अपनी पार्टी का नेतृत्व किया,उसी का परिणाम था कि अवाम ने जनादेश तहरीके इन्साफ को दिया । इमरान को अस्त्र शस्त्र विहीन कर दिया गया।उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य क़रार दिया गया,उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न छीन लिया गया। एक तरह से फ़ौज ने वे सारे प्रबंध कर दिए थे ,जो शरीफ़ बंधुओं की पार्टी को वाक ओवर दिलाने के लिए काफी थे। यहाँ तक कि लन्दन में बीमारी से कराह रहे नवाज़ शरीफ़ तक को उछलते हुए आकर चुनाव प्रचार करने की छूट दिला दी। इसके बाद भी यदि मतदाताओं ने उनके प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखाई तो क्या किया जा सकता है ? यह एक तरह से फ़ौज की पराजय ही है।मगर,इससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।वह सत्ता के लिए अपना प्रधानमंत्री चुनती है और जब वह प्रधानमंत्री उड़ान भरने लगता है तो सेना उसके नीचे से जाजम खींच लेती है।  
असल में भुट्टो और शरीफ़ ख़ानदानों में हमेशा टकराव रहा है। इसके बावजूद दोनों किसी न किसी दौर में फौज की गोद में बैठते रहे हैं।सेना इस टकराव का लाभ उठाती रही है।दोनों कुनबों की फ़ौज से प्यार और तक़रार की दास्तान बड़ी दिलचस्प है।एक ज़माने में नवाज शरीफ़ तो सैनिक तानाशाह जनरल ज़िया उल हक़ के चहेते थे। जब 1985 में पंजाब के चुनाव हुए तो फ़ौज के समर्थन से नवाज़ शरीफ़ ने चुनाव जीता और ज़िया ने ही उन्हें पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया था। भुट्टो ने प्रधानमंत्री रहते हुए मिलों का राष्ट्रीयकरण किया था तो शरीफ परिवार की दुधारू स्टील मिल हाथ से निकल गई थी। इसके बाद नवाज़ ने कभी भुट्टो को पसंद नहीं किया। यहाँ तक कि जब ज़िया ने भुट्टो को फाँसी दी तो नवाज ने उनकी आत्मा के लिए दुआ करने से इनकार कर दिया था।इसके बाद भी मियाँ नवाज़ सेना के इशारों पर नाचते रहे। उसका परिणाम उन्हें 1990 के चुनाव में मिला। नवाज़ शरीफ़ सेना के इशारे पर प्रधानमंत्री बन गए थे।तत्कालीन आईएसआई प्रमुख जनरल असद दुर्रानी ने तो चुनाव के बाद खुलासा कर दिया था कि उन्होंने बेनज़ीर की पार्टी के ख़िलाफ़ गुप्त बजट से छह करोड़ रूपए खर्च किए थे और नवाज़ शरीफ को प्रचार के लिए करोड़ों रूपए की सहायता दी थी।मतगणना में भी बड़े पैमाने पर धाँधली हुई थी ।तब कहीं जाकर जाकर नवाज शरीफ़ प्रधानमंत्री बन पाए थे। 
कुछ दिन फ़ौज के साथ हनीमून के बाद दोनों का एक दूसरे से मोहभंग हो गया। फ़ौज बेहद आक्रामक अंदाज़ में कश्मीर समस्या निपटाना चाहती थी। नवाज़ हिचक रहे थे। वे भारत से अच्छे रिश्ते चाहते थे। फ़ौज कश्मीर में आतंकवाद को शह देती रही। नवाज़ बचते रहे। फ़ासला बढ़ता गया और 1993 में उन्हें बर्ख़ास्त कर दिया गया ।चुनाव हुए ।बेनज़ीर भुट्टो फिर प्रधानमंत्री बन गईं ।लेकिन 1997 के चुनाव में फिर नवाज शरीफ को मौक़ा मिला । सत्ता संभालते ही नवाज शरीफ की सेना से फिर ठन गई। सेनाध्यक्ष जहांगीर करामत से मतभेद सामने आए। नवाज़ भारत से अच्छे रिश्ते चाहते थे ।फ़ौज विरोध में थी।आख़िरकार जहांगीर को हटा दिया गया और नवाज़ शरीफ़ परवेज़ मुशर्रफ को इस पद पर ले आए। परवेज़ मुशर्रफ़ ने कारगिल कांड कराया और नवाज़ शरीफ़ की किरकिरी हुई। मतभेद यहाँ तक बढे कि नवाज़ शरीफ को मुशर्रफ ने गद्दी से उतार दिया। जब 2008 के चुनाव आए तो मतदाताओं ने भुट्टो की पीपुल्स पार्टी और नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल-एन को चुना।मुशर्रफ़ की पार्टी फिसड्डी रही।इसके बाद वे परदेस भाग गए।नवाज़ और ज़रदारी की पार्टियों की आपस में कभी नहीं बनी,मगर मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ दोनों एक हो गए।ज़रदारी राष्ट्रपति बने।कुछ दिन बाद ही उनके नवाज़ से मतभेद शुरू हो गए ।जब 2013 के चुनावों का ऐलान हुआ तो मुशर्रफ लौट आए लेकिन अदालत ने उन्हें चुनाव के लिए अयोग्य घोषित कर दिया । उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया गया और वे गिरफ़्तार कर लिए गए। इस बार चुनाव में फिर नवाज़ शरीफ़ को अवसर मिला।वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बने । लेकिन फौज और न्यायपालिका से ठन गई ।परिणाम यह कि  पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा,चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित किया गया। वे  बेटी दामाद के साथ जेल में थे । फ़ायदा इमरान खान ने उठाया। फ़ौज ने उन पर हाथ रख दिया। पर हनीमून लंबा नहीं चला। इमरान ने सेना की धुन पर नाचना बंद कर दिया। इसका खामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ा। पद छोड़ना पड़ा और वे अब जेल में हैं। शाहबाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री पद पर हैं। चूँकि नवाज़ शरीफ़ को फ़ौज से बैर मोल लेने की पुरानी आदत थी। इसलिए सेना इस बार उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहती थी।पार्टियों और सेना के बीच  इस चूहे - बिल्ली के खेल में पाकिस्तान के अपने हित हाशिए पर जाते रहे हैं।  
सवाल यह है कि पाकिस्तान की नई सरकार भारत के साथ आगे कैसे बढ़ेगी ?शाहबाज़ शरीफ ने तो प्रधानमंत्री बनते ही भारत के साथ शत्रुता भरे बयान देने शुरू कर दिए हैं।वे कश्मीर राग अलापने लगे हैं। वे कहते हैं कि कश्मीर मसले पर हमारा ख़ून खौल रहा है।ढुलमुल नीतियों के चलते वे दो क़दम आगे चलते हैं तो चार क़दम पीछे चलते हैं। सोलह महीने चली उनकी गठबंधन सरकार ने और उससे पहले इमरान ख़ान की हुक़ूमत ने देश को आर्थिक बिखराव के जिस हाल में पहुँचा दिया है,उससे उबरने के लिए पाकिस्तान को बहुत मेहनत करनी होगी।उसे समझना होगा कि अंततः भारत ही उसकी प्राणवायु है। भारत के बिना उसकी गति नहीं है।

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