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Added on : 2023-11-08 16:21:38

राजेश बादल 

भारतीय लोकतंत्र अब परिपक्व हो रहा है .संसार में थोड़ी थोड़ी धाक भी जमने लगी है .नई पीढ़ी ने अपनी प्रतिभा के बूते कमोबेश सभी देशों में अपने हुनर ,कौशल और ज्ञान से अलग पहचान बनाई है तो दूसरी तरफ़ बढ़ती आबादी के कारण भी हिन्दुस्तान को बड़े तथा ताक़तवर मुल्क़ों की श्रेणी में रखा जाने लगा है .एक औसत भारतीय निश्चित रूप से इस पर गर्व कर सकता है .सदियों तक ग़ुलामी की ज़ंजीरों में जकड़े रहने के बाद जो ख़ुशी आज़ादी की मिली थी ,अब वैसी ही प्रसन्नता आम भारतीय कर सकता है .मौजूदा हालात उसे इस बात की इजाज़त देते हैं कि बिखरते समाजों और चटकते रिश्तों के इस दौर में कुछ तो है, जिसे हमने बचा रखा है। परदेस में मिलने वाली इज़्ज़त हमें कंधे चौड़े रखने का अवसर देती है .लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है ,जो बीते दशकों में हमने खोया है .इसका अहसास कोई विदेशी नहीं कर सकता और एकदम नई नस्ल का कोई नुमाइंदा भी नहीं कर सकता .इसकी वजह यह कि उसने उस दौर को नहीं जिया है ,जिस भारतीय समाज की साख़ समूची दुनिया में रही है .स्वतंत्रता के बाद भारत के अस्तित्व को लेकर बड़ी शंकाएँ की गई थीं। अंतरराष्ट्रीय लेखकों,इतिहासकारों ,कूटनीति के जानकारों और राजनयिकों तक ने भारत में लोकतंत्र के भविष्य पर अनेक सवाल उठाए थे। गोरे विद्वान कहते थे कि आज़ाद होने के बाद भारत धीरे धीरे बिखर जाएगा .वे मानते थे कि सदियों तक ग़ुलामी की ज़ंजीरों से जकड़ा रहा देश अब अपने पैरों पर खड़े होने की ताक़त खो चुका है।थोड़े ही समय बाद लोकतंत्र का भाव कहीं खो जाएगा और यह देश बिखर जाएगा ।ऐसी सोच रखने वालों में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल भी थे।वे कहते थे कि भारत के राजनेताओं को सत्ता सौंपते हुए हम यह स्पष्ट जानते हैं कि यह तिनकों के पुतले हैं । कुछ वर्षों में ही इनका नामोनिशान तक नहीं रहेगा ।जाने माने अमेरिकी पत्रकार सेलिग हैरिसन के एक चर्चित लेख में कहा गया था कि देखने वाली बात ये है कि आज़ाद भारत ज़िंदा भी रह पाएगा या नहीं ? मुझे तो इसमें संदेह है । मैक्सवेल ने कहा था कि भारत को एक लोकतान्त्रिक ढाँचे के रूप में विकसित करने का प्रयोग नाकाम हो गया है ।अँगरेज़ विद्वान जॉन स्ट्रेच ने लिखा था कि न तो भारत नाम का कोई देश पहले था और न कभी भविष्य में होगा।  

लेकिन ऐसा नही हुआ। भारत इन सारी धारणाओं को धता बताते हुए शनैः शनैः आगे बढ़ता गया है। चुनाव दर चुनाव यह धारणा और पुख़्ता होती गई है कि हमारी मज़बूत संवैधानिक लोकतांत्रिक नींव के बिना यह संभव नहीं था।कितने लोगों को याद होगा कि स्वतंत्रता के पाँच साल बाद इस देश में चुनाव हुए थे। लेकिन उन पाँच सालों में हिन्दुस्तान की एक ऐसी सरकार काम कर रही थी ,जो सिर्फ़ कांग्रेसी नहीं थी। उसी सरकार ने दरअसल आज के भारत की नींव डाली थी। भले ही कांग्रेस के जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे ,लेकिन उनके बारह मंत्री मज़हब और दलीय विचारधारा से ऊपर उठकर काम कर रहे थे। उसमें पांच प्रतिनिधि ऐसे थे ,जिनका कांग्रेस और कांग्रेस की विचारधारा से कोई लेना देना नहीं था । वो सिर्फ हिन्दुस्तान की तरक्क़ी के लिए नेहरू के कंधे से कंधा मिलाकर काम करना चाहते थे ।ऐसी उदारता और सहिष्णुता बेमिसाल है । इनमें से एक थे संविधान के शिल्पी डॉक्टर बाबा साहेब आम्बेडकर । उनके अलावा हिन्दू महासभा के श्यामाप्रसाद मुखर्जी और पंथिक पार्टी के बलदेव सिंह भी नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में शामिल थे ।यह सभी प्रधानमंत्री के मुखर आलोचक थे। पर,राष्ट्र निर्माण में उन्होंने तमाम मतभेदों को भूलकर काम किया था।उसी अवधि में देश की इस पहली राष्ट्रीय सरकार ने लोकतंत्र की प्रतीक संस्थाओं का विराट जाल बिछाने का महत्वपूर्ण काम किया था।यह देखकर वास्तव में आश्चर्य होता है कि आज भारत को महाशक्ति में बदलने वाली वही संस्थाएं हैं,जो आज़ादी के बाद बनाई गईं थीं ।प्रधानमंत्री नेहरू मानते थे कि भारत जैसे धार्मिक और परंपरावादी देश में सबसे बड़ी चुनौती उसे आधुनिक बनाने की है ।इसके लिए प्रजातंत्र की जड़ों को नए सिरे से मज़बूत करना ज़रूरी था ।आज विश्व में भारतीय लोकतंत्र की साख़ बनी है तो इसके पीछे उन्ही संस्थाओं का योगदान है।  

फिर ऐसा क्या हुआ ,जो हमारे तंत्र में कुछ पीछे छूटता रहा और हमें उसके चटकने का अहसास भी नहीं हुआ। हमने इन लोकतांत्रिक संस्थाओं के ढाँचे को कमज़ोर किया और सरोकारों वाले स्वप्नदर्शी नेतृत्व को हाशिए पर पहुँचा दिया। आज ईमानदार, योग्य और साधनहीन नेताओं की हमारे तंत्र में कोई संभावना नहीं है। इसलिए मज़बूत जनाधार वाले नेता धीरे धीरे समाप्त होते गए और राजनीतिक दल चुनाव आते ही सार्वजनिक रूप से कहने लगे कि वे केवल जीतने वाले उम्मीदवारों को ही टिकट देंगे। यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि आज चुनाव जीतने के लिए धन बल और बाहुबल ही आवश्यक है। प्रतिभा और क़ाबिलियत को कोई स्थान नहीं है। जनाधार वाले नेताओं का वह दौर हमने भी देखा है ,जब केवल नेता का नाम सुनते ही कई कई किलोमीटर दूर से लोग उनको सुनने के लिए आते थे। आज स्थिति उलट है। सभाओं में श्रोताओं को लंच बॉक्स और पाँच सौ रूपए का नोट लगता है। लाने ले जाने की सवारी अलग से ज़रूरी है।उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने लिखा था कि उन दिनों गाँधी जी की सभा सुनने के लिए बीस बीस किलोमीटर से लोग पैदल आते थे। एक दिन पहले अपना भोजन पोटली में बांधकर लाते थे। उन दिनों न टीवी था ,न इंटरनेट और न टेलिफोन। यह जनाधार और लोगों के दिलों में स्थान था। मैं नहीं कहता कि आज सियासत में सारे नेता गांधी हो जाएँ ,लेकिन यह तो देखना ही होगा कि अपने कार्यों से राजनेता आम अवाम के दिलों में इतनी साख़ पैदा करें कि मतदाता स्वतःस्फूर्त नेता जी को सुनने के लिए पहुँचें। यह तभी हो सकता है ,जब सियासत सेवा बने ,धंधा नहीं।

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